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मेडिकल उपकरणों के काले कारोबार पर लगाम लगाएगी सरकार

अस्पताल और डॉक्टर के सलाह पर लाचार और गरीब मरीज क्षमता नहीं होने के बावजूद भी महंगे उपकरण लगाते हैं.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Feb 09, 2017 07:54 AM IST

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मेडिकल उपकरणों के काले कारोबार पर लगाम लगाएगी सरकार

मोदी सरकार ने मेडिकल उपकरणों के नाम पर काला कारोबार करने वालों पर लगाम लगाने का फैसला कर लिया है. इसके लिए सरकार के तंत्र ने काम करना शुरू कर दिया है.

मोदी सरकार में रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री मनसुखभाई मांडविया ने फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बातचीत में कहा है कि सरकार मेडिकल उपकरणों के मामले में सख्त नियम लाने जा रही है.

देश में पिछले काफी सालों से मेडिकल उपकरणों के रेट को लेकर बहस छिड़ी हुई है. देशी और विदेशी उपकरणों के बीच मरीज फंस गए हैं. खास कर दिल के मरीज का तो बुरा हाल हो जाता है. डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर में आकर गरीब मरीज कंगाल हो रहे हैं.

महंगे और विदेशी उपकरण लगाने की सलाह देते हैं डॉक्टर 

मेडिकल डिवाइस लगाते वक्त डॉक्टर मरीज को समझाते हैं कि कम पैसे वाला मेडिकल उपकरण लगाने से बीमारी की दोबारा होने की संभावना ज्यादा होगी, पर विदेशी उपकरण के इस्तेमाल करने से लाइफ लंबा हो सकता है.

डॉक्टर विदेशी उपकरण लगाने के बाद भी मरीज को जीने की पक्की गारंटी नहीं देते हैं, पर देशी उपकरण लगाने पर मरीज को खराब होने की गारंटी जरूर दे देते हैं.

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अस्पताल और डॉक्टर के सलाह पर लाचार और गरीब मरीज क्षमता नहीं होने के बावजूद भी महंगे उपकरण लगाते हैं. पर जब वही बीमारी दोबारा हो जाती है तो मरीज एक बार फिर डॉक्टर और अस्पताल के शरण में जाते हैं. डॉक्टर फिर से वही बातें कहते हैं, जो उन्होंने पहले मरीज कहा था.

क्या कर रही है सरकार

मोदी सरकार के मंत्री मनसुखभाई मांडविया कहते हैं, ‘सरकार ने इन बातों को गंभीरता से लिया है. अभी स्टेंट और पेसमेकर (दिल के मरीज के लिए) जैसे 14 मेडिकल उपकरणों को ड्रग कैटेगरी में शामिल किया गया है. सरकार कोशिश कर रही है कि दिल के किसी भी मरीज को अगर स्टेंट लगाना पड़े तो उसकी अधिकतम कीमत 50 हजार रुपए से अधिक नहीं हो.

वे कहते हैं, 'अभी स्टेंट की कीमत दो-ढाई लाख तक की है. एक प्राइवेट अस्पताल में दिल के मरीज का ऑपरेशन कराने का खर्च कम से कम चार से पांच लाख है.’

मनसुख मांडविया आगे कहते हैं, ‘हेल्थ मिनिस्ट्री ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया है. ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट्स और बेयर मैटल स्टेंट्स को जरूरी दवाइयों के लिस्ट में शामिल किया गया है. एनपीपीए (नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी) जल्द ही स्टेंट को लेकर फैसला करने वाली है.’

मनसुखभाई मांडविया

मनसुखभाई मांडविया

एनपीपीए देश में दवाइयों की कीमतों का निर्धारण करनी वाली सरकार की एक संस्था है. एनपीपीए ने जनवरी के पहले हफ्ते में स्टेंट बनाने वाली कंपनियों, स्टेंट इंपोर्टर्स उद्योग समूह, देश के प्रमुख एनजीओ (जो स्वास्थ्य क्षेत्र में काम कर रहे हैं), अस्पतालों और कार्डियोलॉजिस्ट की एक मीटिंग बुलाई थी.

इस मीटिंग में हर तरह के स्टेंट्स को मनमाने दाम में बेचे जाने पर विचार विमर्श किया गया था. सरकार के लगातार दबाव के बाद इसकी कीमत निर्धारित कर दी गई है, जिसकी घोषणा जल्द ही होने वाली है.

देश की सरकारी अस्पतालों में स्टेंट्स लगाने की कीमत कम से कम 22 हजार निर्धारित की गई है. एक बार स्टेंट की कीमत तय हो जाने से मरीजों को फिक्स रेट में स्टेंट्स मिलने शुरू हो जाएंगे. एनपीपीए ने मेडिकल डिवाइसेज को चार केटेगरी में बांटा है. हर केटेगरी के लिए रेट निर्धारित की जाएगी.

क्या होता है स्टेंट

दिल की बीमारी में काम आने वाला स्टेंट एक पतले तार जैसा उपकरण होता है. जिसका इस्तेमाल आर्टरी को खोलने के लिए किया जाता है. आर्टरी के द्वारा दिल तक खून पहुंचाता है. आर्टरी के ब्लॉक हो जाने से ही हार्ट अटैक आता है.

दिल की मरीजों के लिए यह राहत वाली खबर है. एंजियोप्लास्टी के जरूरी मेडिकल डिवाइस स्टेंट्स की कीमत कम होने से लाखों दिल के मरीजों को लाभ मिलेगा.

भारत में इस्तेमाल होने वाले ज्यादातर स्टेंट्स विदेशी कंपनियों के होते हैं. विदेशी कंपनियों के होने के कारण इनके रेट में काफी अंतर रहता है. सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 60 प्रतिशत स्टेंट्स लगाने का काम प्राइवेट अस्पताल करते हैं.

जानकार मानते हैं कि स्टैंट की यह कीमत फर्स्ट और सैंकेंड जैनरेशन के हैं, जबकि मार्केट में अब तीसरे और चौथे जैनरेशन के स्टेंट आ गए हैं. ऐसे में मरीज को अच्छी क्वालिटी के स्टेंट्स लगाने की बात कही जाती है, जिनकी कीमत बहुत ज्यादा होती है.

भारत में हर साल लाखों लोग स्टेंट्स लगाते हैं, और लाखों लोगों की मौत स्टेंट्स नहीं लगा पाने से हो जाती है.

जरूरी है मेडिकल क्षेत्र में पारदर्शिता 

सरकार ने इसके साथ ही मेडिकल डिवाइसेज पर लेबलिंग भी अनिवार्य कर दिया है. सरकार ने इसके लिए 'ड्रग एंड कॉस्मेटिक कानून' में संशोधन भी किया है. नए कानून में मेडिकल डिवाइस पर नाम लिखना अनिवार्य कर दिया है.

डिवाइसेज के मेनुफेक्चरिंग और इक्सपायरी डेट, डिवाइसेज के साइज और वजन और साथ में बनाने वाली कंपनी का पता लिखना अनिवार्य कर गया है.

सरकार के सूत्र कहना है कि स्वास्थ्य सेवा में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की यह पहली कड़ी है. सरकार बहुत जल्द ही अमेरिका की तरह मेडिकल क्षेत्र में पारदार्शिता लाने पर विचार कर रही है.

अमेरिका में दवाई-उपकरण सप्लाई करने वाली कंपनियों को पब्लिक वेबसाइट पर ये खुलासा करना पड़ता है कि कंपनी ने अपने डिवाइसेज के इस्तेमाल करने के लिए अस्पताल और डॉक्टरों को कितने पैसे दिए.

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