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हनीप्रीत जब हार गई तो गिरफ्तार हो गई या नई भूमिका के लिए तैयार हो गई?

एक महिला का चीरहरण टीआरपी के जुए में होता रहा और एक-एक कर हनीप्रीत सब कुछ हारती चली गई

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Oct 03, 2017 10:10 PM IST

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हनीप्रीत जब हार गई तो गिरफ्तार हो गई या नई भूमिका के लिए तैयार हो गई?

राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद हनीप्रीत सिंह को मीडिया ने 'हीरोइन' बना दिया और जब वो पर्दे के पीछे लापता हो गई तो हरियाणा पुलिस ने ‘देशद्रोही’ बना दिया. अपने ही दो किरदारों से भागते-भागते हनीप्रीत जब थक गई तो उसकी लाचारगी ने कैमरे के सामने आने का फैसला किया. इस बार हनीप्रीत सिंह किसी हीरोइन की तरह नहीं बल्कि सिस्टम में खुद के साथ हुए अन्याय की दुहाई देते हुए कैमरे के जरिए रूबरू हुई. हनीप्रीत ये जानती थी कि उसको लेकर सुनाई और दिखाई गई कहानियों और किस्सों ने उसे कलंक-कथा की खलनायिका बना दिया है. हनीप्रीत ये जान चुकी थी कि आरोपों के शोर में उसकी सुनवाई की आवाज़ शायद ही सुनाई दे. इसलिए उसने सबसे पहले खुद ये सवाल किया कि आखिर उसका गुनाह क्या है? उसका कसूर क्या है?

जाहिर सी बात है कि ये अधिकार हर उस व्यक्ति को है जिस पर कोर्ट में या बाहर मीडिया और सोशल मीडिया पर ट्रायल चल रहा हो. हनीप्रीत पर संगीन आरोप लगाने वालों के पास सबूत नहीं थे लेकिन उनकी धारदार जुबान से एक महिला का चीरहरण टीआरपी के जुए में होता रहा और एक-एक कर हनीप्रीत सब कुछ हारती चली गई.

शायद हनीप्रीत का पहला कसूर वो औरत होना है जो गुरमीत राम रहीम की बेहद करीबी और हमराज़ रही है.

इतने दिनों तक फरार रहने पर हनीप्रीत का कहना है कि वो डिप्रेशन में चली गई थी. डिप्रेशन यानी वो अवसाद जहां दिमाग काम नहीं करता है. राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद हनीप्रीत सिंह को अकेले वापस लौटना था. जिस राम रहीम की वो एंजल बेटी थी और जो गुरमीत उसके लिए भगवान था, वही सलाखों के पीछे एक आम आदमी की तरह नजर आ रहा था. समय के सबसे बड़े सच को स्वीकार करना न तो हनीप्रीत के लिए आसान था और न ही डेरे के समर्थकों के लिए. उनकी आस्था ने राम रहीम को खुदा का बंदा मान लिया था और वो भक्त बाबा के बलात्कारी होने की सज़ा को साजिश मान रहे थे.

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लेकिन जब हनीप्रीत के पांव के नीचे से झूठ की जमीन निकली तो सच की खाई में उसने राम रहीम के मायावी साम्राज्य को ढहते हुए देखा. उसी भ्रमजाल के टूटने की वजह से हिंसक हुई भीड़ ने कई बेगुनाहों की जान ले ली. करोड़ों की संपत्ति खाक़ हो गई. सिनेमाई संसार के सपनों में रहने वाली हनीप्रीत सिंह के लिए ये ‘हैप्पी एंडिंग’ नहीं थी.

विश्वास गुप्ता के आरोपों पर चुप्पी के मायने

हनीप्रीत का कहना है कि बाबा के जेल जाने के बाद उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. ऐसे हालातों में वो कौन सी साजिश रच पाती?

गुरमीत राम रहीम के साथ रिश्तों पर उठे सवालों पर हनीप्रीत का वही जवाब था जो कि समाज में एक बाप और बेटी के रिश्ते पर होता है. पूर्व पति विश्वास गुप्ता के आरोपों का हनीप्रीत ने पोस्टमार्टम नहीं किया. उसकी चुप्पी अगर कई सवालों को न्योता देती है तो दूसरी तरफ उसकी खामोशी चीरहरण पर बेबस भी दिखाई देती है.

हनीप्रीत से पूछे जाने वाले सवाल कभी खत्म नहीं हो सकते हैं क्योंकि वो राज़दार उस शख्स की है जिसके अपराध के इतिहास का पहला पन्ना ही अभी खुला है. हनीप्रीत के जवाबों को सुनकर लग सकता है कि उसने हालात की गिरफ्त से बाहर निकलने के लिए गिरफ्तार होना ही बेहतर समझा क्योंकि वो अपने दो किरदारों से भागते-भागते थक चुकी थी.

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सवाल ये भी है कि हनीप्रीत के पास ऐसे कौन से राज़ हैं जो गुरमीत राम रहीम के गुनाहों की फेहरिस्त में इज़ाफा करेंगे? हनीप्रीत सिंह के पास ऐसे कौन से सबूत हैं जो गुरमीत राम रहीम की सज़ा को बढ़ाने का काम करेंगे?

हनीप्रीत को अगर 7 राज्यों की पुलिस भी नहीं ढूंढ सकी तो साफ है कि वो अकेली नहीं है. कैमरे के सामने आ कर अपनी बात कहने वाली हनीप्रीत के साथ ‘अदृश्य मददगार’ बहुत हैं. वो मददगार ये सोचते हैं कि हनीप्रीत पर लगे पुलिसिया आरोप कोर्ट की दहलीज पर साबित नहीं हो सकेंगें. उन्हें शायद ये भरोसा हो चुका है कि हनीप्रीत के खिलाफ हरियाणा पुलिस की दलीलों में दम नहीं है जो उसे ‘देशद्रोही’ साबित कर पाएं. सिर्फ लाल बैग साथ में लेकर चलने से पंचकूला हिंसा का कोडवर्ड साबित नहीं हो सकता है. बल्कि पंचकूला हिंसा की वजह से हरियाणा सरकार की लापरवाही और नाकामी खुद आरोपों के कटघरे में है.

राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद हनीप्रीत का फरार होना ही उसके लिए कानूनन मुश्किल का सबब बन सकता है. लेकिन हनीप्रीत ने खुद हिंसा करवाई हो ऐसा कोई भी सबूत न होना ‘देशद्रोह’ लगाने पर बड़ा सवाल भी बन सकता है.

हरियाणा पुलिस ने खेला चूहे-बिल्ली का खेल

हनीप्रीत और गुरमीत राम रहीम के मामलों में फर्क है. हनीप्रीत को दोषी साबित करने के लिए सबूत जुटाना हरियाणा पुलिस के लिए आसान नहीं होगा. हनीप्रीत के ‘अदृश्य मददगार’ और वकील ये तक जान चुके होंगे कि हनीप्रीत के खिलाफ दर्ज एफआईआर में कौन-कौन सी कमज़ोर धाराएं लगी हैं जिन पर उसे जमानत और राहत मिल सकती है.

ऐसे में 7 राज्यों की पुलिस ने हनीप्रीत को पकड़ने के नाम पर केवल चूहे और बिल्ली का खेल खेला है.

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हनीप्रीत की गिरफ्तारी के बाद अब सवालों के दायरे में वो लोग भी होंगे जिन्होंने उसे छिपने और भगाने में मदद की. लेकिन 39 दिनों में अब हनीप्रीत नई स्क्रिप्ट के साथ नई फिल्म को डायरेक्ट करने के लिए तैयार है क्योंकि वो जान चुकी है कि नई स्क्रिप्ट में 'पुलिस सीन' में बहुत कमज़ोर है जो उसे जेल भेजने के लिए काफी नहीं होगा. इस नई फिल्म में हनीप्रीत का ही लीड रोल है जबकि गुरमीत राम रहीम गेस्ट अपीयरेंस में रहेगा. हनीप्रीत को अब अपने एक-एक डायलॉग का ध्यान रखना होगा क्योंकि यहां रीटेक नहीं होगा और उसके डायलॉग बयानों के तौर पर दर्ज होंगे जो बाद में ये तय करेंगे कि हनीप्रीत गुनहगार है या नहीं और तभी फिल्म हिट होगी या फ्लॉप.

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