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भारत को वैज्ञानिकों का आयात करना पड़ेगा: ए. जयकुमार

हमारी प्राचीन उपलब्धियों को अफवाह कह कर खारिज नहीं किया जा सकता.

Updated On: Nov 21, 2016 11:35 AM IST

Debobrat Ghose Debobrat Ghose
चीफ रिपोर्टर, फ़र्स्टपोस्ट

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भारत को वैज्ञानिकों का आयात करना पड़ेगा: ए. जयकुमार

'हमें विज्ञान में भारत के देसी योगदान पर बात करने में शर्म नहीं आनी चाहिए.' ऐसा कहना है राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रकोष्‍ठ विज्ञान भारती (विभा) के महासचिव ए. जयकुमार का. इनका मानना है कि पिछली सरकारों द्वारा हमारे योगदानों को उपेक्षित करने के प्रयास जान-बूझ कर किए गए हैं. सच्‍चाई सामने आनी चाहिए.

पहले स्‍वदेशी विज्ञान आंदोलन के नाम से चलने वाला संगठन विभा चाहता है कि नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार अतीत में (पढ़ें प्राचीन काल में) भारत की देसी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर अनुसंधान और विकास (आरएंडडी) को आरंभ करने के लिए सक्रिय रूप से एक नीति का निर्माण करे.

यह संगठन नई राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति में भी बदलाव चाहता है. मेकैनिकल इंजीनियरिंग में स्‍नातक और एमबीए डिग्रीधारी जयकुमार लंबे समय तक संघ के प्रचारक रहे हैं. स्‍वदेशी विज्ञान के प्रसार संबंधी विभिन्‍न पहलुओं पर उन्‍होंने फर्स्‍टपोस्‍ट के साथ बात की. प्रस्‍तुत है बातचीत के संपादित अंश.

छात्रों के बीच स्‍वदेशी विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर जागरूकता पैदा करने के लिए विभा की क्‍या योजनाएं हैं?

विभा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत के देसी योगदान को छात्रों के बीच लोकप्रिय बनाने, प्रसारित करने और जागरूकता फैलाने की दिशा में काम कर रहा है. इस दिशा में पिछली सरकारों द्वारा कुछ खास काम नहीं किया गया.

इसका नतीजा यह हुआ है छात्रों की रुचि मूलभूत विज्ञान में कम होती जा रही है. साल दर साल मेडिकल और इंजीनियरिंग के छात्रों की संख्‍या तो बढ़ रही है लेकिन प्रयुक्‍त विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इसका ठीक उलटा हो रहा है.

वह दिन दूर नहीं जब हमें (भारत में) शीर्ष आरएंडडी संस्‍थानों की कमी के चलते वैज्ञानिकों का आयात करना पड़ेगा. यह कोई धारणा नहीं है, बल्कि अध्‍ययन ऐसे रुझान की बात करते हैं.

हमने सरकार से ऐसी नवाचारी प्रौद्योगिकी के विकास पर जोोर देने को कहा है जिसका इस्‍तेमाल आम जन के लिए किया जा सके. अपने युवा छात्रों को भारत की समृद्ध वैज्ञानिक विरासत और उसके योगदान के बारे में बताए जाने की जरूरत है. इसे पाठ्यक्रम का हिस्‍सा होना चाहिए.

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्‍वायत्‍त संस्‍था विज्ञान प्रसार के साथ काम करने के अलावा हम 20 नवंबर को स्‍कूली छात्रों के लिए विद्यार्थी विज्ञान मंथन नाम की एक राष्‍ट्रीय परीक्षा का आयोजन कर रहे हैं ताकि विज्ञान में भारत के योगदान पर उनकी जानकारी का आकलन किया जा सके.

यह परीक्षा विद्यार्थी विज्ञान मंथन क्‍या चीज है और इससे छात्रों को भविष्‍य में कैसे मदद मिलेगी?

विभा ने दो पुस्‍तकें प्रकाशित की हैं- इंडियन कंट्रिब्‍यूशंस टु साइंस  और नोट्स टु माइसेल्‍फ: एपीजे अब्‍दुल कलाम. यह पुस्‍तक छात्रों को भारत की वैज्ञानिक विरासत के बारे में जानने और उन्‍हें प्रेरित करने का काम करेगी.

गैैलीलियो और अन्‍य पश्चिमी वैज्ञानिकों से काफी पहले आर्यभट्ट ने 1500 साल पहले वैज्ञानिक उपकरणों की मदद के बगैर खगोलीय तथ्‍यों का उद्घाटन किया था. यह भारत की मेधा का सबूत है.

यह परीक्षा वैसे तो चार साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन इस बार हम बड़े पैमाने पर इसे आयोजित करने जा रहे हैं जिसमें 1130 केंद्रों पर 2000 से ज्‍यादा स्‍कूल (दिल्‍ली के 62 स्‍कूल) हिस्‍सा लेंगे.

राज्‍य स्‍तर पर 240 विजेताओं को चुनने के बाद राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आखिर में 18 छात्रों को चुना जाएगा. इस विजेताओं को संरक्षक उपलब्‍ध कराए जाएंगे और प्रत्‍येक छात्र को अपनी पसंद का संरक्षक चुनने का मौका दिया जाएगा.

रुचि के विषयों के हिसाब से छात्रों को दस से पंद्रह दिन के दौरे पर आरएंडडी संस्‍थानों में ले जाया जाएगा. हम भविष्‍य में वजीफे की योजना पर भी काम कर रहे हैं.

क्‍या आप स्‍कूली छात्रों के लिए विज्ञान का कोई पाठ्यक्रम विकसित करने की तैयारी में भी हैं? क्‍या वह देश में अभी पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम से कुछ अलग होगा?

हमने पांचवीं से बारहवीं कक्षा तक के पाठ्यक्रम में कुछ संशोधनों की मांग की है क्‍योंकि नई शिक्षा नीति समग्र नहीं है. हमने भारत के देसी वैज्ञानिक विकास, आयुर्वेद, योग, वास्‍तुशास्‍त्र, जैव-विविधता की भारतीय विधि के योगदान इत्‍यादि को भी शामिल करने की मांग की है.

सरकार को आयुर्वेद में और ज्‍यादा शोध करने की जरूरत है. पश्चिम में इस औषधि विज्ञान की भारी मांग है और आज यह धारा ही आखिरी विकल्‍प है.

संघ पर अक्‍सर आरोप लगाया जाता रहा है कि वह अपनी विचारधारा को थोपकर भारत की शिक्षा प्रणाली के भगवाकरण की कोशिश करता है. क्‍या विभा के प्रयास भी ऐसे ही हमले का शिकार हो जाएंगे?

मैं यहां यह बात स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूं कि आरएसएस कभी भी किसी सरकारी नीति में दखल नहीं देता है. कोई भी किसी वैज्ञानिक आयाम का भगवाकरण नहीं कर सकता या उस पर कोई रंग नहीं चढ़ा सकता है क्‍योंकि विज्ञान वस्‍तुनिष्‍ठ और तथ्‍यों पर आधारित होता है. वैज्ञानिक बिरादरी राजनीति या राजनीतिक विचारधाराओं से बहकावे में नहीं आती.

हमारे पास प्राचीन भारत में वैज्ञानिक उपलब्धियों के ठोस रिकॉर्ड मौजूद नहीं हैं. अगर वह सही भी हुआ, तो यह उन छात्रों की मदद कैसे करेगा जो आधुनिक विज्ञान पढ़ रहे हैं?

निजी रूप से मैं बिना किसी वैज्ञानिक आधार के पुराणों या अन्‍य कहीं भी किए गए दावों का प्रसार करने के विरोध में हूं, लेकिन साथ ही एक बात यह भी है कि हमें साबित हो चुकी वैज्ञानिक उपलब्धियों पर बात करने में संकोच नहीं होना चाहिए. जैसे आर्यभट्ट या वराहमिहिर की खोजें.

सदियों पहले भारतीय गणितज्ञ संगमग्राम के माधव ने इनफाइनाइट सिरीज (अपरिमित श्रेणी) का आविष्‍कार किया था जिसे बाद में 1667 में जेम्‍स ग्रेगोरी ने विकसित किया (जिसे ग्रेगोरी श्रेणी कहते हैं).

जर्मनी में इसे माधव-ग्रेगोरी श्रेणी के नाम से पढ़ाया जाता है जबकि भारत में इसे छात्रों को केवल ग्रेगोरी श्रेणी के नाम से पढ़ाया जाता है. हम चाहते हैं कि भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों और योगदानों के पीछे का सत्‍य दुनिया जाने, बजाय इसके कि इसे छुपाकर रखा जाए जैसा कि आजादी के बाद किया गया है.

हमारे ऊपर अब भी ब्रिटिश राज का बोझ है. चीन अपनी परंपरागत चीनी औषधि को व्‍यापक तरीके से दुनिया भर में प्रसारित कर सकता है, लेकिन भारत ऐसा आयुर्वेद के साथ नहीं कर सका. यह स्थिति निराशाजनक है.

प्राचीन ग्रंथों में खगोलशास्‍त्र, अधिभौतिकी, अणु, पुष्‍पक रथ, मिसाइल, ब्रह्मास्‍त्र, प्‍लास्टिक सर्जरी इत्‍यादि के संदर्भ आने के बावजूद इन अवधारणाओं को साकार तो आधुनिक पश्चिमी विज्ञान ने ही किया है. प्राचीन भारत में इस स्‍तर तक उपलब्धि हासिल करने के बाद वैज्ञानिक प्रगति रुक क्‍यों गई?

हमारे पास वैज्ञानिक आविष्‍कारों पर लाखों पाण्‍डुलिपियां थीं. इनका बड़ा हिस्‍सा जर्मनी के पास है. हमने पारंपरिक ज्ञान पर एक डिजिटल लाइब्रेरी विकसित की है, लेकिन इस पर कोई शोध की पहल क्‍यों नहीं की गई?

एक बार एपीजे अब्‍दुल कलाम ने मुझे बताया था कि सरकार जब तक पारंपरिक ज्ञान पर शोध और विकास की पहल नहीं करती, वह केवल व्‍याख्‍यानों और दावों तक सीमित रह जाएगा.

इससे समाज को कोई लाभ नहीं होगा. सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि देश में अत्‍याधुनिक शोध केंद्रों में शोधकार्य की पहल की जाए. सच्‍चाई को बाहर आना चाहिए.

ऐसा क्‍यों है कि आजादी के सात दशक बाद भी भारत में आधुनिक विज्ञान व प्रौद्योगिकी में शिक्षण व शोध का काम संस्‍कृत या अन्‍य भाषाओं में कोई प्रगति नहीं कर सका?

कोई भाषा यदि विज्ञान के साथ रिश्‍ता नहीं जोड़ सकती तो वह मर जाएगी. संस्‍कृत भारत की इकलौती भाषा है जिसका लेना-देना उच्‍च स्‍तर के विज्ञान के साथ था. विभा क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान का प्रसार कर रहा है. हम विज्ञान की परीक्षा क्षेत्रीय भाषाओं में भी आयोजित कर रहे हैं.

क्‍या आपको लगता है कि अतीत की सरकारों ने जान-बूझ कर इसकी उपेक्षा की है?

हां, पिछली सरकारों की ओर से जान-बूझ कर विज्ञान व प्रौद्योगिकी में भारत के देसी योगदानों को उपेक्षित करने के प्रयास हुए हैं. इसे कोई प्राथमिकता या अहमियत नहीं दी गई.

कोई भी भारत को स्‍वावलंंबी देश बनते नहीं देखना चाहता था. सत्‍य का पता लगाए बगैर हमारी प्राचीन उपलब्धियों को अफवाह कह कर खारिज नहीं किया जा सकता.

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