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राजस्थान: चुनावी साल में बंपर नौकरियां, मगर सब नहीं कर पाएंगे अप्लाई

चुनावी साल में राजस्थान सरकार न सिर्फ वैकेंसी निकाल रही है, बल्कि चुनाव के हिसाब से शर्तें भी तय कर रही है

Updated On: Apr 08, 2018 10:33 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: चुनावी साल में बंपर नौकरियां, मगर सब नहीं कर पाएंगे अप्लाई
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राजस्थान में इस समय ऐसा कोई दिन नहीं जा रहा जब अखबारों में नौकरियों के विज्ञापन नहीं दिख रहे हों. राजस्थान लोकसेवा आयोग और राजस्थान अधीनस्थ चयन बोर्ड के बड़े-बड़े विज्ञापनों की बाढ़ देखकर ऐसा लग रहा है जैसे अब बेरोजगारी का संकट बीते दिनों की बात हो जाएगी. सवाल तो ये भी कौंध रहा है कि नौकरियों का ये पिटारा आखिर क्यों 4 साल तक छिपाकर रखा गया था और अब क्यों एकदम से ओवरडोज की नौबत आ गई.

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि जितनी नौकरियां सत्ता के पहले 4 साल में नहीं निकाली जाती उससे तीन गुणा तक आखिरी साल में निकाली जाती हैं. इसकी चर्चा आगे करेंगे लेकिन बंपर भर्तियों के साथ ही ये भी देखने में आता है कि नई सरकार आते ही इनमें से अधिकतर भर्तियां अटका दी जाती हैं. 2013 से शिक्षक भर्ती, एलडीसी भर्ती, नर्सिंग भर्ती जैसी कई नौकरियों की प्रक्रिया अभी भी पूरी नहीं हो पाई हैं. बहरहाल, समझ में न आने वाली बात ये है कि हर सरकार चुनावी साल की भर्तियों को एंटी इंकमबैंसी फैक्टर से निबटने का रामबाण मानकर क्यों चलती है.

ऐसे खत्म होगा एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर ?

पिछले साल कार्मिक विभाग में एक सीनियर अफसर ने अनौपचारिक बातचीत में वसुंधरा सरकार के एक सीक्रेट फॉर्मूले का खुलासा किया था. उनसे मैंने नौकरियों के न होने और इसे लेकर युवाओं में गहरी नाराजगी का जिक्र किया था. चर्चा इस बात पर आ गई थी कि हताश और बेकार बैठा युवा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ वोट कर सकता है. तब उन्होने कहा- जल्द ही इतनी नौकरियां निकलने वाली हैं कि एक भी युवा आपको चुनावी साल में खाली नहीं दिखेगा.

इस सीनियर अफसर ने सरकार की मंशा को खुलकर बताया. उन्होने कहा कि इतनी भर्तियां आएंगी कि राज्य का लगभग हर युवा इनकी तैयारी/कोचिंग के लिए जयपुर, जोधपुर, अजमेर जैसे बड़े शहरों में साल भर रहने को मजबूर हो जाएगा. अब तैयारी कर रहा युवा 'खाली' नहीं रहेगा तो न आक्रोश दिखा पाएगा, न अपने गांव जा पाएगा और न ही गांवों में चलने वाली चौपाल चर्चाओं में ही शामिल हो पाएगा. ऐसे में एंटी इंकमबैंसी फैक्टर बहुत हद तक कम हो जाएगा.

सरकार के थिंक टैंकों की इस कारगुजारी पर कोई भी दांतों तले अंगुली दबाने को मजबूर हो जाए. तत्काल मैं खुद भी तय नहीं कर पाया कि इसे पॉलिटिकल प्लान कहूं या सत्ता बचाने की साजिश. लेकिन एक बात तय है कि इस तरह की योजनाएं येन केन प्रकारेण सत्ता हासिल करने की कोशिशें ही दिखाती हैं, न कि लोक कल्याण का उद्देश्य.

इतिहास खुद को दोहराता है पर इससे सबक क्यों नहीं

मुझे ये समझ नहीं आता कि सत्ता अतीत से सबक क्यों नहीं सीखती. क्यों हमारे राजनेता आज भी जनता को उतना ही कम अक्ल समझते हैं जितना आज़ादी के शुरुआती वर्षों में. हमारे राजनेता ये क्यों भूल जाते हैं कि 1951 में भले ही देश के 20% से भी कम लोग साक्षर थे लेकिन अब तो 75% से ज्यादा जनता पढ़ी लिखी है. इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले सबसे बड़े देशों में हम शामिल हैं फिर भी सत्ता हमें बेवकूफ से ज्यादा नहीं समझती.

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अभी 5 साल पहले 2013 में कांग्रेस सरकार ने भी कुछ ऐसा ही मंसूबा पाला था. 2008 से 2012 तक लगभग 50 हजार भर्तियां आई और चुनावी साल में यानी अकेले 2013 में ही 1 लाख 60 हजार से ज्यादा भर्तियों का पिटारा खोल दिया गया. लेकिन नतीजा क्या रहा... एकदम सिफर. विधानसभा में कांग्रेस को 200 में से सिर्फ 20 सीट मिली और लोकसभा में 25 में से एक भी नहीं. जनता ने बता दिया कि लोक कल्याणकारी काम सतत रूप में करने चाहिए न कि सिर्फ चुनावी साल में.

लेकिन अब बीजेपी सरकार भी वही दोहराने जा रही है. चुनावी घोषणा पत्र में 15 लाख नई नौकरियों का वादा करने के बाद पिछले 4 साल तक न के बराबर वैकेंसी निकाली गई. जिस रिफाइनरी को पश्चिमी राजस्थान में गेमचेंजर के तौर पर देखा जा रहा था, उसे भी अटका के रखा गया. अब चुनावी साल में रिफायनरी को नया कलेवर दिया गया तो भर्तियां निकाल कर उम्मीद की जा रही है कि युवा उनके प्लान के मुताबिक ही व्यवहार करेंगे. वैसे राजस्थान के युवाओं को लुभाने के लिए वसुंधरा सरकार ने एक और दांव खेल दिया है.

अब बाहरी लोगों के लिए नो एंट्री!

चुनावी साल में सरकार के खिलाफ बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. हालांकि अपने 15 लाख नौकरियों के वादे के जवाब में दावे किए जाते हैं कि 4 साल में 12 लाख नई नौकरियों के अवसर पैदा किए गए. ये अलग बात है कि सत्ता के गलियारों में ही ये बात गले से नहीं उतर रही है. इससे निपटने के लिए ही वसुंधरा सरकार ने राजस्थानी के मुद्दे को वैसे ही हवा देना शुरू कर दिया है जैसे महाराष्ट्र में मराठी और कर्नाटक में कन्नड़ लोगों को ही रोजगार देने का मामला.

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सरकार ने अनारक्षित वर्ग के लिए नौकरियों में उम्र की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 40 वर्ष कर दिया है. साथ ही, इस पर भी ध्यान दिया जा रहा है कि इस बढ़ाई गई उम्र सीमा का फायदा राजस्थान के बाहर के लोग न उठा ले जाएं. अभी तक होता ये आया है कि राजस्थान के बाहर के लोग अनारक्षित वर्ग के 50% कोटे में शामिल किए जाते हैं. देखने में आया है कि इसमें लगभग आधा हिस्सा उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के युवा उठा ले जाते हैं. राजस्थानी युवाओं को नौकरी नहीं मिल पाती और हर 5 साल में सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण ये भी बनता है.

दूसरी ओर, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बाहरी लोगों के लिए उम्र सीमा स्थानीय उम्मीदवारों से काफी कम रखी जाती है. कई राज्यों में तो बाहरी लोगों के लिए सीलिंग भी लगाई जाती है. बाहरी लोगों को बमुश्किल 10% से ज्यादा हिस्सा नहीं दिया जाता. अब राजस्थान सरकार भी स्थानीय लोगों को लुभाने के लिए इस दिशा में आगे बढ़ रही है. यही नहीं, निजी उद्योगों में भी राजस्थानियों को बाहरी कर्मचारियों से 10-15 हजार रुपये ज्यादा वेतन दिलाने के लिए नियमों में बदलाव की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं.

रोजगार सब्सिडी का होगा रिव्यू

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राजस्थान में स्थानीय लोगों को रोजगार देने के लिए 1990 में सरकार ने राजस्थान निवेश प्रोत्साहन नीति शुरू की थी. नीति के तहत कंपनियों को प्रति वर्ष प्रति श्रमिक 25 से 40 हजार रुपए तक की रोजगार सब्सिडी का प्रावधान किया गया था. करीब 550 कंपनियों को ये सब्सिडी दी गई लेकिन रोजगार देने के जो आंकड़े सामने आए तो हैरानी के साथ ही स्थानीय लोगों में गुस्सा भी भर गया है.

खुलासा हुआ है कि जिन कंपनियों ने सरकार से रोजगार सब्सिडी उठाई उन्होने सिर्फ 30% रोजगार ही राजस्थानियों को दिए हैं जबकि 70% रोजगार तो बाहरी लोग ले गए. पैसा राजस्थान के टैक्सपेयर्स का, संसाधन राजस्थान के और कमाई कर गए बाहर के लोग. 20 मार्च को कैबिनेट की बैठक में ये मुद्दा उठा तो मुख्यमंत्री ने फौरन इस स्कीम के रिव्यू के निर्देश दिए हैं.

हालांकि 28 साल पहले जब इस स्कीम और सब्सिडी का सर्कुलर जारी हुआ था तब इसमें शर्त थी कि सब्सिडी तभी मिलेगी जब कंपनियां स्थानीय लोगों को रोजगार देंगी. लेकिन अभी तक किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया. इस साल जनवरी में अलवर लोकसभा उपचुनाव के दौरान स्थानीय लोगों ने ये मुद्दा उठाया. जांच हुई तो सामने आया कि अलवर, भिवाड़ी, नीमराणा, जैसे दिल्ली के नजदीक के औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार हासिल करने वाले बाहरी और स्थानीय लोगों का अनुपात बहुत ज्यादा असंतुलित है.

राजस्थान के संसाधनों से बाहरी लोगों के ज्यादा फायदा उठाने का मुद्दा इतना ज्यादा ज्वलंत हो चुका है कि फैक्ट्रियों में आए दिन तोड़फोड़, बंद और तनाव की घटनाएं सामने आ रही हैं. इसे देखते हुए मौजूदा बजट में राजस्थानी लोगों को रोजगार दिए जाने पर ज्यादा सब्सिडी का ऐलान किया गया है. अब देखने वाली बात ये होगी कि युवाओं में अब तक दिख रहा आक्रोश कौन शांत कर पाएगा- कोचिंग के कमरे या वोटिंग बूथों पर रखी EVM मशीनें.

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