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हज सब्सिडी खत्म करना अच्छा कदम लेकिन हिंदू त्योहारों पर सरकारी खर्च भी बंद हो

भारत सरकार को चाहिए कि वह हिंदू पर्व-त्योहारों पर भी रकम खर्च करना बंद करे, धर्मनिरपेक्ष राजसत्ता का यह काम नहीं कि वो धार्मिक त्योहारों पर धन खर्च करे

Tufail Ahmad Updated On: Jan 18, 2018 09:55 AM IST

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हज सब्सिडी खत्म करना अच्छा कदम लेकिन हिंदू त्योहारों पर सरकारी खर्च भी बंद हो

हज पर सब्सिडी खत्म करने के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले का मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों ने ही स्वागत किया है. मक्का की तीर्थयात्रा पर जाने वाले हजयात्रियों को शायद ही पता हो कि सब्सिडी के नाम पर कितनी रकम दी जाती थी और इस सब्सिडी की प्रकृति क्या थी.

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. देश धर्मनिरपेक्ष है क्योंकि हमेशा से इस देश का यही स्वभाव रहा है—ऐसा नहीं है कि इंदिरा गांधी ने जब देश के संविधान की प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्षता’ का शब्द जुड़वाया तब जाकर यह मुल्क सेक्युलर बना. सो, धर्मनिरपेक्ष भारत की सरकार के लिए यह उचित ही है कि वह किसी भी किस्म की धार्मिक गतिविधि को धन ना दे.

क्या हो सरकार का अगला कदम?

सरकार का अगला कदम होना चाहिए कि वह धार्मिक संस्थाओं जैसे कि हिंदू मंदिरों के प्रशासन के कामकाज से अपने को अलग करे क्योंकि ये संस्थाएं अपने धन का इस्तेमाल कर खुद को नृत्य-संगीत और भारतीय साहित्य के विश्वविद्यालय में तब्दील कर सकती हैं. सरकार को मानसरोवर यात्रा के लिए भी सब्सिडी देना बंद कर देना चाहिए. मानसरोवर यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी 2015 में अखलेश यादव की सरकार ने 25000 रुपए से बढ़ाकर दोगुनी कर दी और 2017 में योगी सरकार ने फिर से दोगुना इजाफा करते हुए इसे प्रतिव्यक्ति 100000 रुपए कर दिया. कर्नाटक में चारधाम यानी बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा के लिए प्रति व्यक्ति 20 हजार रुपए की रकम दी जाती है.

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भारत सरकार को चाहिए कि वह हिंदू पर्व-त्योहारों पर भी रकम खर्च करना बंद करे. फिलहाल अकेले उज्जैन के महाकुंभ पर ही सरकार 5000 करोड़ रुपए खर्च करती है. साल 2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने उत्तरप्रदेश के सिंचाई और शहरी विकास के मद की 800 करोड़ की रकम इलाहाबाद में कुंभ मेले के आयोजन में दे दी थी. धर्मनिरपेक्ष राजसत्ता का यह काम नहीं कि वो धार्मिक त्योहारों पर धन खर्च करे. हां, सड़क, पानी, बिजली जैसे बुनियादी ढांचे के काम पर रकम खर्च करना जरूर ही उसका काम है. हज सब्सिडी के नाम पर 2013 में 680 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे और 2016 में सब्सिडी की यह रकम घटकर 405 करोड़ रुपए रह गई. हज सब्सिडी की इस रकम से कई गुना ज्यादा रकम हिंदू त्योहारों में खर्च होती है.

भारत सरकार को चाहिए कि वह हज के प्रबंधन के काम से भी अपने को अलग कर ले. ऐसा करना जरूरी है क्योंकि हज के प्रबंधन में सरकार के शामिल होने से मामले का राजनीतिकरण हुआ है जबकि हज तो निहायत धार्मिक मामला है.

Hajj Hindi

खत्म हों हज कमिटियां

सरकार ने अलग-अलग राज्यों में हज कमिटी बनाई है. ये समितियां सियासत का मंच बन चली हैं. सो, इन्हें जरूर ही खत्म कर देना चाहिए. चूंकि विभिन्न देशों के हजयात्रियों की संख्या सऊदी अरब तय करता है इसलिए कौन से भारतीय मुस्लिम तीर्थयात्री हज की यात्रा पर जाएंगे यह लॉटरी सिस्टम के जरिए तय किया जा सकता है. एक बार किसी तीर्थयात्री को टोकन नंबर मिल जाए तो उसे अपनी फ्लाइट बुक कराने और निजी विमान-सेवा के जरिए हज की यात्रा पर जाने के लिए आजाद माना जाए.

फिलहाल सऊदी अरब 1,75,025 हिंदुस्तानी मुसलमानों को हज पर आने की अनुमति देता है. यह कोई बड़ी तादाद नहीं है. इस तादाद में शामिल हज यात्रा पर जाने वाला हर व्यक्ति अपनी फ्लाइट, यात्रा, भोजन और ठहरने का खर्च उठा सकता है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हज सब्सिडी खत्म करने के फैसले का स्वागत करते हुए जो टिप्पणी की है, वह अपने आप में बहुत कुछ कहती है.

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बोर्ड ने कहा कि 'सब्सिडी हज पर जाने वालों को नहीं दी जा रही थी, वह दी जा रही थी एयर इंडिया को जो घाटे में चल रही है. यह तो एक बहाना था, सब्सिडी के नाम पर मुसलमानों को ठगा गया.' लोगों ने सरकार बनाई कि उनकी जिंदगी बेहतर होगी लेकिन सरकारें बहुत बड़ी होती गईं और आखिर को एक जरूरी बुराई बन गईं. हज यात्रियों का सरकारी एयरलाइन से तीर्थयात्रा पर जाना सरकार को निश्चित ही रोकना चाहिए.

एक बार हज-यात्रियों को दूसरे एयरलाइंस से अपना टिकट खरीदने की अनुमति मिल जाए तो निजी विमान-यात्रा की सेवा देने वालों के बीच प्रतिस्पर्धा शुरु हो जाएगी. ऐसे में एयरटिकट की कीमत निश्चित ही कम होगी. मिलने वाली वास्तविक डिस्काउंट (छूट), या फिर आप चाहें तो कह लें सब्सिडी, से हजयात्रियों को फायदा होगा. अ

गर मौजूदा सरकार हज यात्रा पर जाने वाले भारतीय मुसलमानों को सरकारी विमान-सेवा एयरइंडिया से जाने पर मजबूर करने से बाज नहीं आती और हिंदू त्योहारों पर धन खर्च करना नहीं रोकती तो उसपर आरोप लगेंगे कि हज पर दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करने का फैसला अपने मिजाज से सांप्रदायिक है और यह फैसला हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए किया गया है.

हालांकि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुकूल है लेकिन यह तथ्य बचा रह जाता है कि मानसरोवर यात्रा या फिर कुंभ मेला के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी नहीं बल्कि हज-सब्सिडी एक धारदार सियासी मुद्दा बनकर उभरी और इसका सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को फायदा हुआ.

Mukhtar Abbas Naqvi

केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी

क्या हैं नकवी के बयान के मायने 

अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने 16 जनवरी को हज-सब्सिडी खत्म करने के फैसले का एलान करते हुए कहा कि 'हज-सब्सिडी की रकम का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों और महिलाओं के शैक्षणिक सशक्तिकरण में किया जाएगा.'

यह बात बिल्कुल समझ में आती है कि लोकतंत्र में जो लोग किन्हीं कारणों से पीछे हैं उन्हें सामाजिक कल्याण के नाम पर मदद दी जाने चाहिए लेकिन नकवी के इस बयान से गंभीर सवाल उठते हैं. इस बयान का एक मायने यह है कि मोदी सरकार जिसे बीते वक्त की और कथित सेक्युलर सरकारों से अलग माना जाता रहा है, खुद अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण में यकीन करती है. किसी सेक्युलर गणराज्य में नीतियां धर्म-समुदाय को केंद्र में रखकर नहीं बनाई जातीं. नीतियों की एकमात्र कसौटी नागरिक को बनाया जाना चाहिए. ऐसा हर भारतीय नागरिक जो गरीबी-रेखा के नीचे है, चाहे वह किसी भी जाति या मजहब का हो—सामाजिक कल्याण के तहत दिए जा रहे फायदों का हकदार है. चूंकि मुसलमान गरीब हैं, सो वे खुद-ब-खुद सामाजिक कल्याण की नीतियों के लाभार्थी बन जाएंगे. हज-सब्सिडी खत्म करते अल्पसंख्यकों की नई राजनीति शुरू करना बंद कीजिए.

(तुफैल अहमद मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट, वाशिंग्टन डीसी, में इस्लामिज्म एंड काउंटर रेडिकलाइजेशन इनिशिएटिव के सीनियर फेलो हैं. वे @tufailelif नाम से ट्वीट करते हैं.)

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