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तथाकथित हज 'सब्सिडी' के छलावे को खत्म कर सरकार ने अच्छा ही किया

महंगे दाम की वजह से सरकार हज सब्सिडी का छलावा दिखा पा रही थी. यह पूरी गतिविधि केवल एक सरकारी एजेंसी से पैसे को दूसरी एजेंसी के पास तक पहुंचाने की है

Sandipan Sharma Sandipan Sharma Updated On: Jan 18, 2018 11:27 AM IST

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तथाकथित हज 'सब्सिडी' के छलावे को खत्म कर सरकार ने अच्छा ही किया

एक शख्स को खुले बाजार में 35 रुपए में मिल रही किसी चीज को खरीदने के लिए 110 रुपए चुकाने पड़ते हैं. लेकिन अपनी उदारता दिखाने के लिए सरकार हस्तक्षेप करती है और बढ़ी हुई कीमत का 45 पर्सेंट हिस्सा अपनी जेब से देने का वादा करती है. ऐसे में उस शख्स को 60 रुपए चुकाने पड़ते हैं और सरकार बेचने वाले को सीधे 50 रुपए देने का वादा करती है.

अब इसको लेकर एक सवाल खड़ा हो रहा हैः क्या सरकार खरीदार को सब्सिडी दे रही है या उससे और ज्यादा पैसे वसूल रही है? क्या यह उदारता है या मोनोपॉली के चलते मुनाफाखोरी करना है? मुझे लगता है कि एक प्राइमरी का स्टूडेंट भी इस गणित को हल कर लेगा और आपको जवाब बता देगा.

हज सब्सिडी वापस लेना बीजेपी के लिए एक अच्छी राजनीति हो सकती है. लेकिन, एयर इंडिया के लिए यह निश्चित तौर पर खराब चीज है क्योंकि हज ट्रैफिक पर इसका एकाधिकार है.

तथाकथित सब्सिडी वापस लेना आंकडों की जादूगरी

इस तथाकथित सब्सिडी को वापस लेना आंकड़ों के साथ जादूगरी करने जैसा है. यह कुछ ऐसा ही है कि किसी की जेब से पैसे निकाल लिए जाएं और उसका आधा हिस्सा उसे दान कर दिया जाए. सरकार ने एयर इंडिया को हज सीजन में कमाई और शायद प्रॉफिट के गारंटीड जरिए से वंचित कर दिया है.

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इससे पहले कि हम हज बनाम कुंभ मेला सब्सिडी की बहस में जाएं, हमें हज के अर्थशास्त्र को समझना होगा. मान लीजिए कि एक तीर्थयात्री श्रीनगर से मदीना जा रहा है. अगर उसके पास एयरलाइन चुनने की आजादी हो तो वापसी का किराया, खासतौर पर अगर टिकट को एडवांस में बुक किया जाए तो, करीब 35,000 रुपये बैठता है. दिल्ली के लिए रिटर्न टिकट का खर्च करीब 8,000 रुपये बैठता है. और वहां से जेद्दाह जाना और वापस आना करीब 2,800 रुपये का बैठता है. (एयर साउदिया, दिल्ली-जेद्दाह, 15 मार्च के बाद और 20 मार्च के रिटर्न के लिए, 17 जनवरी 2018 को किरायों की लिस्ट के हिसाब से).

अब देखते हैं कि सब्सिडी सिस्टम का क्या खेल है? टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रीनगर से जेद्दाह जाने के लिए सब्सिडी राज के तहत उसी तीर्थयात्री को करीब 1.10 लाख रुपए चुकाने पड़ते हैं. इस 1.10 लाख रुपए में से तीर्थयात्री को 55 पर्सेंट हिस्सा चुकाना पड़ता है जो कि करीब 60,000 रुपए बैठता है. बकाया 45 पर्सेंट हिस्सा सरकार एयर इंडिया को हज सब्सिडी के नाम पर रीइंबर्स करती है.

आसान गणित से भी यह समझा जा सकता है कि हाजियों से ज्यादा पैसा वसूला जा रहा था. सब्सिडी का पूरा दावा महज आंखों में धूल झोंकने जैसा है. गल्फ न्यूज ने तर्क दिया है कि सरकार ने एक ऐसी चीज वापस ले ली है जो मौजूद ही नहीं थी.

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एयर इंडिया के पास हज सीजन के दौरान ज्यादा महंगे टिकट बेचने का स्पष्टीकरण है. इसका तर्क है कि सउदी सरकार की पाबंदियों के चलते उसके जहाजों को वापसी में खाली लौटना पड़ता है. लेकिन, खाली जहाज आने पर भी किराए में 175 पर्सेंट का इजाफा (35,000 रुपए बनाम 1,10,000 रुपए) जायज नहीं बैठता है.

एक एजेंसी से दूसरी एजेंसी को पहुंचाए जा रहे पैसे

सीधे तौर पर देखा जाए तो महंगे दाम की वजह से सरकार हज सब्सिडी का छलावा दिखा पा रही थी. यह पूरी गतिविधि केवल एक सरकारी एजेंसी से पैसे को दूसरी एजेंसी के पास तक पहुंचाने की है. चूंकि इसमें कोई वास्तविक बचत नहीं होती है, ऐसे में केवल सरकार ही यह बता सकती है कि कैसे वह हज सब्सिडी के पैसे को दूसरी कल्याणकारी स्कीमों पर लगाएगी?

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इन सब चीजों से हालांकि, बीजेपी को कोई मतलब नहीं है. फिलहाल पार्टी इस फैसले को हिंदुत्व की पाठशालाओं में पढ़ाने में लगी है और अल्पसंख्यक कल्याण के ऊंचे दावे कर रही है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर एक बार में तीन तलाक को बैन करने जैसे रिफॉर्म करने, हज सब्सिडी को खत्म करने जैसी चीजें पार्टी के हित में हैं. अपने कोर वोटर को लुभाने के साथ ही पार्टी को मुसलमानों की ओर से भी वाहवाही मिल रही है.

इसके बावजूद पार्टी अपनी धार्मिक राजनीति के आरोपों से बच नहीं सकती है. अगर हज सब्सिडी खत्म करना जायज है तो हिंदू त्योहारों, मेलों और यात्राओं पर सरकार क्यों पैसे खर्च करती है? शायद सरकार को लगता है कि कुंभ मेलों और मानसरोवर यात्रा पर खर्च से हिंदू वह पा सकते हैं जिससे मुस्लिमों को हज सशक्तिकरण के जरिए रोक दिया गया है. या जैसा कि शायर इकबाल ने अपने मशहूर शिकवा में लिखा हैः बर्क गिरती है बेचारे मुसलमानों पर (बिजली केवल गरीब मुसलमानों पर ही गिरती है)?

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