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जब जाट, राजपूत और सिख रेजिमेंट हो सकती है तो अहीर रेजिमेंट क्यों नहीं?

गुड़गांव से कुछ ही दूरी पर खेड़की दौला में 23 सितंबर से हजारों युवा और बुजुर्ग धरना दे रहे हैं. इनकी मांग है इंडियन आर्मी की जाट रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट इत्यादि की तर्ज पर अहीर रेजीमेंट बनाना.

Updated On: Oct 02, 2018 01:34 PM IST

JYOTI YADAV JYOTI YADAV
स्वतंत्र पत्रकार

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जब जाट, राजपूत और सिख रेजिमेंट हो सकती है तो अहीर रेजिमेंट क्यों नहीं?

गुड़गांव से कुछ ही दूरी पर खेड़की दौला में 23 सितंबर से हजारों युवा और बुजुर्ग धरना दे रहे हैं. ये लोग हरियाणा, राजस्थान, यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात राज्यों से आये हैं. उनमें से आठ युवा लगातार अनशन पर बैठे थे. एक अक्टूबर को सागर, मध्य प्रदेश से बीजेपी सांसद लक्ष्मीनारायण यादव ने उन लोगों का अनशन तुड़वाया.

ये भीड़ हिंदू जाति के यादवों या अहीरों की है. इनकी मांग है इंडियन आर्मी की जाट रेजीमेंट, राजपूत रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट इत्यादि की तर्ज पर अहीर रेजीमेंट बनाना. सुनने में ये मांग जातिवादी परिप्रेक्ष्य से उपजी लगती है, पर आश्चर्यजनक रूप से ये भारत के ब्रिटिशकालीन इतिहास की विषमताओं से लेकर अभी बेरोजगारी की समस्याओं से जुड़ी है.

ये मांग आजाद भारत की उन विषमताओं को भी रेखांकित करती है, जिनको छोटा मानकर उपेक्षित किया गया, परंतु कालांतर में वही मांगें भीड़-न्याय का प्रतीक बन गईं. 21वीं सदी के भारत को ब्रिटिशकालीन भारत के राजनीतिक अन्याय का नतीजा भुगतना पड़ रहा है.

इस मांग का क्या मतलब है

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तस्वीर: महेश मुकदम

आजादी के बाद से ही चली आ रही इस मांग के दो पहलू हैं. पहला पहलू जातीय अस्मिता को लेकर है, जो ब्रिटिशकालीन भारतीय सेना के प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान दिखाए गये शौर्य को लेकर है. धरने में शामिल लोग मानते हैं कि ब्रिटिश सेना में लड़ने के आधार पर जाट रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट सब बनाए गए तो अहीरों को क्यों छोड़ा गया? जबकि अहीरों ने इनसे ज्यादा संख्या में सैनिक के तौर पर जंग की थी. ब्रिटिश भारत ने जो किया वो किया, आजाद भारत ने जनरल के एम. करियप्पा की जातिगत आधार पर बनी रेजिमेंट को हटाने की मांग खारिज कर उसी व्यवस्था में काम करना पसंद किया.

देखने में ये आश्चर्यजनक लगता है, पर खेड़की दौला में इकट्ठा भीड़ में नब्बे-नब्बे साल के बूढ़े भी बैठे हैं मांग को लेकर. रेवाड़ी के डॉक्टर ईश्वर यादव, जो वहीं के पूर्व विधायक के भाई हैं, ने इस मांग के लिए अपने जीवन के 40-45 वर्ष दिए हैं. ईश्वर सिंह ने अपने सपोर्ट में कई डॉक्यूमेंट्स इकट्ठा किए हैं. अपने समर्थन में वो एक अंग्रेज ऑफिसर मेजर बिंगले का उल्लेख करते हैं. वो कहते हैं कि अहीरों ने 1857 की क्रांति से लेकर चीन-पाकिस्तान तक की लड़ाइयों में हिस्सा लिया है तो इस योगदान को क्यों नकारा जा रहा है. अगर जातिगत आधार हटाना था तो सबका हटाना था. अंग्रेजों ने 1892 में सेना का पुनर्गठन किया और सेना को जातिगत आधार पर बांट दिया. भारत सरकार ऐसा क्यों कर रही है?

ईश्वर सिंह ने इस मामले में जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की थी. वो बताते हैं कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया था. जहां पर इनकी मुलाकात आर्मी के एक बड़े अफसर से हुई थी जिसने उनको धमकी दी थी कि ये कूड़ा मामला है और फाइल फेंक दी जाएगी. उनका प्रश्न ये है कि जब आर्मी जातिगत आधार पर भर्तियां नहीं करती तो जातिगत आधार पर रेजिमेंट बनाने की क्या आवश्यकता है?

इस मांग का दूसरा पहलू नौकरी को लेकर है. धरने में मौजूद लोगों का मानना है कि जातिगत आधार पर रेजिमेंट बनने की वजह से भर्तियों के दौरान परोक्ष रूप से पक्षपात होता है. वो ये भी कहते हैं कि अहीर समाज में उतनी सुविधा न होने की वजह से सेना में अफसर बनना संभव नहीं है. अफसरों के बेटे सैनिक स्कूलों में पढ़ते हैं और वही अफसर बन जाते हैं. ऐतिहासिक आधार पर अहीर या अन्य पिछड़ी जातियों के बच्चे अफसर नहीं बन पाए हैं. वो सेना में मिलनेवाली मेडिकल सहायता और कैंटीन सुविधा का भी उल्लेख करते हैं. कहते हैं कि हमारे समाज के लिए इतनी भी सुविधा नहीं है.

गौरतलब है कि अहीर रेजीमेंट की मांग भारतीय सेना के एक बहुत छोटे हिस्से को निरूपित करती है. भारतीय सेना में तमाम सेक्शन हैं, जिनमें इनफैंट्री सैनिकों की ये रेजिमेंट्स है. ये सारी मांग इनफैंट्री में जाने को लेकर है.

भारतीय सेना का क्या कहना है इस मसले पर

सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दाखिल होने के बाद 2013 में भारतीय सेना ने कहा था कि आर्मी जातिगत आधार पर भर्तियां नहीं करती. जाट रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट जैसे नाम सिर्फ प्रशासनिक सुविधा को लेकर चल रहे हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि एक क्षेत्र के सैनिकों का एक तरीके से प्रशासनिक इंतजाम हो पाए. पर ईश्वर सिंह का कहना है कि एक क्षेत्र के विभिन्न जातियों के सैनिक जाट या राजपूत या किसी भी अन्य जाति के नाम पर अपनी पहचान क्यों बनाये.

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तस्वीर: महेश मुकदम

साथ ही ईश्वर सिंह प्रेसिडेंशियल बॉडीगार्ड्स के जातिगत आधार पर निकली वैकेंसी का भी जिक्र करते हैं. 2013 में ये मसला मीडिया में खूब उछला था जब सेना ने इस राष्ट्रपति के सुरक्षा इंतजाम के लिए सिर्फ हिंदू जाट, हिंदू राजपूत, सिख के लिए वैकेंसी निकाली थी. ईश्वर सिंह का कहना है कि ये अपने तरह की अकेली सरकारी नौकरी है जिसमें जाति को आधार बनाया गया है. ये संविधान के खिलाफ है. ये मामला भी कोर्ट में गया. वहां पर इंडियन आर्मी ने ये तर्क दिया कि सुरक्षा सैनिकों में एकरूपता के लिए ऐसा किया जाता है. ये सब भारत के राष्ट्रपति के ऐश्वर्य को दिखाने के लिए होता है. मामला रफा-दफा हो गया.

इतिहास क्या कहता है

ब्रिटिशकालीन भारत में 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजी सरकार ने देश और सेना को जाति और धर्म के आधार पर देखना शुरू किया. उस वक्त मार्शल और नॉन-मार्शल जातियों का कॉन्सेप्ट लाया गया. इसी आधार पर जाट रेजिमेंट, सिख रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट इत्यादि खड़ी की गईं. पर बाद में जरूरत पड़ने पर बाकी जातियों को भी सेना में भर्ती कर लिया. 1941 में महार रेजिमेंट बनाई गई. जो कि आज भी विद्यमान है. उसके साल भर बाद चमार रेजिमेंट भी बनाई गई जिसे बाद में भंग कर दिया गया.

हालांकि इसके अलावा क्षेत्र के आधार पर पंजाब रेजिमेंट, बिहार रेजिमेंट, मद्रास रेजिमेंट इत्यादि भी खड़ी की गईं. 2005 के आस-पास लालकृष्ण आडवाणी गुजरात गए थे तब वहां की जनता की मांग पर उन्होंने गुजरात रेजिमेंट बनवाने का वादा किया था. जो बाद में पूरा नहीं हो पाया.

राजनीति क्या कहती है

धरने में मौजूद राव अजीत सिंह का मानना है कि इस मांग से ज्यादा नेताओं का फायदा नहीं हो रहा क्योंकि अहीर वोट एकजुट नहीं हैं, इसलिए नेता ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे. हालांकि कुछ सांसद जरूर मिलने आते हैं. यूपी और बिहार के अहीर अपनी पार्टी पॉलिटिक्स में व्यस्त हैं. ऐसे में वही अहीर यहां आ सकते हैं जो सेना को लेकर पैशनेट हों.

narendra modi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनाव जीतने के बाद रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों को संबोधित किया था. हालांकि उन्होंने अहीर रेजिमेंट से जुड़ी कोई बात नहीं की थी, पर लोग उस संबोधन को इस दिशा में एक कदम ही मानते हैं.

2019 लोकसभा चुनाव के हिसाब से अब ये मांग राजनीतिक होती जा रही है. मौजूदा सरकार पर वैसे ही बेरोजगारी को लेकर आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में धरने पर बैठे लोग अपनी मांग को लेकर और जोश में आते दिख रहे हैं. राव अजीत सिंह के मुताबिक 30 सितंबर को लगभग बीस हजार लोगों की रैली हुई थी. लोगों का कहना है कि 18 अक्टूबर को गुजरात में रैलियां की जाएंगी. इसके बाद देश के कई जिलों तक जाने का भी प्लान है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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