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पब्लिक हेल्थ पर केवल निजी कंपनियों के भरोसे न रहे सरकार

दिग्गज खाद्य और पेय कंपनियां छोटे बच्चों से जुड़े विज्ञापन बंद करने की तैयारी कर रही हैं

Updated On: Dec 16, 2016 03:22 PM IST

Deya Bhattacharya

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पब्लिक हेल्थ पर केवल निजी कंपनियों के भरोसे न रहे सरकार

खाने-पीने की चीजें बनाने वाली कंपनियों की 12 साल से छोटे बच्चों के लिए अनहेल्दी उत्पादों का विज्ञापन नहीं करने का फैसला अच्छा है. लेकिन इस बारे में बड़े कदम उठाने की जिम्मेदारी सरकार की है

जुलाई 2016 में फूड एंड बेवरेज अलायंस ऑफ इंडिया (एफबीएआई) की मेंबर कंपनियों ने भारत में बच्चों के लिए विज्ञापनों की पॉलिसी जारी की.

खाद्य और पेय बनाने वाली कंपनियों के ग्लोबल अलायंस के तहत ये पॉलिसी बनी है. इसमें कंपनियों ने 12 साल के छोटे बच्चों को टारगेट कर बनाए जाने वाले विज्ञापन खत्म करने की शपथ ली है.

दिग्गज कंपनियों ने ली शपथ

केलॉग, पेप्सिको, मॉन्डेलेज इंडिया, नेस्ले और कोका-कोला जैसी दिग्गज खाद्य और पेय कंपनियां छोटे बच्चों से जुड़े विज्ञापन बंद करने के लिए 31 दिसंबर की डेडलाइन की तैयारी कर रही हैं.

Fast Food

कई मायनों में यह पॉलिसी फूड ब्रांड्स को बढ़ावा दिए जाने के पूरे तौर-तरीके को बदल देगी. दूसरी ओर, इससे देश में आम लोगों के स्वास्थ्य के पूरे नजरिए में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

बच्चों के स्वास्थ्य की फिक्र करने वाली एफबीएआई की पॉलिसी में कहा गया है कि 'इसके सभी मेंबर्स 12 साल से छोटे बच्चों के लिए तभी विज्ञापन बनाएंगे. जबकि वे इसके पोषण के मानकों को पूरा करते होंगे'.

पिछली नीति में कंपनियां विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशा-निर्देशों को मानती थीं. इसमें बच्चों के लिए फूड प्रोडक्ट की मार्केटिंग, पोषण लेबलिंग के दावों, उत्पाद लोगो, सूचना और एजुकेशन, सरकारी संस्थाओं के लिए खाद्य पदार्थों के लिए प्रावधान और खाद्य पदार्थों के सेवन के लिए आर्थिक टूल्स जैसी कई चीजों के लिए न्यूट्रिएंट प्रोफाइल से संबंधित दिशा और निर्देश हैं.

यह पॉलिसी टेलीविजन, रेडियो, प्रिंट, सिनेमा, ऑनलाइन, डीवीडी/सीडी-रोम, डायरेक्ट मार्केटिंग, प्रोडक्ट प्लेसमेंट, आउटडोर मार्केटिंग और मोबाइल मार्केटिंग जैसे तमाम जरियों पर लागू होगी.

एफबीएआई पीरियॉडिक रिपोर्ट छापेगी जिसमें इस पॉलिसी के पालन के बारे में बताया जाएगा.

बच्चों और युवाओं के लिए फूड प्रोडक्ट के विज्ञापन पर कई देशों में बाकायदा कानून और नीतिगत दिशा-निर्देश मौजूद हैं.

दुनिया भर में हैं कड़े कानून

दक्षिण कोरिया ने 2009 में बच्चों के खान-पान की सुरक्षा के लिए एक खास कानून पास किया था. इस कानून का मकसद पोषक खाने-पीने की चीजों को बढ़ावा देना. और बच्चों में अच्छी खान-पान की आदतें विकसित करना है.

Children eating while watching television

टीवी देखने के दौरान लंच खाते हुए स्कूली बच्चे

कानून के जरिए बच्चों के सबसे ज्यादा टीवी देखने के वक्त में कुछ खास खाने-पीने के विज्ञापनों पर रोक लगा दी गई. साथ ही कम पोषण वाले बच्चों के खाद्य उत्पादों के साथ खिलौने जैसे लुभावने गिफ्ट फ्री देने पर भी रोक लगा दी गई.

यूनाइटेड किंगडम में कमेटी ऑन एडवर्टाइजिंग प्रैक्टिस (सीएपी) ने बच्चों की टीवी पर ज्यादा फैट, नमक या चीनी (एचएफएसएस) वाले फूड प्रोडक्ट्स के विज्ञापनों पर रोक लगा दी है.

कमेटी ने कहा कि बच्चों में मोटापा और डायबिटीज के लेवल पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी मीडिया पर भी है.

यूरोपियन यूनियन हेल्थ कोएलिशन ने ‘एवीएमएसडीः व्हॉट अबाउट योर किड?’ नाम से एक मुहिम छेड़ी है.

इसे यूरोप के युवाओं को हेल्थ को नुकसान पहुंचाने वाली मार्केटिंग से मुक्त करने का सुनहरा मौका बताया गया है. इसमें हेल्थ के लिए नुकसानदायक उत्पादों के विज्ञापन जारी किए जाने के घंटे निश्चित कर दिए गए हैं.

इस कैंपेन में तीन प्रमुख उपाय किए गए हैं. पहला, सुबह 6 बजे से रात 11 बजे तक शराब या एचएफएसएस प्रोडक्ट के टेलीविजन पर विज्ञापन नहीं चलेंगे. प्रोडक्ट प्लेसमेंट के लिए प्रभावी मार्केटिंग तकनीक होगी. और यह तय किया जाए कि ये रूल विदेशी ब्रॉडकास्ट पर भी लागू हों.

डब्ल्यूएचओ की सिफारिशें

बच्चों और युवाओं के लिए बने खाद्य और पेय पदार्थों की जिम्मेदार एडवर्टाइजिंग और मार्केटिंग पर नियंत्रण करना विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अधिकार है.

डब्ल्यूएचओ के बीमारियों की रोकथाम के लिए ग्लोबल एक्शन प्लान 2013-2020 के लिए यह एक अहम कार्यक्रम है.

डब्ल्यूएचओ की एक सिफारिश में कहा गया है कि बच्चों के खाद्य विज्ञापनों को देखने में कमी लाने में सरकारें अहम भूमिका निभा सकती हैं. सरकारों को बच्चों को खाने-पीने की नुकसानदायक चीजों से बचाने के मकसद से कंपनियों के लिए नियम तय करने चाहिए.

अन्य सिफारिशों में कहा गया है कि खाद्य पदार्थ बनाने वाली कंपनियों को समझना चाहिए कि बच्चों के उत्पादों की मार्केटिंग एक अंतरराष्ट्रीय मसला है. और इसके नतीजों के लिए उद्योग जगत भी जिम्मेदार है.

भारत में नीतियों का अभाव

मौजूदा समय में भारत में पब्लिक हेल्थ, डब्ल्यूएचओ की सिफारिशों को लागू करने के लिए कानूनी और आर्थिक फ्रेमवर्क का अभाव है. इसके चलते ज्यादा फैट, ट्रांस-फैटी एसिड, चीनी और नमक वाले उत्पाद आसानी से बच्चों को बेचे जा रहे हैं. हालांकि, एफबीएआई की पॉलिसी गाइडलाइंस इस दिशा में उठाया गया एक अच्छा कदम है.

सरकार को बच्चों के हेल्थ से जुड़े इस मसले पर रूल-रेगुलेशंस बनाने की जरूरत है. और उसे केवल प्राइवेट सेक्टर के उठाए गए कदमों के ही भरोसे नहीं रहना चाहिए.

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