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यूपी में गन्ना किसानों पर ग्राउंड रिपोर्ट: जिन्ना के ऊपर गन्ना की जीत की असली कहानी ये है

बीजेपी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे जिन्ना के पोस्टर का मुद्दा उछाला तो गठबंधन उम्मीदवार तबस्सुम हसन के समर्थन में आरएलडी के नेता जंयत चौधरी बोले- कैराना में जिन्ना का मुद्दा चलेगा या गन्ना का?

Updated On: Jul 03, 2018 07:14 AM IST

Vivek Anand Vivek Anand
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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यूपी में गन्ना किसानों पर ग्राउंड रिपोर्ट: जिन्ना के ऊपर गन्ना की जीत की असली कहानी ये है

किसान तो हर वक्त परेशान है साहब. पहले भी परेशान था, आज भी है. हमारी जिंदगी तो इस उम्मीद में ही गुजर जाती है कि कभी हमारे गन्ने की फसल की तरह जीवन में भी मिठास होगी. लेकिन हकीकत का स्वाद कड़वा ही है. गन्ना उपजाने में खुद को खपा दिया, मेहनत से पैदा की फसल को काटकर चीनी मिलों तक पहुंचा दिया. लेकिन पैसे के लिए अब तक इंतजार कर रहे हैं. सरकार ने कहा था कि फसल देने के 14 दिन के भीतर किसानों को पैसे का भुगतान होगा. अभी तक चीनी मिल वालों ने पैसे नहीं दिए हैं. फरवरी में आखिरी बार पेमेंट किया था. उसके बाद से एक पैसा नहीं मिला है. चुनाव आए, चले गए. नेताओं ने वादा किया, कुछ नहीं हुआ. जिन्ना के ऊपर गन्ना को जीत तो मिल गई लेकिन गन्ना उपजाने वाला किसान अब भी हारा हुआ महसूस कर रहा है.

प्रदीप कुमार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शामली के बंतीखेड़ा गांव के रहने वाले गन्ना किसान हैं. वो गन्ना किसानों के हालात बताते हुए सरकार की नाकामियों का पुलिंदा खोल देते हैं. कैराना लोकसभा क्षेत्र में आने वाले बंतीखेड़ा गांव के लोगों ने हाल ही में हुए उपचुनाव में वोट डाला है. पूरे चुनाव में चीनी मिलों के ऊपर गन्ना किसानों के बकाए का मुद्दा छाया रहा.

बीजेपी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगे जिन्ना के पोस्टर का मुद्दा उछाला तो गठबंधन उम्मीदवार तबस्सुम हसन के समर्थन में आरएलडी के नेता जंयत चौधरी बोले- कैराना में जिन्ना का मुद्दा चलेगा या गन्ना का? इलाके के किसानों के दिल के करीब इस अपील ने उन्हें गठबंधन उम्मीदवार की तरफ मोड़ दिया. जिसका नतीजा रही तबस्सुम हसन की जीत. लेकिन इसके बाद क्या स्थितियां बदल गईं?

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में हम चुनावी हलचल का गुबार शांत पड़ जाने के बाद गन्ना किसानों के हालात का जायजा लेने पहुंचे थे. आखिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की इतनी दुर्दशा क्यों हो रही है? इसके पीछे चीनी मिल मालिकों की चालबाजी है या सरकारी नीतियों की खामी? हर साल गन्ना उगाकर घाटा सहने वाला किसान कुछ और क्यों नहीं उगा लेते? क्या सिय़ासत की चाशऩी में डूबकर गन्ने का मसला इतना बड़ा हुआ है या इसके पीछे कुछ और भी वजह है? इन्हीं सारे सवालों के साथ हम जमीनी हकीकत की पड़ताल करने निकले थे.

तबस्सुम हसन

तबस्सुम हसन

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए गन्ना सिर्फ उनकी जीविका का प्रश्न नहीं है. गन्ना एक राजनीतिक मुद्दा है, जो लोकतंत्र में किसानों के कद और वजन को तय करता है. वोट लेने से पहले किसानों का पलड़ा भारी होता है, इसलिए गन्ने की फसल को लेकर चमकदार दावे और वादे किए जाते हैं और चुनावों के बाद किसानों की हैसियत रस निकाल लिए गए गन्ने की खोई के बराबर हो जाती है, फिर उनकी सुध लेने की जरूरत किसी को महसूस नहीं होती.

हालांकि कैराना उपचुनाव के नतीजों के बाद गन्ने की राजनीति में किसान की स्थिति मजबूत हुई है. जिन्ना के ऊपर गन्ना की जीत ने कम से कम इतना किया है कि उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार की हार के बाद केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों के लिए 8500 करोड़ के पैकेज का ऐलान किया. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने खुद 5 राज्यों के 100 से ज्यादा गन्ना किसानों से मुलाकात की. उन्हें भरोसा दिया कि दो हफ्ते के भीतर अगले सीजन के गन्ने की फसल के लिए सरकार बेहतर पॉलिसी लेकर आएगी.

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किसानों को वक्त पर फसल का पैसा मिले इसके मैकेनिज्म पर काम किया जाएगा. प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को ये यकीन दिलाया है कि लागत मूल्य से 50 फीसदी बढ़ाकर गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाएगा. सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने पर काम कर रही है. पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुजफ्फरनगर से सांसद संजीव बालियान ने यहां तक दावा किया कि 8500 करोड़ के पैकेज में से 4000 करोड़ पिछले दिनों किसानों के बीच बांटे जा चुके हैं.

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शामली के थानाभवन विधानसभा क्षेत्र के बंतीखेड़ा गांव के लोग गन्ने की बात उठते ही शिकायतों को पिटारा खोल कर बैठ जाते हैं. सबसे बड़ी शिकायत सुरेश राणा से है, जो इसी इलाके से विधायक और योगी सरकार में गन्ना मंत्री हैं. लोग नाराजगी जताते हुए कहते हैं कि सुरेश राणा को किसानों की हालत पता है. फिर भी उन्होंने कुछ नहीं किया.

लोगों को उम्मीद थी कि इस इलाके का होने की वजह से वो किसानों का मर्म समझेंगे. लेकिन वो चीनी मिल मालिकों की गोद में बैठ गए हैं. इलाके के बीजेपी समर्थक भी सुरेश राणा के खिलाफ खुलकर बोलते हैं. हालांकि वो गन्ने के मुद्दे को सुरेश राणा की नाकामी बताकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व और केंद्र सरकार को संदेह का लाभ देते हुए उनका बचाव भी करते हैं.

बंतीखेड़ा गांव के पूर्व प्रधान मेहबूब खान कहते हैं, ‘एक तो गन्ना किसानों को उनके फसल की पेमेंट नहीं दी गई. दूसरी तरफ सरकार किसानों को बिजली का बढ़ा हुआ बिल भेजे जा रहे हैं. किसानों के लिए ये दोतरफा मार है.’

पिछले साल नवंबर में यूपी सरकार ने बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी की थी. ग्रामीण इलाकों में बिजली की दरें करीब दोगुनी हो गईं. ग्रामीण उपभोक्ताओं को अब 100 यूनिट तक 3 रुपये प्रति यूनिट, 100 से 150 यूनिट तक 3.50 रुपये प्रति यूनिट और 150 से 300 यूनिट के लिए 4.50 रुपए प्रति यूनिट के हिसाब से भुगतान करना पड़ रहा है. किसान बिजली के बढ़े हुए दामों के विरोध में हैं.

बंतीखेड़ा गांव के किसान गन्ने की पर्चियां लेकर हमारे पास आ जाते हैं. इन पर्चियों में उनके फसल का वजन और उसे मिल में जमा करने की तारीख लिखी है. कुछ लोगों के 60-65 हजार तो कई के लाख-दो लाख तक चीनी मिलों के ऊपर बकाया है. ये लोग कहते हैं कि अगर उनके पैसे वक्त पर नहीं मिले तो वो अगली फसल के लिए जरूरी खर्च का इंतजाम कैसे करेंगे.

बंतीखेड़ा गांव के 65 साल के किसान मांगे राम कहते हैं, ‘शिकायत तो बहुत है हमारी. गन्ने को लेकर, बिजली को लेकर. कैराना के उपचुनाव में हमने अपनी शिकायत दर्ज भी करवा दी है. अगर ये शिकायत दूर हो जाए तो फिर हम मोदीजी के पास चले जाएंगे.’

इस इलाके में जितनी चर्चा गन्ने को लेकर होती है उतनी ही इसको लेकर हो रही राजनीति पर भी. हर कोई जिन्ना और गन्ना के मुद्दे को अपने-अपने हिसाब से देखता है. सुधीर बालियान शामली के संपन्न किसानों में से एक हैं. वो कहते हैं, ‘बीजेपी ने जो वादे किए थे, वो पूरे नहीं किए. गन्ने की फसल का 14वें दिन पेमेंट करने को कहा था. कहां हैं हमारे पेमेंट? फरवरी के बाद कोई पेमेंट नहीं हुआ है.’ हालांकि गन्ने से बात बदलते ही वो कहने लगते हैं कि इस सरकार में एक फायदा तो हुआ है. गुंडागर्दी कम हुई है.

गन्ने की फसल से चीनी बनने तक के सफर में ऐसा क्या हो जाता है कि इससे जुड़ा हर किरदार अपने नुकसान और घाटे की कहानी कहने लगता है. किसान कहता है कि उसके फसल की कीमत नहीं मिलती, चीनी मिल मालिक कहते हैं चीनी उत्पादन में उनका लगातार घाटा हो रहा है, नेता कहते हैं कि हमने अपने इलाके में काम तो किया था लेकिन गन्ने के मुद्दे ने हमें डुबो दिया. घाटे के अर्थशास्त्र को समझने हम शामली के चीनी मिल में पहुंचे.

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शामली का अपर दोआब शुगर मिल इलाके का सबसे पुराना चीनी मिल है. 1933 में इस चीनी मिल का निर्माण हुआ था. सीजन में मिल के सामने गन्ना किसानों की लाइन लगी रहती है. मई तक यहां गन्ना पेराई हुई है. उसके बाद फिलहाल यहां मशीनों की मरम्मत का काम चल रहा है. हर सीजन के बाद करीब पांच-छह महीने तक चीनी मिलों में मशीनों की मरम्मत का काम चलता है. अक्टूबर से मिल फिर से काम करना शुरू कर देगा.

अपर दोआब शुगर मिल पिछले 4-5 साल से घाटे में चल रही है. मिल के जनरल मैनेजर आर.के गुप्ता कहते हैं कि किसानों को उनका बकाया पैसा देने के लिए मिल मालिक ने अपनी प्रॉपर्टी तक बेची है. हालांकि इस साल भी किसानों के ऊपर इस मिल की करीब 70 करोड़ की देनदारी बची हुई है. वो कहते हैं कि यही हाल बाकी चीनी मिलों का हैं. धीरे-धीरे चीनी मिलें बंद हो रही हैं क्योंकि उन्हें लगातार घाटा उठाना पड़ रहा है. जबकि मिलों को बंद करना भी आसान नहीं है. इसके लिए सरकार को दो साल पहले एप्लीकेशन देना होता है.

आखिर चीनी मिलों को घाटा कहां हो रहा है? आर.के गुप्ता इस बात को समझाते हुए कहते हैं कि इस सीजन में हमने करीब 320 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से गन्ना खरीदा. एक क्विंटल गन्ना से 10 किलो चीनी निकलती है. यानी चीनी मिल के लिए कच्चे माल की लागत आई 32 रुपए किलो. जबकि उस वक्त चीनी का बाजार भाव था 29-30 रुपए. उत्पादित मूल्य की कीमत कच्चे माल की लागत से भी कम होगा तो घाटा होगा ही. अगर यही चीनी की कीमतें 35 रुपए के करीब हो तो चीनी मिलों के लिए घाटे की आशंका कम होगी.

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आर.के गुप्ता कहते हैं कि सरकार की नीतियां भी ठीक नहीं हैं. पहले चीनी 35 रुपए किलो थी. उत्पादन ज्यादा हुआ तो मिलों ने मार्केट में चीनी उड़ेल दिए. पाकिस्तान से कुछ चीनी आयात भी हुआ. मार्केट में चीनी के ज्यादा आ जाने की वजह से दाम घटकर 28-29 तक चले गए. इस वजह से भी मिलों को नुकसान हुआ. इस वजह से भी चीनी के मूल्य को सरकार द्वारा नियंत्रित किए जाने की बात उठ रही है. अभी तक चीनी के मूल्य पर कंट्रोल बाजार के हवाले है जो घटता-बढ़ता रहता है.

विजय सक्सेना अपर दोआब शुगर मिल के सुरक्षा कर्मचारी हैं. यहां पर नौकरी करते हुए उन्हें 38 साल हो चुके हैं. साढ़े तीन साल की नौकरी बची है. किसी तरह से नौकरी के आखिरी साल भी चैन से गुजार लेना चाहते हैं. विजय कहते हैं, ‘इस मिल में आज तक कोई परेशानी नहीं हुई. हमें वेतन मिलने में भी कभी देरी नहीं हुई. किसानों को दिक्कत होती है. उनके बारे में सुनकर बुरा लगता है.’

यूपी में गन्ना किसानों का बकाया साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है. 2017-18 में यूपी के गन्ना किसानों के 13 हजार करोड़ रुपए बकाया थे. ये उस अवधि में खरीदे गए कुल गन्ना का 37 फीसदी रकम है. जबकि पूरे देश के गन्ना किसानों के कुल 22 हजार करोड़ की रकम चीनी मिलों के ऊपर बकाया है. गन्ना किसानों के बकाए की ये अब तक की सबसे बड़ी रकम है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक बकाए की रकम बढ़कर 26 हजार करोड़ होने वाली है.

जब गन्ना किसानों को घाटा ही हो रहा है तो फिर वो गन्ने की बजाए कोई और फसल क्यों नहीं उपजाते! मेरठ के सरधना विधानसभा क्षेत्र के नांगला एज्दी गांव के गजेन्द्र सिंह कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हमने कोई और फसल उपजाकर नहीं देखी. पिछली बार हमने आलू की खेती की. लेकिन वहां भी हमें घाटा सहना पड़ा. आलू की कीमतें कम हो गई थी. इलाके की काली चिकनी मिट्टी गन्ने की फसल के लिए मुफीद होती हैं. एक मजबूरी ये भी है कि ऐसी मिट्टी में गन्ना ही उपज सकता है.

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जानकार बताते हैं कि आने वाले वक्त में भी गन्ना किसानों की हालत कोई सुधरने वाली नहीं है. इस साल चीनी का उत्पादन 34 मिलियन टन हुआ है. जबकि अगले साल उत्पादन इतना अधिक रहने वाला है कि डिमांड और सप्लाई में 76 फीसदी का अंतर आ जाएगा. यानी डिमांड से सप्लाई 76 फीसदी ज्यादा होगी.

दरअसल गन्ने की एक नई किस्म के आने जाने की वजह से फसल की रिकॉर्ड पैदावार हो रही है. गन्ने की नई किस्म CO-0238 विकसित की गई है. यूपी में 2013-14 से गन्ने की इस नई किस्म की बुआई शुरू हुई है. 2013-14 से लेकर 2017-18 में जहां गन्ने की खेती वाली जमीन कम हुई है वहीं इसका उत्पादन डेढ़ गुणा बढ़ गया है.

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2012-13 में 24.24 लाख हेक्टेयर में गन्ने की फसल लगाई गई. उस दौरान 7 मिलियन टन गन्ने का उत्पादन हुआ. वहीं 2017-18 में 22.99 लाख हेक्टेयर में गन्ने की फसल लगाई गई. जबकि उत्पादन 12 लाख टन हुआ. यानी गन्ने की खेती वाली जमीन में जहां करीब 5 फीसदी की कमी आई वहीं उत्पादन 59 फीसदी बढ़ गया. उत्पादन में बढ़ोत्तरी से किसानों की जिंदगी आसान होनी चाहिए थी. लेकिन चीनी को लेकर घाटे के अर्थशास्त्र ने उनकी जिंदगी और मुश्किल कर दी है.

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