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हिमाचल में सड़कों पर मौत का तांडव: राज्य पर भारी पड़ेगी सरकार की सुस्ती

हिमाचल सरकार ने प्रदेश की सड़कों की नियमित जांच के लिए कोई भी कारगर तरीका अभी तक लागू नही किया है

Updated On: May 15, 2018 09:37 AM IST

Matul Saxena

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हिमाचल में सड़कों पर मौत का तांडव: राज्य पर भारी पड़ेगी सरकार की सुस्ती

हिमाचल प्रदेश के सड़क हादसों में मरने वाले लोगों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा. एक तरफ मौसम का बदलता मिजाज़ और दूसरी ओर सडकों की बदहाली के कारण वाहनों के लुढ़कने की घटनाएं प्रतिदिन अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं. पिछले रविवार को हिमाचल में दो सड़क हादसों में 14 लोगों की मौत हो गई.

पहला हादसा सुबह करीब 9.45 बजे सिरमौर जिला के नेईनेटी पंचायत के भूण के पास हुआ.  सड़क पर गड्ढे से बचने के दौरान निजी बस का एक्सेल टूट गया, जिससे बस 50 मीटर नीचे लुढ़क गई. इसमें आठ यात्रियों की मौत हो गई जबकि 11 की हालत नाज़ुक है. दूसरी घटना राजधानी शिमला से करीब 42 किलोमीटर दूर ठियोग-हाटकोठी सड़क पर खोलपली में हुई. यहां एक कार अनियंत्रित होकर गहरी खाई में लुढ़क गई जिसमें सवार सभी छ लोगों की मौत हो गई. नालागढ़-बद्दी राष्ट्रीय मार्ग पर भी बुलेट और कार की टक्कर में दो युवकों की मौत का समाचार है.

खराब मौसम के साथ बढ़ता है दुर्घटनाओं का सिलसिला

जैसे ही हिमाचल में मौसम का मिजाज़ बिगड़ने लगता है और बारिश की खबरें आनी शुरू हो जाती हैं. सड़क दुर्घटनाओं का सिलसिला भी बढ़ने लगता है. इस वर्ष तो यह क्रम अप्रैल से ही शुरू हो गया था जब नूरपुर (कांगड़ा) में स्कूली बच्चों को लेकर जाने वाली एक बस दुर्घटना ग्रस्त हो गई. इस दुर्घटना में 27 लोगों की मृत्यु हो गई थी जिनमें से 23 स्कूली बच्चे थे. पिछले साल भी जुलाई महीने में प्रदेश के विभिन्न भागों में सड़क दुर्घटनाओं में लगभग एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और लगभग 100 से अधिक लोग घायल हो गए थे.

हिमाचल प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की तादाद हर साल लगातार बढ़ती ही जा रही है. पिछले एक दशक में हिमाचल में 27,439 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें 10,393 यात्रियों को जान से हाथ धोना पड़ा. देश के सभी पहाड़ी राज्यों में हिमाचल ही एक मात्र ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाएं होती हैं.  उपलब्ध आंकड़ों पर यदि गौर करें तो प्रदेश में प्रतिदिन 9 सड़क दुर्घटनाएं होती हैं जिनमें चार लोग प्रतिदिन हताहत होते हैं.  हिमाचल प्रदेश सरकार इन दुर्घटनाओं को रोक नही पा रही क्योंकि अधिकांश दुर्घटनाएं मानवीय चूक के कारण होती हैं.

1982 में गठित हुई समिति, लेकिन रिपोर्ट गई ठंडे बस्ते में

वर्ष 1982 में हिमाचल प्रदेश सरकार ने बस दुर्घटनाओं के कारणों की जांच के लिए कौल सिंह की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था. इस समिति की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल में अधिकांश बस दुर्घटनाएं चालकों की लापरवाही से होती हैं. यह अजीब संयोग है इस समिति की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी. समय-समय पर कई स्वैच्छिक संस्थाएं भी इन सड़क दुर्घटनाओं के  कारणों का पता लगाने का प्रयास करती हैं. हाल ही में एक संस्था के सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश में 80 प्रतिशत घटनाएं मानवीय चूक के कारण होती हैं, जबकि 5 प्रतिशत घटनाएं तकनीकी कारणों से तथा 15 प्रतिशत घटनाएं सड़कों के खराब होने के कारण होती हैं.

यह भी चौंका देने वाला तथ्य है कि हिमाचल में 97.84 प्रतिशत बस दुर्घटनाएं चालकों के शराब पीने के बाद ही मानवीय चूक के कारण होती  हैं. इन बस दुर्घटनाओं का कारण प्रदेश की बदहाल सड़कें भी हैं. हिमाचल प्रदेश में 30,000 किलो मीटर से अधिक मोटर योग्य सड़कें हैं लेकिन सच्चाई यह है कि केवल 60 प्रतिशत सड़कें ही पक्की और तारकोल युक्त हैं. इन कच्ची सड़कों पर थोड़ी सी भी बारिश हो जाए तो यातायात भू-स्खलन के कारण रुक जाता है या फिर जोखिम भरा हो जाता है.

मंदिर बनाने से नहीं, कोई स्थायी उपाय करने से होगा समाधान

प्रदेश सरकार ने हिमाचल की सड़कों पर पूरे राज्य में ऐसे 314 जगहें चिन्हित की हैं जहां दुर्घटनाओं की सम्भावनाएं बराबर बनी रहती हैं. वैसे यह स्थल राज्य में 600 से भी ऊपर हैं. चंडीगढ़-मनाली सड़क पर तो ऐसे बहुत से स्थल हैं, जहां हर साल कोई न कोई सड़क दुर्घटना अवश्य होती है कई बार तो ऐसा लगता है जैसे इन स्थलों को किसी देवता ने श्राप दे रखा हो. लोगों ने इन स्थलों पर प्रदेश में देवताओं के मंंदिर भी बनाए हैं और उधर से गुजरते हुए ट्रक या बस-चालक इन देव-मंदिरों में शीश नवाकर आगे बढ़ते हैं. यह भ्रम है या असलियत यह तो विचार का विषय है लेकिन ऐसे मन्दिर हिमाचल की बहुत सी सड़कों के किनारे देखे जा सकते हैं.

हिमाचल सरकार ने प्रदेश की सड़कों की नियमित जांच के लिए कोई भी कारगर तरीका अभी तक लागू नही किया है. सड़कों के रख-रखाव, नियमित मरम्मत आदि के लिए जो भी एजेंसीज काम करती हों, उन्हें और हिमाचल की वर्तमान सरकार को एक साथ मिलकर काम करने के लिए एक अलग से प्राधिकरण की आवश्यकता है, जो पहाड़ की सडकों को जलवायु व अन्य मानकों के आधार पर नियमित रूप से संवार सके. हिमाचल सरकार यदि समय रहते सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कारगर कदम नही उठाएगी तो इसका विपरीत असर हिमाचल के पर्यटन उद्योग पर भी पड़ सकता है.

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