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मोदी की पहल पर MCI भंग: स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल बदलाव के लिए बताया जरूरी

सरकार का मानना है कि जब सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवहेलना होने लगी और मेडिकल काउंसिल ओवरसाइट कमेटी से समन्वय स्थापित किए बगैर अपनी मनमानी करने लगी तो MCI को रिप्लेस करना जरूरी हो गया था

Updated On: Sep 27, 2018 11:31 AM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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मोदी की पहल पर MCI भंग: स्वास्थ्य सेवा में आमूलचूल बदलाव के लिए बताया जरूरी

प्रधानमंत्री मोदी के फैसले लेने का अंदाज जुदा होता है इस बात पर शायद ही किसी को अब कोई शक होगा. MCI (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) भंग करने की योजना उनकी इतनी दुरुस्त थी कि मेडिकल काउंसिल के लोगों को इसकी भनक तक नहीं लग पाई. बुधवार को कैबिनेट की मीटिंग होनी थी ये सबको पता था. लेकिन मीटिंग में मेडिकल काउंसिल को लेकर इतने गंभीर फैसले होंगे यह पता लगने के बाद कैबिनेट में मौजूद मंत्री भी अचंभित थे.

23 सितंबर को प्रधानमंत्री ने प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की. इसका मकसद सबको इलाज की सुविधा मुहैया कराना था. लेकिन इसके लिए मेडिकल काउंसिल को भंग कर नए बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को स्थापित करना प्रधानमंत्री के साहसिक फैसले लेने की कड़ी में एक और बेहतरीन उदाहरण है.

प्रधानमंत्री ने अध्यादेश की जरूरतों को बड़े ही साफगोई से अपने सहयोगियों के सामने कैबिनेट में रखा और कैबिनेट से मंजूरी दिलाकर राष्ट्रपती के पास मंजूरी के लिए फौरन भेज दिया.

प्रधानमंत्री मोदी ने कैबिनेट की मीटिंग में कहा कि मेडिकल काउंसिल भंग करने की  जरूरत क्यूं आ पड़ी है. और इस फैसले से स्वास्थ सेवा में बेहतर बदलाव कैसे होगा. प्रधानमंत्री ने डेढ़ लाख प्राइमरी हेल्थ सेंटर खोले जाने की बात की ताकी हेल्थ फॉर ऑल की योजना को अमली जामा पहनाया जा सके. पीएम ने जोर देकर कहा कि डॉक्टर्स और मेडिकल प्रोफेशनल की कमी को पूरा करने के लिए हमें कारगर कदम उठाने पड़ेंगे. तभी स्वस्थ भारत और समृद्ध भारत की परिकल्पना को पूरा कर पाने में हमें कामयाबी मिलेगी.

मेडिकल एजुकेशन में भ्रष्टाचार को लेकर पीएम सख्त

इतना ही नहीं मेडिकल एजुकेशन में भ्रष्टाचार को लेकर भी प्रधानमंत्री ने चिंता जताते हुए उन्होंने मेडिकल एजुकेशन में व्याप्त माफियागिरी को खत्म करने के लिए मेडिकल काउंसिल को भंग करने की जरूरत पर भी जोर दिया. दरअसल पिछले मॉनसून सत्र में नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल को पास कराने की चर्चा जोरों पर थी. लेकिन इसे पास नहीं कराए जाने को लेकर सरकार पर कई तरह के आरोप भी लगने लगे.

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कहा गया कि काउंसिल पर दबदबा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गुजरात का है. इसी वजह से सरकार ने NMC बिल (नेशनल मेडिकल कमीशन) पास न कराकर उन्हें समर्थन दिया है. वैसे इस बिल का विरोध डॉक्टर्स के कुछ ग्रुप भी कर रहे थे. लेकिन डॉक्टर्स का ग्रुप नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल को लेकर दो भाग में बंटा था. जितनी तत्परता से अध्यादेश लाकर बुधवार को ही राष्ट्रपति से अनुमोदन करा लिया गया. इसको लेकर सरकार के विरोध में फैलाए जा रहे सारे आरोपों की हवा निकल गई है. दिलचस्प बात है यह है कि इस सबको अंजाम प्रधानमंत्री ने खुद आगे बढ़कर दिया है.

कैसा है बोर्ड ऑफ गवर्नर्स का स्ट्रक्चर?

फिलहाल मेडिकल काउंसिल भंग कर दिया गया है और इसे बोर्ड ऑफ गवर्नर्स द्वारा चलाया जाएगा. फ़र्स्टपोस्ट ने पहले ही मेडिरल काउंसिल भंग होने की जानकारी दे दी थी.

प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक बोर्ड ऑफ गवर्नर्स में सात लोग शामिल हैं जो कि अपने कार्यक्षेत्र में विश्वस्तर पर विख्यात है. इनके नाम हैं डॉक्टर वी के पॉल जो कि नीति आयोग के मेंबर हैं और काउंसिल के चेयरमैन के रूप में कार्य संभालेंगे.

बोर्ड ऑफ गवनर्स के दूसरे सदस्य हैं डॉक्टर रणदीप गुलेरिया जो कि एम्स के महानिदेशक पद पर तैनात है. तीसरे सदस्य का नाम है डॉक्टर जगत राम जो PGIMER चंडीगढ़ में डायरेक्टर हैं. और चौथे सदस्य हैं डॉक्टर बी एन गंगाधर. पांचवे सदस्य का नाम है डॉक्टर निखिल टंडन. डॉक्टर गंगाधर निमहंस बैंगलोर के डायरेक्टर हैं. और निखिल टंडन एम्स में इंडोक्राइनोलॉजी और मेटाबॉलिज्म के विख्यात प्रोफेसर हैं.

छठे सदस्य का नाम डॉक्टर एस वेंकटेश है जो डायरेक्टर जेनरल हेल्थ पद पर कार्यरत हैं. सातवें सदस्य डॉ बलराम भार्गव हैं. ये इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च के डायरेक्टर जनरल हैं.

जाहिर है ऐसे लोगों को चुनकर सरकार ने नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल के विरोध में फैलाए जा रहे दुष्प्रचार का जोरदार जवाब दिया है जिसमें ये कहा जा रहा था कि डॉक्टर्स की संस्था को ब्यूरोक्रेट्स से रिपलेस करने की तैयारी की जा रही है.

काउंसिल को भंग करने के पीछे की पृष्ठभूमि

पिछले चार सालों में सरकार ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में  महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं. लेकिन आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर की वजह से हर साल 66 लाख लोगों का गरीबी रेखा के नीचे जाना सरकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है. सरकार इससे निपटने के लिए प्रधानमंत्री आरोग्य योजना के तहत डेढ़ लाख प्राइमरी हेल्थ सेंटर और वेलनेस सेंटर खोलने की तैयारी में है. और इसे अमली जामा पहनाने का टार्गेट 2022 तक है. 31 राज्यों ने आयुष्मान भारत योजना में भागीदारी के लिए सहमति दे दी है. वहीं 26 राज्य ने इसे धरातल पर उतारने की कवायद भी शुरू कर दी है.

आंकड़ों के मुताबिक 2300 हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर ऑपरेशनल हैं वहीं साल के अंत तक इसे 15000 तक पहंचाने का टारगेट है. सरकार का मानना है कि साल 2017 में नेशनल हेल्थ पॉलिसी लॉन्च किया गया जो कि 15 साल बाद स्वास्थ के मुद्दे पर उठाया गया कोई कारगर कदम था. लेकिन यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज, सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स और नेशनल हेल्थ पॉलिसी के लक्ष्य को हासिल करने में सुयोग्य हेल्थ केयर प्रोफेसनल्स की कमी के कारण पूरा करना मुश्किल दिखाई पड़ने लगा है. और इस सबकी वजह मेडिकल एजुकेशन में कोई बदलाव नहीं होना और व्याप्त भ्रष्टाचार बड़ा कारण है.

सरकार Tertiary Care की गुणवत्ता में सुधार चाह रही है. और इस वजह से देश के कई हिस्सों में 14 नए एम्स जैसी संस्था खोलने की योजना है. ऐसा हो जाने पर देश में एम्स की कुल संख्या 22 होगी. वहीं 54 मेंडिकल कॉलेज में सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक्स खोलने की योजना है जिसके लिए 9000 करोड़ की राशी आवंटित की गई है.

इतना ही नहीं पिछड़े इलाकों में 16000 करोड़ की लागत से 82 मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना है जो कि केंद्र द्वारा प्रायोजित योजना के तहत खोली जाएगी. इसलिए इतने बड़े व्यापक योजना को अमली जामा पहनाना  मेडिकल एजुकेशन में रिफॉर्मेशन किए बगैर मुश्किल जान पड़ रहा था. जाहिर है इतने व्यापक नेटवर्क के लिए डॉक्टर्स और हेल्थ प्रोफेशनल्स की जरूरत पूरी करना सबसे बड़ी चुनौती है. इसलिए सरकार मानती है कि मेडिकल एजुकेशन में बदलाव समय की मांग है.

सरकार को ये कदम इसलिए भी उठाना पड़ा क्योंकि साल 2016 में संसदीय कमेटी स्वास्थ्य की रिपोर्ट पर स्वर्गीय रंजीत रॉय चौधरी की अध्यक्षता में नेशनल मेडिकल काउंसिल बिल तैयार किया गया जिसे लोकसभा में 29 दिसंबर 2017 को रखा गया.  इस बिल में अंडर ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट की संख्या को बढ़ाने पर जोर दिया गया साथ ही मेडिकल एजुकेशन में सुधार करने पर भी पूरा बल दिया गया. ड्राफ्ट में चार बोर्ड बनाने की बात कही गई जिसके सद्स्य की इंटिग्रीटी और प्रोफेशनलिज्म बेहतरीन हो इस पर जोर दिया गया.

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ड्राफ्ट को फिर से संसदीय समिति के पास सुझाव लेने के लिए भेजा गया. 28 मार्च 2018 को इस बिल को कैबिनेट से पास कराया गया और लोकसभा की मंजूरी के लिए सदन में रखा गया. जो कि अभी पेंडिंग है.

इसी बीच 5 मई 2016 को सुप्रीमकोर्ट ने ओवरसाइट कमेटी बनाने का आदेश दे कर ये कह दिया कि ओवरसाइट कमेटी मेडिकल काउंसिल के तमाम क्रियाकलाप पर निगरानी रखेगा और उसकी मंजूरी के बगैर कोई फैसले नहीं लिए जाएंगे. ऐसा नया लेजिशलेशन आने तक करना जरूरी है.

साल 2017 में एक साल पूरा होने पर दूसरा ओवरसाइट कमेटी का गठन हुआ. लेकिन 6 जुलाई 2018 को ओवरसाइट कमेटी ने हेल्थ मिनिस्ट्री से उसकी एक न सुनने की शिकायत अपने पत्र के जरिए किया और सभी सदस्यों ने इस्तीफा देकर कमेटी से किनारा कर लिया.

सरकार का मानना है कि जब सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवहेलना होने लगी और मेडिकल काउंसिल ओवरसाइट कमेटी से समन्वय स्थापित किए बगैर अपनी मनमानी करने लगी तो MCI को रिप्लेस करना जरूरी हो गया था. ज़ाहिर है एनएमसी बिल अभी सदन में पेंडिंग है. इसलिए देश में बेहतर मेडिकल एजुकेशन और बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए सरकार ने कारगर कदम उठा कर मंशा साफ कर दिया है कि स्वस्थ भारत और समृद्ध भारत के लिए मोदी सरकार पूरी तरह दृढ़ संकल्प है.

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