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भारत का भविष्य: राष्ट्रीय मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखेंगे मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने 'भविष्य के भारत' को लेकर अपना दृष्टिकोण पेश करने का फैसला किया है.

Updated On: Sep 12, 2018 01:37 PM IST

Arun Anand

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भारत का भविष्य: राष्ट्रीय मुद्दों पर संघ का दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखेंगे मोहन भागवत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने 'भविष्य के भारत' को लेकर अपना दृष्टिकोण पेश करने का फैसला किया है. यह संघ के इतिहास में उसकी तरफ से इस तरह का पहला प्रयास है. आरएसएस के इस दृष्टिकोण (विजन) के बारे में कोई और नहीं बल्कि संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद मंच पर भाषण के जरिये जानकारी मुहैया कराएंगे.

भागवत राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में 17 से 19 सितंबर के बीच आयोजित व्याख्यानों की श्रृंखला में भविष्य के भारत को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दृष्टिकोण से संबंधित अपनी बातों को विस्तार से रखेंगे. इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए 1,000 चुनिंदा लोगों (इसमें मुख्य तौर पर वैसे लोग शामिल हैं, जिनका आरएसएस से जुड़ाव नहीं रहा है और वे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अगुआ की भूमिका में रहे हैं) को निमंत्रण भेजा गया है.

कार्यक्रम के पहले दो दिनों के दौरान संघ प्रमुख यानी सरसंघचालक का तकरीबन डेढ़ घंटे के भाषण का सत्र होगा. सरसंघचालक मोहन भागवत इस दौरान हर दिन राष्ट्रीय महत्व से संबंधित अहम मुद्दों पर संगठन की राय के बारे में जानकारी मुहैया कराएंगे. इस कार्यक्रम के तीसरे दिन सवाल-जवाब का सत्र होगा, जहां भागवत पिछले दो दिनों के विमर्श पर आधारित श्रोताओं के सवालों के जवाब देंगे.

आलोचकों को कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता क्यों?

RSS Chief at an event

यहां सवाल यह उठता है कि आरएसएस इस वक्त इस तरह के कार्यक्रम का आयोजन क्यों कर रहा है? कई लोग इसे 2019 के लोकसभा चुनावों से जोड़ने की कोशिश कर सकते हैं. साथ ही, इसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए समर्थन इकट्ठा करने की तरकीब के तौर पर भी देख सकते हैं, जो फिलहाल केंद्र की सत्ता पर काबिज है. बहरहाल, इस बात को लेकर भी मीडिया में तरह-तरह की अटकलें लगाई गई हैं कि इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए किन-किन लोगों को निमंत्रण भेजा जाएगा?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि वह इस कार्यक्रम में सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों समेत जीवन के तमाम क्षेत्रों से जुड़े लोगों को इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करेगा. यहां फिर से सवाल खड़ा होता है कि आरएसएस की तरफ से अपने सबसे मुखर आलोचकों को इस कार्यक्रम का न्योता क्यों भेजा जा रहा है?

पहले, हम यह कार्यक्रम आयोजित करने की वजह को समझने की कोशिश करते हैं. आरएसएस की 60,000 से ज्यादा रोजाना चलने वाली शाखाएं हैं और उसके पास तीन दर्जन से भी ज्यादा ऐसे संगठन हैं, जिनका संचालन उसके स्वयंसेवकों द्वारा किया जाता है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की मौजूदगी समाज के तकरीबन हर क्षेत्र में नजर आती है.

इसकी एक बानगी से इसे और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है- एकल फाउंडेशन जैसा आरएसएस से प्रेरित संगठन 65,000 से भी ज्यादा एक शिक्षक वाला स्कूल चला रहा है. ये स्कूल देश के वैसे क्षेत्रों में हैं, जहां अब तक बाकी संगठन या इकाइयां अपनी पहुंच नहीं बना पाए हैं. विद्या भारती और समर्थ शिक्षा समिति जैसे संगठनों द्वारा चलाए जा रहे नियमित स्कूलों में 30 लाख से भी ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं. इन स्कूलों में समाज के सभी धर्मों और समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं. यहां एक और तथ्य गौर करने लायक है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित संगठन देशभर में सामाजिक कल्याण से जुड़ी करीब 1.70 लाख परियोजनाएं चला रहे हैं.

संघ के अपने आंतरिक अनौपचारिक आंकलन के मुताबिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभर में 4 करोड़ लोगों से संपर्क में है, जो किसी न किसी तरह से उससे जुड़े हैं. अतः इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश के आगे बढ़ने की दिशा पर असर के मामले में आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नफरत कर सकते हैं या प्यार कर सकते हैं, लेकिन उसे पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं कर सकते.

संघ भी इस बात को अच्छी तरह से समझता है. इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस बात का भी बखूबी अहसास है कि समाज के सभी तबकों से जुड़े बड़ी संख्या में लोगों की नजर इस संगठन पर है. कई सारे लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानना चाहते हैं. साथ ही, वे इस बारे में भी जानना चाहते हैं कि देश के भविष्य को लेकर इस संगठन का नजरिया क्या है?

अपने बारे में गलत धारणाओं को दूर करना चाहता है संघ

आरएसएस के आलोचकों के द्वारा इस संगठन के खिलाफ अब तक काफी कुछ लिखा जा चुका है, लिहाजा इस संगठन को लेकर कई तरह की गलतफहमियां भी रही हैं. उदाहरण के तौर पर एक गलतफहमी यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का लक्ष्य भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना है यानी जाहिर तौर पर उसमें अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है.

दूसरी गलतफहमी यह है कि संघ सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जीतने में मदद करने के लिए काम करता है और यह सभी अन्य राजनीतिक पार्टियों के खिलाफ है. तीसरी गलत धारणा यह है कि आरएसएस खुला संगठन नहीं है, यह अपने तौर-तरीकों और साधनों के बारे में चीजें गुप्त रखता है और यह बेहद रूढ़िवादी इकाई भी है.

इस तरह की गलत धारणाओं के चलते कुछ लोगों ने राष्ट्र को लेकर आरएसएस के दृष्टिकोण को गलत तरीके से समझा है. इसके अलावा, भारत के भविष्य को लेकर संगठन के दृष्टिकोण के बारे में जानने को लेकर भी देश के युवाओं में दिलचस्पी बढ़ी है.

संगठन के प्रति बढ़ती दिलचस्पी और जिज्ञासा भी हैं अहम वजह

Rashtriya Swayamsevak Sangh organises a rally in Meerut

आरएसएस के बारे में इस तरह की उत्सुकता और बढ़ती जिज्ञासा भी इस तरह के अभूतपूर्व कार्यक्रम के आयोजन की एक अहम वजह है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 93 साल के इतिहास में अब तक ऐसा कोई भी कार्यक्रम नहीं हुआ है, जिसमें सरसंघचालक (मौजूदा संघ प्रमुख छठे सरसंघचालक हैं) द्वारा किसी एक शहर के एक कार्यक्रम में लगातार तीन दिनों तक भाषण दिया गया हो.

आरएसएस की विचारधारा के दो तत्व हैं और संघ इसके बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करना चाहता है. अगर हम संगठन के नजरिये से देखें तो मोहन भागवत के व्याख्यानों की इस श्रृंखला से इस मामले में उसे दीर्घकालिक फायदा होगा. आरएसएस की विचाराधारा का पहला पहलू यह है कि यह स्वयंसेवकों को सिर्फ प्रेरित और तैयार करता है, जो समाज को बदलने के लिए काम करते हैं.

ऐसे में समाज के बदलाव के लिए किए गए किसी भी काम का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नहीं मिलना चाहिए. उसके मुताबिक, दरअसल समाज ही खुद को बदल रहा है.

दूसरा मत यह है कि पूरे भारतीय समाज की मुख्य तौर पर दो श्रेणिया हैं- पहली श्रेणी के तहत वैसे लोग हैं जो आरएसएस से जुड़े हैं और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में कारगर भूमिका निभा रहे हैं. दूसरी श्रेणी वैसे लोगों की है, जिन्होंने अब तक ऐसा नहीं किया है, लेकिन आखिरकार वे ऐसा करेंगे.

इसलिए, आरएसएस पूरे समाज में किसी को प्रतिद्वंद्वी की तरह नहीं देखता है, यहां तक कि अपने कटु से कटु आलोचकों को भी वह अपना विरोधी नहीं मानता. उसका मानना है कि भारतीय समाज को बदलने के लिए अंत में वे सभी काम करने के लिए साथ आएंगे.

इसी वजह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस कार्यक्रम और इसमें होने वाले मोहन भागवत के व्याख्यानों के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों और जीवन के तमाम क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों को निमंत्रण भेजा गया है. यही कारण है कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को आरएसएस ने अपने नागपुर स्थित मुख्यालय बुलाया और वह वहां गए भी.

आरएसएस में इस तरह की परंपरा रही है. उसने पहले भी ऐसा किया है और अब भी यह सिलसिला जारी है. अंतर सिर्फ इतना है कि संगठन का जबरदस्त विस्तार हो चुका है, इसलिए इसकी कोशिशें अब ज्यादा दृष्टिगोचर हैं और यह कई लोगों के लिए नई पहल जान पड़ती है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है.

अगर कोई वास्तव में आरएसएस की विचाराधारा, दर्शन और कार्य करने के तरीके को समझना चाहता है, उसे एकआयामी राजनीतिक दृष्टिकोण को छोड़कर इसके बजाय बहुआयामी सामाजिक दृष्टिकोण का विकल्प देखना होगा.

(लेखक इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र के CEO और 'नो एबाउट आरएसएस' किताब के लेखक हैं. लेख में कही गई बातें उनकी निजी राय हैं.)

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