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George Fernandes: पादरी की ट्रेनिंग से लेकर इमरजेंसी के योद्धा बनने की कहानी

पूर्व केंद्रीय मंत्री, श्रमिक नेता और समाजवादी राजनीति के मुख्य चेहरा रहे जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया है. उन्होंने 88 साल की उम्र में आखिरी सांस ली

Updated On: Jan 29, 2019 10:33 AM IST

FP Staff

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George Fernandes: पादरी की ट्रेनिंग से लेकर इमरजेंसी के योद्धा बनने की कहानी

पूर्व केंद्रीय मंत्री, श्रमिक नेता और समाजवादी राजनीति के मुख्य चेहरा रहे जॉर्ज फर्नांडिस का निधन हो गया है. जॉर्ज फर्नांडिस ने 88 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और दिल्ली के मैक्स अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था. फर्नांडिस अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रक्षा मंत्री थे और इन्हीं के समय में करगिल युद्ध हुआ और भारत ने पोकरण में परमाणु परीक्षण भी किया.

जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म एक कैथलिक परिवार में 3 जून 1930 को मंगलोर में हुआ था. उनका पूरा नाम जॉर्ज मैथ्यू फर्नांडिस था. राजनीति में आने से पहले वे पत्रकार थे और ट्रेड यूनियन की राजनीति करते थे. राजनीति में आने के बाद फर्नांडिस ने देश के कई मंत्रालय संभाले, जिनमें संचार, उद्योग, रेलवे और रक्षा महत्वपूर्ण थे.

मंगलोर से जब घर वालों ने उन्हें बैंगलोर भेज दिया तब वे वहां पर पादरी की ट्रेनिंग ले रहे थे. बाद वे बॉम्बे चले गए और इसी के बाद शुरू हुआ उनका क्रांतिकारी आंदोलन. बॉम्बे जाने के बाद वे समाजवादी ट्रेड यूनियन आंदोलन में शामिल हो गए. ट्रेड यूनियन नेता बनने के बाद उन्होंने कई हड़ताल को अंजाम दिया. 1950 से 1960 के बीच फर्नांडिस ने रेलवे के साथ काम करते हुए कई स्ट्राइक किए. जॉर्ज फर्नांडिस ने एक समय में वो कर दिया जिसके बारे में आप सिर्फ सोच सकते हैं. 1974 में ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन का अध्यक्ष रहने के दौरान उन्होंने पूरे देश में रेल स्ट्राइक कर दिया था.

जब देश में इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया तो इसके खिलाफ वे एक बड़ा योद्धा बनकर उभरे और इंदिरा गांधी को चुनौती दी. बाद में सरकारी कार्रवाई से बचने के लिए वे अंडरग्राउंड हो गए लेकिन 1976 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

जॉर्ज फर्नाडिंस पहली बार साउथ बॉम्बे लोकसभा क्षेत्र से सांसद पहुंचे थे. इस सीट से उन्होंने कांग्रेस के एसके पाटिल को हराया था. इसके बाद वे देश के अलग-अलग हिस्सों से सांसद चुने गए. अपने आखिरी दौर में वे बिहार के मुजफ्फरपुर से सांसद हुआ करते थे. 2009 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी ने उन्हें इस सीट से टिकट देने से इनकार कर दिया था. बाद वे निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़े लेकिन हार गए.

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