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गंगा दशहरा: अद्भुत संयोग बना, इन मंत्रों का करें जाप और ऐसे करें पूजा

इस बार गंगा दशहरा मलमास माह में पड़ा है, इस कारण यह बहुत ही लाभप्रद है, इस दिन गंगा में स्नान करने का विशेष महत्व भी है

Updated On: May 23, 2018 09:40 PM IST

FP Staff

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गंगा दशहरा: अद्भुत संयोग बना, इन मंत्रों का करें जाप और ऐसे करें पूजा

दशहरा हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे सभी बड़ी श्रद्धा के साथ मनाते है. गंगा दशहरा देवी गंगा को समर्पित एक पर्व है जिसे ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है, जो सामान्यतौर पर मई या जून के महीने में आता है. गंगा दशहरा को गंगावतारण् भी कहा जाता है जिसका अर्थ है 'गंगा का अवतार'.

इस दिन स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है. स्कन्दपुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष करके करें. किसी भी नदी पर जाकर अर्घ्य (पूजादिक) एवं तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें.

इस साल गंगा दशहरा 24 मई यानी गुरुवार को पड़ रहा है. ज्योतिषशास्त्र की मानें तो इस बार गंगा दशहरा अद्भुत और महाफल दायक है. इस वर्ष गंगा दशहरा में गर करण, वृषस्थ सूर्य, कन्या का चंद्र होने से अद्भुत संयोग बन रहा है, जो महाफलदायक है. इस बार योग विशेष का बाहुल्य होने से इस दिन स्नान, दान, जप, तप, व्रत, और उपवास आदि करने का बहुत ही महत्व है.

क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा?

हिंदू पुराणों के अनुसार, ऋषि भागीरथ के पूर्वजों की अस्थियों को विसर्जित करने के लिए उन्हें बहते हुए निर्मल जल की आवश्यकता थी. जिसके लिए उन्होंने मां गंगा की कड़ी तपस्या की जिससे मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हो सके. परन्तु मां गंगा का भाव तेज होने के कारण वह उनकी इस इच्छा को पूर्ण नहीं कर पाई. परंतु उन्होंने कहा की अगर भगवान शिव मुझे अपनी जटाओं में समा कर पृथ्वी पर मेरी धारा प्रवाह कर दें तो यह संभव हो सकता है.

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उसके पश्चात् मां गंगा के कहे अनुसार शिव जी की तपस्या की और उनसे गंगा को अपनी जटाओं में समाहित करने के लिए प्रार्थना की. जिसके बाद गंगा मां ब्रह्मा जी के कमंडल में समा गई और फिर ब्रह्मा जी ने शिव जी की जटाओं में गंगा को प्रवाहित कर दिया. जिसके बाद शिव ने गंगा की एक चोटी सी धारा पृथ्वी की ओर प्रवाहित कर दी. जिसके बाद भागीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों को विसर्जित कर उन्हें मुक्ति दिलाई.

गंगा दशहरा का महत्त्व

गंगा दशहरा के दिन गंगा में स्नान का बहुत खास महत्व माना जाता है. माना जाता है जो व्यक्ति गंगा दशहरा के दिन गंगा में स्नान करता है उसके सभी पाप नष्ट हो जाते है और वह रोग मुक्त हो जाता है. इसके साथ-साथ गंगा दशहरा के दिन दान पुण्य आदि करना भी शुभ माना जाता है. मान्यता है इस दिन भक्तगण जिस भी वस्तु का दान करें उनकी संख्या दश (दस) होनी चाहिए. पुण्य प्राप्त करने के लिए इस दिन दान करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है.

इस वर्ष गंगा दशहरा ज्येष्ठ अधिकमास में होने से पूर्वोक्त कृत्य शुद्ध की अपेक्षा मलमास में करने से अधिक फल होता है. दशहरा के दिन काशी दशाश्वमेध घाट में दश (दस) प्रकार स्नान करके, शिवलिंग का दस संख्या के गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन करके रात्रि को जागरण करें तो अनंत फल मिलता है.

इन मंत्रों का करे जाप, होगा लाभ

गंगा दशहरा के दिन गंगा में या पास के किसी भी जलाशय या घर के शुद्ध जल से स्नान करके किसी साक्षात् मूर्ति के समीप बैठ जाए और फिर 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः' का जाप करें. फिर 'ऊँ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै स्वाहा' करके हवन करे. तत्पश्चात ' ऊँ नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं ( वाक्-काम-मायामयि) हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा.' इस मंत्र से पांच पुष्पाञ्जलि अर्पण करके गंगा को भूतल पर लाने वाले भगीरथ का और जहां से वे आई हैं, उस हिमालय का नाम-मंत्र से पूजन करे.

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दान करने से मिलेगी सभी पापों से मुक्ति

फिर दस फल, दस दीपक और दस सेर तिल का 'गंगायै नमः' कहकर दान करे. साथ ही घी मिले हुए सत्तू के और गुड़ के पिण्ड जल में डालें. सामर्थ्य हो तो कच्छप, मत्स्य और मण्डूकादि भी पूजन करके जल में डाल दें. इसके अतिरिक्त 10 सेर तिल, 10 सेर जौ, 10 सेर गेहूं 10 ब्राह्मण को दें. इतना करने से सब प्रकार के पाप समूल नष्ट हो जाते हैं और दुर्लभ- संपत्ति प्राप्त होती है. इस दिन गंगा नदी में खड़े होकर जो गंगा स्तोत्र पढ़ता है, वह अपने सभी पापों से मुक्ति पाता है.

गंगा दशहरा कथा

एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया. उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला. इंद्र ने सगर के यज्ञीय अश्व का अपहरण कर लिया. यह यज्ञ के लिए विघ्न था. परिणामतः अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया. सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला. फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया. खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात्‌ भगवान 'महर्षि कपिल' के रूप में तपस्या कर रहे हैं. उन्हीं के पास महाराज सगर का अश्व घास चर रहा है. प्रजा उन्हें देखकर 'चोर-चोर' चिल्लाने लगी.

महर्षि कपिल की समाधि टूट गई. ज्यों ही महर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले, त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई. इन मृत लोगों के उद्धार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भगीरथ ने कठोर तप किया था. भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तो भगीरथ ने 'गंगा' की मांग की.

इस पर ब्रह्मा ने कहा- 'राजन! तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो? परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा है कि वह गंगा के भार तथा वेग को संभाल पाएगी? मेरा विचार है कि गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है. इसलिए उचित यह होगा कि गंगा का भार एवं वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्रह प्राप्त कर लिया जाए.' महाराज भगीरथ ने वैसे ही किया.

भगवान शिव ने गंगा को समेटकर अपनी जटाएं बांध लीं

उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोड़ा. तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं. इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका.

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अब महाराज भगीरथ को और भी अधिक चिंता हुई. उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू किया. तब कहीं भगवान शिव ने गंगा की धारा को मुक्त करने का वरदान दिया. इस प्रकार शिवजी की जटाओं से छूट कर गंगाजी हिमालय की घाटियों में कल-कल निनाद करके मैदान की ओर मुड़ी. इस प्रकार भगीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके बड़े भाग्यशाली हुए.

उन्होंने जनमानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया. युगों-युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भगीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है. गंगा प्राणीमात्र को जीवनदान ही नहीं देती, मुक्ति भी देती है. इसी कारण भारत तथा विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है.

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