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गोरखपुर त्रासदी ग्राउंड रिपोर्ट: मौत का सिलसिला जारी, हर घंटे हो रही है एक मौत

योगी सरकार की सख्ती के बावजूद बीआरडी अस्पताल में मरीजों की सुनने वाला अब भी कोई नहीं है

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Aug 15, 2017 09:12 PM IST

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गोरखपुर त्रासदी ग्राउंड रिपोर्ट: मौत का सिलसिला जारी, हर घंटे हो रही है एक मौत

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ भले ही लाख दावा करें कि गोरखपुर में हालात पर काबू पाया जा रहा है लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर है. ऑक्सीजन की कमी से मरने वाले बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. फ़र्स्टपोस्ट की पड़ताल में पता चला है कि बाबा राघव दास (बीआरडी) अस्पताल में पिछले 24 घंटों में 24 बच्चों की मौत हो चुकी है.

गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस से पीड़ित करीब 85 बच्चों की मौत ऑक्सीजन की कमी से हो चुकी है. बच्चों की मौत की खबर आने के बाद आनन फानन में बीआरडी कॉलेज के प्रिंसिपल राजीव मिश्रा को हया दिया गया. उनकी जगह पी के सिंह को नया प्रिंसिपल बनाया गया है. बच्चों की मौत का सिलसिला अब भी जारी रहने के बारे में जब नए प्रिंसिपल सिंह से पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'इस एरिया के सीजन की समस्या है. डॉक्टर इस बीमारी का इलाज ही कर सकते हैं. इसमें सुधार के लिए सरकार को अहम कदम उठाने होंगे.'

सिंह से जब यह पूछा गया कि पिछले 5 साल में इस साल सबसे ज्यादा मौते हुई हैं. उन्होंने इस डेटा से पूरी तरह इनकार कर दिया. सिंह ने कहा, 'यह इस बात पर निर्भर है कि बच्चे कैसी स्थिति में अस्पताल में आ रहे हैं. कुछ बच्चे इतनी गंभीर हालत में आ रहे हैं, जो मुश्किल से एक या दो घंटा ही बच पाते हैं.'

क्या है अस्पताल का रवैया

करीब 80 से ज्यादा बच्चों की मौतें होने के बावजूद अस्पताल के रवैये में कुछ खास फर्क नहीं आया है. अस्पताल में गंभीर अवस्था में आने वाले मरीजों को डॉक्टर भर्ती करने से आनाकानी कर रहे हैं.

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इंसेफेलाइटिस से पीड़ित एक मरीज के भाई योगी मनीष नाथ ने कहा, 'पहले डॉक्टर ने कहा कि किसी प्राइवेट अस्पताल में जाकर दिखाएं. हालांकि काफी मिन्नत और बहस के बाद जब मेरी बहन को दाखिल मिला तो उसकी उम्र घटाकर बच्चों के वार्ड में डाल दिया है.' दरअसल अस्पताल पर अभी सख्ती बढ़ने के कारण डॉक्टर किसी भी ऐसे मरीज को देखने से बच रहे हैं, जो गंभीर रूप से पीड़ित हैं.

मनीष नाथ की बहन निर्मला की उम्र 18 साल है. अस्पताल के जनरल वार्ड में निर्मला की भर्ती 18 साल उम्र लिखकर हुई थी. लेकिन जैसे ही डॉक्टर को पता चला कि उसे इंसेफेलाइटिस है उसकी उम्र 16 साल से कम बताकर बच्चों के वार्ड में शिफ्ट कर दिया.

यह किसी एक मरीज का हाल नहीं है. दिन भर में ऐसे कई मरीज यहां आ रहे हैं. सरकार की सख्ती से जहां मरीजों का भला होना चाहिए था वही इसका उल्टा हो रहा है. सख्ती से डरे डॉक्टर मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों का रास्ता दिखा रहे हैं या किसी और वार्ड में भेज रहे हैं.

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