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वेलकम 2018: स्वैग से करेंगे नए साल का स्वागत

हां, हादसों की जद पर हों तो भी मुस्कुराना नहीं छोड़ सकते, जलजलों के डर से घर बसाना नहीं छोड़ सकते. ‘टाइगर जिन्दा’ है और हिन्दुस्तानी हाथी अपनी राह पर पूरी ठसक से चल रहे हैं तो आइए, हम भी कोई जोश भरा गीत गाएं

Updated On: Jan 01, 2018 11:52 AM IST

Rakesh Bedi

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वेलकम 2018: स्वैग से करेंगे नए साल का स्वागत

पहचान की धरती ने नेह की बंधी डोर तोड़ ली. अब क्या करें... बिन बाहर निकले हम क्या कर पायेंगे… महमूद दरवेश

साल 2017 आहिस्ते से और पूरी उकताहट के साथ इतिहास की पेंचदार गलियों में गुम हो रहा है, और ठीक इसी वक्त सलमान खान बाघ (टाइगर) की सवारी कर रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी मेट्रो की. प्रधानमंत्री की लोकप्रियता की लाली अभी बरकरार है और इस लोकप्रियता की लाली के बरकरार रहते उन्होंने मेट्रो की मैजेंटा (बैंगनी) लाइन का उद्घाटन किया जो लुटियंस दिल्ली के उदास दिल को तेजी से पैर पसारते नोएडा से जोड़ती है. यह बिना ड्राइवर की ट्रेन है, सो प्रधानमंत्री के लिए फोटो खिंचवाने का बेहतरीन मौका भी.

राष्ट्र और राष्ट्र के सवा अरब आबादी को भावी खरबों डॉलर की अर्थव्यवस्था के चमकदार राह पर चलाते हुए वे खुद की कल्पना एक ट्रेन के ड्राइवर के रुप में कर सकते हैं. वे ‘सरकार’ के प्रतीक हैं और ना सही दूर की किसी वैभवशाली नगरी की ओर तब भी नजदीक की किसी उप-नगरी की तरफ सफर जारी तो है ही.

बॉक्स ऑफिस पर सलमान खान के नाम के पटाखे छूट रहे हैं और कुछ ऐसा ही जलवा मोदी के नाम का भी है, खासकर गुजरात और हिमाचल में मिली जीत के बाद. गुजरात में उन्होंने नई ताकत के जोर में दहाड़ती कांग्रेस की नाक में नकेल डाल दी और हिमाचल में तो खैर, धूप से धुली पहाड़ियों ने सिर्फ उन्हीं के नाम का गीत गुनगुनाया.

सलमान खान ने ‘टाइगर जिन्दा है’ में अपनी खूबसूरत दुल्हनिया के जरिए पाकिस्तान से याराना बनाया तो भी इस फिल्म ने करोड़ों कमाए. मोदी शायद इससे मिलता-जुलता करिश्मा अगले साल कर पाएं या फिर उन्हें इंतजार करना होगा कि सलमान खान अपनी बीवी-बच्चों के साथ ‘टाइगर’ पर तीसरी बार सवार हो, कोई फिल्म भारत-पाकिस्तान के ज्वाइंट प्रोडक्शन में बने और फिर उन लोगों की ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबीओआर) पर ‘दबंग डांस’ हो.

विराट-अनुष्का की तरह परफेक्ट जोड़ी की तलाश मोदी को

मोदी अनुष्का शर्मा और कीर्तिमान पर कीर्तिमान रचते जा रहे निराले विराट कोहली के आलीशान शादी-समारोह में भी शामिल हुए. उन्होंने उस दढ़ियल दूल्हे से शायद कहा हो कि ‘रब ने बना दी जोड़ी’.

Virushka 5

अगले साल के आखिर तक उन्हें भी अपनी पार्टी के मिशन 2019 के लिए परफेक्ट जोड़ीदार की तलाश करनी होगी.

जहां तक विराट कोहली की बात है वह तो लंका को धूल चटाने के बाद क्रिकेट की पिच से डांस करते हुए शादी के पवेलियन आया और वहां गुरदास मान के साथ भांगड़ा करने पर जुट गया. लंका को धूल चटाने के बाद विराट का डांस करना भी मोदी को भाया होगा क्योंकि राजनयिक एतबार से देखें तो मोदी लंका जीतने में अभी कामयाब नहीं हुए हैं, श्रीलंका अभी चीन के ओबीआर के साथ प्यार की पीगें बढ़ाने में लगा है.

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क्या 2017 का साल हिन्दुस्तानी हाथी का रहा? सर्गेई बुबका की तरह उछाल मारने वाला मार्केट कहेगा- हां, बात तो ऐसी ही है. रेटिंग एजेंसी मूडी भी —जिसका बारे में कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि उसका मूड कब किस तरफ घूम जाएगा— मार्केट की बात पर सहमति में अपना सिर हिला सकती है. अर्थव्यवस्था को अपनी जांघ के मजबूत पुट्ठे दिखाने के मौके नहीं मिले सो उसका जवाब थोड़ा दुविधा भरा हो सकता है.

और, भगवा झंडाधारी जो इस प्राचीन राष्ट्र के हर गली-चौबारे पर उसैन बोल्ट की तरह दौड़ लगाते नजर आ रहे हैं, गलाफाड़ आवाज में कहेंगे कि हां, 2017 का साल हिन्दुस्तानी हाथी का साल रहा. लेकिन इस हाथी की सूंड़ में बहुत सी चीटियां भी चक्कर मार रही हैं.

हिन्दुस्तानी धमक की राह में रोड़े हैं अपार

सुजाता गिडला ने अपनी दमदार और सरगर्म किताब ऐन्टस् अमॉंग एलीफैन्टस् में बड़ी बारीक बुनाई में शोषण और समाजी गिरावट की कहानी लिखी है.

कोई आदमी बाकी लोगों के प्रति इतना क्रूर कैसे हो सकता है, माखौल उड़ाने की मानसिकता से भरी अगड़ी जातियां कैसे पिछड़ी जातियों को अवमानना भरी नजर से देखती हैं, कैसे जिंदगी को ऊंचे मुकाम पर पहुंचाने का जरिया बनी शिक्षा पूरी तरह अंग्रेजीदां रईसों के दबदबे में है, कैसे पुराने पूर्वाग्रह अब भी जिंदा हैं और खत्म होने का नाम नहीं ले रहे, कैसे जाति आदमी के आत्मविश्वास पर आज भी चोट मारती है—यह सब बड़ी बारीक बुनाई में सुजाता गिडला की किताब में दर्ज है.

hindu activist

हिन्दुस्तानी हाथी बेशक पूरी दुनिया में अपनी धमक कायम करने के मंसूबे बांध रहा है, लेकिन ये चीटियां भी देश के कोने-अंतरे में साथ ही साथ दौड़ लगा रही हैं.

बंगाली लोगों के उलट आर्थिक-वृद्धि अब भी ज्यादातर हिन्दुस्तानी तक नहीं पहुंची. नियॉन-लाइट की चमक से नहायी हुई समृद्धि पर शहर में जन्में और शॉपिंग-मॉल के सामानों के सहारे पले-बढ़े लोगों का एकछत्र राज है. चीटियां मर नहीं रहीं, बल्कि उनकी तादाद बढ़ रही है, चाटियां पूरे गर्व से माथ उठाए आगे की ओर दौड़ लगा रही हैं. खेती खत्म हो रही है, किसान मर रहे हैं या कह लें कर्ज से बंधे अपने मजबूर हाथों से खुद का गला घोंट रहे हैं.

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विकास का बुनियादी ढांचा अब भी उस प्रेत की तरह है जिसे दूर-दराज के इलाकों में किसी ने देखा नहीं, बस नाम सुना है. बेशक हिन्दुस्तान का हाथी बढ़ रहा है लेकिन नाचीज नजर आती चीटियां भी दौड़ रही हैं, एकसाथ कदमताल कर रही हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट और #मी टू के तूफान में ध्वस्त होती मान्यताएं

समुद्र की सतह पर प्रवासियों की आवाजाही की कठिन कवायद जारी है और इसे लेकर राष्ट्रवादियों और देसी लोगों में बड़ी चिंता है.

U.S. President Donald Trump delivers remarks to U.S. and Japanese business leaders at the U.S. ambassador's residence in Tokyo, Japan, November 6, 2017. REUTERS/Jonathan Ernst - RC110C37E700

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भोर की पहली किरण धरती पर पड़ने से पहले जग जाते हैं और अपनी ट्वीट्स से अंधकार फैलाना शुरु कर देते हैं ; उग्र दक्षिणपंथी धड़े अपने केकेके ( कू कलक्स क्लान) या फिर ऐसे ही किसी और चोले में नफरत की आग फैलाते रहते हैं. स्टीव बेनॉन जैसे लोग अपनी नफरत और झूठ से अमेरिकी मन-मानस का पतीला गरमाए रखते हैं.

बढ़ता नस्लवाद, घृणा भरे मजाक, पुलिस की बर्बरता और उसका विरोध- यह सारा कुछ खेल को खत्म कर देने की मंशा में जिंदगी की गेंद को अपने पैरों में चिपकाए रहता है और इन सबके बीच डोनाल्ड ट्रंप ट्वीटर पर अपने गुस्से का राष्ट्रगान चालू रखते हैं.

अमेरिका ने भी एक विध्वंसक तूफान देखा—यह #मी टू का तूफान था. इस तूफान ने सफलता का आसमान चूमती कई जिंदगियों को धराशायी कर दिया. महिलाओं ने जबान खोली, उन्होंने सत्ता के सामने सच बोलने का साहस किया. महिलाओं ने कड़वा सच कहा, बिना भय और संकोच के कहा. यह इस या उस पक्ष की बात नहीं , यह चीजों को उसी तरह देखने की बात है जैसी की वे हैं—यही कहा था सूसन सौंटेग ने. सूसन सौंटैग ने लिखा है— सच ऐसी चीज नहीं जिसे जाना जा सके, सच को हमेशा कहना होता है.

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यूरोप में एक बेबुनियाद भय युराबिया (यह बकवास कि इस्लाम यूरोप पर कब्जा कर रहा है) का चलना है. युरोपीय महाद्वीप पर यह भय किसी काले बादल की तरह मंडरा रहा है और यूरोप की अर्थव्यवस्था खुराफाती अफवाहों के बीच डगमगा रही है. ज्यां हास्पाई बहुत खुश होंगे. उनकी किताब द कैंप ऑफ द सेन्टस् को दक्षिणपंथियों के बीच किसी धर्मग्रंथ का सा दर्जा हासिल है और इस किताब को बहुत सालों बाद फिर से पूरे भक्ति-भाव से पढ़ा जा रहा है.

यूरोप पर इस्लामी कब्जे का हौव्वा, शरणार्थियों की शामत

स्टीव बैनॉन इस किताब की कसमें उठाता है, ली पेन अपने समर्थकों से कहती है कि इस किताब को पढ़ो. ज्यां हास्पाइ को अतिवादी दक्षिणपंथियों का बौद्धिक पितामह माना जाता है. सन 1970 के दशक के शुरुआती सालों में उसने लिखा कि फ्रांस पर दुर्भाग्य के मारे और बेजान एशियाई लोग कब्जा कर रहे हैं. और इसके पहले कि हम किसी पड़पीड़क की तरह मुसलमानों के बारे में कुछ ऐसा ही सोचें, एक बात हमें याद रखनी चाहिए, ज्यां हास्पाइ ने लिखा था कि ‘बेजान गांधी के अस्थि-पंजर फ्रांस की किनारों पर अपना डेरा जमा रहे हैं’.

बॉर्डर पार करने के बाद रोहिंग्या शरणार्थियों को मिली खाने की मदद. (रॉयटर्स)

बॉर्डर पार करने के बाद रोहिंग्या शरणार्थियों को मिली खाने की मदद. (रॉयटर्स)

हास्पाइ ने लिखा था कि अस्थि-पंजर का ढांचा मात्रा नजर आते लाखों हिन्दू, भूरे और काले रंग की छिपकलियों की तरह नावों पर सवार होकर आए हैं और फ्रांस को अपना घर बनाना चाहते हैं. उसने लिखा कि तीसरी दुनिया ने अपना कूड़ा-कचड़ा फेंकना शुरु किया है और पश्चिम की दुनिया उसके लिए किसी कूड़ाघर की तरह है.

आतंकवाद, युद्ध और अन्य किस्म की तबाही और अपमान की चोट खाए मुस्लिम शरणार्थी यूरोप पहुंच रहे हैं तो वहां कई लोगों को लग रहा है कि युरोप तीसरी दुनिया के देशों का एक कूड़ाघर बनते जा रहा है.

जर्मनी में नव-दक्षिणपंथ का अगुआ गोत्ज कुबिचेक भी कुछ ऐसी ही बात कहेगा. वह कहेगा कि युरोपीय हाथी के चारो तरफ चीटियां मंडरा रही हैं. अपने पहचान की धरती से बिछड़कर आप्रवासी कहीं बाहर का ठिकाना ढूंढ़ रहे हैं. लेकिन ठिकाना मिलना मुश्किल है.

इतिहास चाहे जितना उबाऊ और नीरस हो, वह निर्वासितों के लिए हमेशा दुर्गम साबित हुआ है. भूगोल की सीमाओं को लांघना चाहे आसान हो लेकिन आस्था और भाईचारे की सीमा-रेखाओं को पार करना आसान नहीं. टोनी जुत्ज ने लिखा था कि इतिहास हमारे साथ हमेशा ही घटित होता है और कोई भी चीज पहले की तरह नहीं होती.

शायद चीजें बदलें, शायद इन निस्सहाय शरणार्थियों के साथ इतिहास घटित हो. शायद यूरोप उस बात पर यकीन करना शुरु करे जो एरियल डोर्फमैन ने लिखा था कि: “हम शरणार्थियों के युग में रहते हैं, यह निर्वासन का युग है”.

सेल्फी और स्नैपचैट के जमाने में बदलता आज

सेल्फी और स्नैपचैट के इस जमाने में कुछ नेता जो सत्ता को चंगुल में किए रहते हैं, आपको यों नाक-भौं चढ़ाकर देखते हैं मानो आप बीते जमाने की ब्लैक एंड ह्वाईट तस्वीर हों. जब यादें और बातें मिनटों में मिट जाती हों तो फिर कोई चीज हमेशा के लिए नहीं टिक सकती. बीता हुआ कल एक याद भर है और आने वाला कल वैसा नहीं होता जैसा कि उसे होना था, यही कहा है बॉब डिलन ने.

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जुमा और मुगाबे जैसे राजनेताओं का भावी कल बदल चुका है. इन नेताओं के मुल्क और अवाम ने इनकी घिनौनी यादों से पीछा छुड़ा लिया, हालांकि कुछ तानाशाह अब भी बचे हुए हैं, उनकी किस्मत और उनका राष्ट्र दोनों सीधे रसातल में जा रहा है.

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निस्हाय जनता दुख से घिरी है लेकिन निकोलस मदुरो (वेनेजुएला) का रांबा नाच जारी है; किम जोंग ऊन किसी खुराफाती बच्चे की तरह रोज ही नए और खतरनाक खिलौनों से खेलता है, वह हर तरफ रॉकेट उछाल रहा है और दुनिया तबाही की आशंका में घबड़ाई हुई है. पूरे साल किन जोंग ऊन कूब्रिक की फिल्म डॉक्टर स्ट्रेन्जलव के जेनरल से कहीं ज्यादा पगलाहट में दिखा.

दुनिया झल्लाहट और गैर-बराबरी से भरी है. फेक न्यूज ने फेसबुक और ट्वीटर के योद्धाओं जरिए अपना साम्राज्य फैला लिया है. सोशल मीडिया अपने असमंजस और उन्माद में नए सिरे से अंधेर नगरी बसा रही है. लेकिन इस अंधेर नगरी में ऐसा कोई संत नहीं जो इसकी छल-छद्म भरी गलियों से सुरक्षित बचाते हुए हमें दूसरे छोर पर ले जाए— उस जगह, जहां अमन और शांति, सन्मति और शालीनता का राज हो.

...तो इसलिए करेंगे सबका स्वैग से स्वागत

और इन सबके बीच हमारे अपने देश में ममता बनर्जी हैं, भेड़िया आया-भेड़िया आया कहकर चिल्लाने वाले विरोधी हैं, हवा में मुट्ठी भांजकर मक्खी मार गिराने पर आतुर दक्षिणपंथियों की जमात है जो हमेशा टीवी पर दिखना चाहती है, प्रचार पाना चाहती है और कल्पना के सहारे रची गई उस पद्मावती रानी पर गुस्सा करती है जिसे संजय लीला भंसाली ने ख्वाबों को तामीर करने वाले बॉलीवुड के रजतपट पर गढ़ा है.

थॉमस मान ने लिखा है कि मिथक जीवन की बुनियाद होते हैं लेकिन जब जिंदगी ‘भेडिया आया-भेड़िया आया’ के शोर और फेक न्यूज के बीच गुजरे, जब हफ्ते के सातों दिन चौबीसों घंटे स्मार्टफोन की गुलामी हो तो ऐसे वक्त में लाखों मिथक एक दिन में बनते और टूटते हैं. ऐसे में बुनियाद कायम करने का वक्त नहीं होता. हम सब ही बड़ी बेताबी से इतिहास लिख रहे हैं, लेकिन यह इतिहास शायद ही किसी पर मेहरबान हो.

साल जब अपने आखिर के मुकाम पर है तो अच्छा है कि हम थॉमस जेफरसन का कहा याद करें. उसने कहा था: 'मैं अतीत के इतिहास से ज्यादा भविष्य के सपनों को पसंद करता हूं.'

हां, हादसों की जद पर हों तो भी मुस्कुराना नहीं छोड़ सकते, जलजलों के डर से घर बसाना नहीं छोड़ सकते. ‘टाइगर जिन्दा’ है और हिन्दुस्तानी हाथी अपनी राह पर पूरी ठसक से चल रहे हैं तो आइए, हम भी कोई जोश भरा गीत गाएं. अब, जबकि 2018 का आगमन हो चुका है तो हम ना सही दूर-दराज की किसी निस्संग टापू पर, अपने संथाल परगना में रहते हुए ही सही, यह तो कह ही सकते हैं कि: ‘स्वैग से करेंगे इसका स्वागत’.

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