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देश में नकारे जाने के बाद अब विदेशी धरती पर ‘राहुल –राग’ कितना असरदार होगा ?

शायद राहुल गांधी पिछले एक साल के अपने बयानों और उसके असर का आकलन नहीं कर पा रहे हैं

Amitesh Amitesh Updated On: Nov 08, 2017 06:13 PM IST

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देश में नकारे जाने के बाद अब विदेशी धरती पर ‘राहुल –राग’ कितना असरदार होगा ?

नोटबंदी की पहली सालगिरह पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर फिर से हमला बोला है. राहुल गांधी ने इस बार लंदन से छपने वाले अंग्रेजी अखबार फाइनेंशियल टाइम्स का सहारा लिया है. फाइनेंशियल टाइम्स के अपने लेख में राहुल गांधी ने नोटबंदी के एकतरफा फैसले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा प्रहार किया है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर अंग्रेजी अखबार फाइनेंशियल टाइम्स में अपने लेख में मोदी सरकार पर बड़े आरोप लगाए हैं. उन्होंने लिखा है कि इस फैसले के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक समय फल-फूल रही अर्थव्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को खत्म कर दिया है.

राहुल गांधी ने अपने लेख में नोटबंदी के कारण भारत के दो प्रतिशत जीडीपी खत्म होने, इनफॉर्मल सेक्टर के तबाह होने और कई लघु और मध्यम उद्योगों के बंद होने जाने का दावा किया.

नोट बैन

राहुल ने बुधवार को यह बात फाइनेंशियल टाइम्स में ‘मोदीज रिफॉर्म हैव रॉब्ड इंडिया ऑफ इट्स इकोनॉमिक प्रोवेस' शीर्षक से प्रकाशित लेख में कही हैं. उन्होंने आगे लिखा है कि एक साल पहले प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय रिजर्व बैंक की अनदेखी करने के साथ-साथ ‘अपने मंत्रिमंडल को एक कमरे में बंद कर’ अपनी एकतरफा योजना की घोषणा की थी और ऐसा करते वक्त देश के लोगों को महज चार घंटे भर का नोटिस दिया.

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राहुल गांधी की तरफ से इस लेख के जरिए प्रधानमंत्री मोदी को देश के भीतर भी और विदेशों में भी घेरने की कोशिश की गई है. लेकिन, ऐसा करते वक्त हमें इस बात को समझना होगा कि राहुल गांधी आखिरकार ऐसा क्यों कर रहे हैं?

इसे समझने के लिए हमें एक साल पहले 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी के बाद राहुल गांधी के बयान और विरोध में उनके सभी कदम को समझना होगा.

नोटबंदी के लागू होने के साथ ही विरोधी दलों की तरफ से सरकार को घेरने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी. उस वक्त घंटों लाइन में लगने वाले लोगों की परेशानी और उस परेशानी पर हो रही सियासत चरम पर थी.

नोटबंदी के 13 दिन बाद ही राहुल गांधी खुद 21 नवंबर को सुबह-सुबह दिल्ली में संसद मार्ग के एसबीआई के सामने लाइन में खड़े हो गए थे. लोगों के बीच जाकर लोगों की परेशानी को साझा करने की उनकी कोशिश दर्द पर मरहम लगाने की थी.

rahul gandhi

हमला उसके बाद भी जारी रहा. हर मंच से नोटबंदी को बेमतलब का कदम बताकर राहुल गांधी को लगने लगा कि अब जनता उनके ही साथ होगी. मोदी के नोटबंदी के चलते कालेधन पर प्रहार की अपील शायद फुस्स हो जाएगी, इसी उम्मीद में राहुल गांधी आगे भी देश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर अपनी मुहिम चलाते रहे.

नए साल में नई उम्मीदों के साथ राहुल गांधी को लगा कि अब 2017 में नोटबंदी से त्रस्त जनता की बारी है. लाइन में खड़े देश के करोड़ों लोगों को शायद अब मोदी को सबक सिखाने की बारी है. खासतौर से उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में तो राहुल की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही हो गई थीं.

इसी गणित में राहुल गांधी लगातार फरवरी-मार्च तक नोटबंदी को लेकर मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग की परेशानी के मुद्दे को उठाते रहे. उन्हें लगा कि यूपी विधानसभा चुनाव के वक्त इस मुद्दे पर जनता उन्हीं के साथ रहेगी. ऐसा करते वक्त राहुल गांधी शायद भूल गए थे कि तबतक एटीएम से पैसे भी निकलने लगे थे और लंबी-लंबी कतारें भी छोटी होने लगी थीं.

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चुनाव नतीजे के बाद साफ हो गया कि राहुल गांधी के नोटबंदी पर नजरिए को जनता ने नकार दिया है. उनका फॉर्मूला फेल हो गया.

लेकिन, शायद राहुल गांधी को अभी भी उम्मीद है. यूपी में नोटबंदी के फेल होने के बाद भी मोदी के गुजरात में उन्हें उम्मीद की किरण दिखती है. यह उम्मीद इसलिए भी और ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि, उन्हें नोटबंदी के बाद जीएसटी की मार से परेशान कारोबारियों के भीतर की नाराजगी दिख रही है.

नोटबंदी की पहली सालगिरह के दिन राहुल गांधी गुजरात के सूरत पहुंच कर काला दिवस मनाते दिखे. फिर से नोटबंदी को लेकर निशाना साधा. लेकिन, देश में इतना सबकुछ करने के बावजूद राहुल गांधी अब विदेशी अखबार में अपने लेख से नोटबंदी से नुकसान का हवाला दे रहे हैं. शायद वो समझ नहीं पा रहे हैं कि नोटबंदी पर पहले ही जनता अपना फैसला सुना चुकी है. इस पुराने मुद्दे को उठाने से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं. शायद राहुल गांधी पिछले एक साल के अपने बयानों और उसके असर का आकलन नहीं कर पा रहे हैं.

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