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'पद्मावती' पर हायतौबा, महान गणितज्ञ को ऑपरेशन के लिए पैसा नहीं

किसी सरकार ने गंभीरता से वशिष्ठ नारायण सिंह की परवाह नहीं की. लालू यादव को छोड़कर बाकी सभी ने मीडिया के दबाव में, वोट को ध्यान में रखकर टुकड़ों में कुछ-कुछ किया और कराया

Updated On: Nov 26, 2017 11:47 AM IST

Kanhaiya Bhelari Kanhaiya Bhelari
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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'पद्मावती' पर हायतौबा, महान गणितज्ञ को ऑपरेशन के लिए पैसा नहीं

परसेप्शन सही नहीं है कि केवल शराब, गांजा, भांग, चरस, अफीम, हेरोइन और कोकीन का नशा ही मनुष्य को बर्बादी के कगार पर ले जाता है. कभी-कभी बेइंतहा देशप्रेम का नशा भी आदमी को आर्थिक और बौद्धिक रूप से खत्म कर देता है.

अगर महान गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह इस नशा को अंगीकार नहीं किए होते तो आज उनकी गिनती विश्व के महानतम वैज्ञानिकों में होती. धन-दौलत, मान और सम्मान दाई की तरह उनकी सेवा करतीं.

महान गणितज्ञ के पास ऑपरेशन कराने तक के लिए पैसा नहीं है

अयोध्या प्रसाद सिंह की ये दर्द भरी बातें किसी को भी अचंभित कर सकती हैं. लेकिन यह हकीकत के नजदीक प्रतीत होता है. वशिष्ठ नारायण सिंह वर्ष 1972 में अमेरिका में लाखों की तनख्वाह वाली नौकरी को लात मार कर वापस भारत इसलिए लौट आए थे कि देश बड़ा खुश होगा, देशवासी बड़ी शाबाशी देंगे. जबकि हुआ एकदम उल्टा. आज की स्थिति यह है कि यह खांटी देसज हीरा पैसों के अभाव में अपना मनपसंद व्यंजन खाने के लिए तरसता है. सबसे दुखद बात यह है कि महान गणितज्ञ के पास अपने टेस्टीकल का ऑपरेशन कराने तक के लिए पैसा नहीं है.

वशिष्ठ नारायण सिंह साल 2013 से अपने अनुज और आर्मी के रिटायर्ड सूबेदार अयोध्या प्रसाद सिंह द्वारा किराए पर लिए मकान में पटना में रहते हैं. खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना सब कुछ स्वयं अपने से करते हैं. बिना किसी से मदद लिए. वो अखबार, गीता, रामायण और अष्ठावक्र की जीवनी भी ज्ञानवर्धन के लिए पढ़ते रहते हैं. यह सारी पठनीय सामग्री उनके बेड पर रखी हुई है. मन को हल्का करने और गम को मिटाने के लिए बांसुरी भी बजाया करते हैं. मस्ती में गीत भी गुनगुनाते हैं- ‘तन डोले, मेरा मन डोले, मेरा दिल का गया करार रे.’

Vasistha Narayn Singh

इतना ही नहीं, आगंतुक के साथ बातचीत में वशिष्ठ नारायण सिंह कभी और कहीं से भी ऐसा आचरण नहीं करते हैं जिससे आभास हो कि वो सीजोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी से ग्रसित हैं. सब कुछ नार्मल सा दिखता है. उन्हें याद है कि वो अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन एल कैल्ली के कैलीफोर्निया आवास में रहते थे. उनकी इकलौती बेटी उनसे बेपनाह प्यार करती थी. बातचीत के दौरान उन्होंने लेखक को बताया कि ‘वो मुझे जब पतिदेव कहकर बुलाती थी तो मुझे बड़ा आनंद आता था.'

दिल प्यार पाना चाहता था पर अंतरआत्मा देश की सेवा

अयोध्या प्रसाद सिंह बताते हैं कि यह बात सही है कि जाॅन एल कैल्ली अपनी बेटी की शादी बड़े भाई से कर के उनको वहीं पर बसाना चाहते थे लेकिन पिताजी इसके लिए राजी नहीं हुए. भैया की इच्छा थी कि शादी करूं पर घर जमाई न बनकर भारत मां की सेवा में खुद को समर्पित कर दूं. पर इसके लिए कैल्ली तैयार नहीं थे. दिल प्यार पाना चाहता था पर अंतरआत्मा देश की सेवा. आखिर में दिल हार गया और अंतरआत्मा की जीत हुई.

अमेरिका से वापस लौटते ही वशिष्ठ नारायण सिंह आईआईटी कानपुर में पढ़ाने लगे. इसके 8 महीने बाद टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई चले गए. बाद में वो इंडियन स्टैटीस्टीकल इंस्टीटयूट (आईएसआई) कोलकता में पक्की नौकरी करने लगे. इस बीच वर्ष 1973 में छपरा के एक प्रतिष्ठित परिवार की डॉक्टर लड़की वंदना सिंह से उनकी शादी हो गई. दुर्भाग्य से यह शादी 1976 में टूट गई. वंदना सिंह तलाक लेकर उनकी जिंदगी से हमेशा के लिए दूर चली गईं. अयोध्या प्रसाद सिंह बताते हैं कि भाभी वंदना भैया वशिष्ठ के साथ मात्र डेढ़ साल तक ही रहीं.

Vasistha Narayn Singh

वशिष्ठ नाराण सिंह

तलाक के बाद बशिष्ठ नारायण सिंह अचानक मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो गए. बिहार सरकार में सिपाही पिता लाल बहादुर सिंह ने उन्हें रांची के मेंटल हास्पिटल में इलाज के लिए भर्ती कराया. यहां 1987 तक उनका इलाज चला. अयोध्या प्रसाद सिंह उन्हें अपने साथ ट्रेन से पूना लेकर जा रहे थे जहां उनकी डिफेंस में पोस्टिंग थी. रास्ते के किसी स्टेशन पर वशिष्ठ नारायण सिंह उतरकर गायब हो गए.

भोजपुर जिले के पुश्तैनी गांव बसंतपुर के दो लोगों ने वशिष्ठ नारायण सिंह को 1993 में छपरा में पागलों की तरह घूमते देखा. उन्हें पकड़कर गांव लाया गया. इस हीरे की चमक और शोहरत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव खुद बसतंपुर जाकर उनसे मिले. और अपने प्रतिनिधि के साथ बेहतर इलाज के लिए बंगलुरु भेजा.

परिवार में सबसे छोटे भाई और दो भतीजों को सरकारी नौकरी दे दी

अयोध्या प्रसाद सिंह याद कर बताते हैं कि लालू यादव ने पैरवी कर के मेरा भी ट्रांसफर वहीं करवा दिया ताकि मैं ठीक ढंग से उनकी देख भाल कर सकूं. इतना ही नहीं सीएम लालू यादव ने गरीबी को मिटाने के ख्याल से परिवार में सबसे छोटे भाई और दो भतीजों को सरकारी नौकरी भी दे दी.

वशिष्ठ नारायण सिंह की तबियत 2002 में एक बार फिर खराब हुई. तब के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा ने इलाज के लिए रूचि दिखाई. अपने प्रतिनिधि को भेजकर उन्हें दिल्ली बुलाया जहां सरकारी खर्चे पर एक साल तक इलाज चला. बहुत हद तक ठीक भी हो गए. गांव पर नॉर्मल तरीके से रहने लगे. वर्ष 2009 में एक बार फिर उनकी तबियत खराब हुई तो मीडिया में बहुत हो-हल्ला मचने के बाद नीतीश कुमार की सरकार ने दिल्ली के मानसिक हास्पिटल में इलाज के लिए भेजा.

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कम शब्दों में यह कहना असंगत नहीं होगा किसी सरकार ने गंभीरता से देश के इस अनमोल रत्न की परवाह नहीं की. लालू यादव को छोड़कर बाकी सभी ने मीडिया के दबाव में, वोट को ध्यान में रखकर टुकड़ों में कुछ-कुछ किया और कराया. अगर मुकम्मल तरीके से वशिष्ठ नारायण सिंह का इलाज किया जाए तो यह हीरा फिर से चमकने लगेगा. पटना के नामी फिजिशियन डॉक्टर गौरीशंकर सिंह का कहना है कि सीजोफ्रेनिया लाइलाज बीमारी नहीं है.

देशप्रेम ने वापस बुलाया तो मतलबी जमाने ने मानसिक रोगी बना दिया

साल 1963 में बिहार भर के मैट्रिक एग्जाम में टाॅपर रहे इस गणितज्ञ को 2 साल के भीतर एमएससी की डिग्री देकर रिसर्च वर्क के लिए अमेरिका भेज दिया गया. देशप्रेम ने भारत वापस बुलाया तो मतलबी जमाने ने इन्हें मानसिक रोगी बना दिया. आज समाज के ठेकेदार और रणबांकुरे इतिहास की क्षत्राणी रानी पद्मावती की ‘बेइज्जती’ के सवाल पर किसी की नाक तो किसी की गर्दन काटने का फतवा जारी कर रहे हैं. वोट की राजनीति करने वाले महारथी लोग सियासी लाभ के लिए ‘पद्मावती रूपी आग’ में घी डाल रहे हैं.

बहरहाल, वकील आनंद सिंह को भरोसा है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जानकारी में यह बात आती है तो 73 वर्ष के इस महान गणितज्ञ डॉ. बशिष्ठ नारायण सिंह, जिसने आंइस्टीन के सिद्धांत ई=एमसी स्क्वायर (E= mc2)- को कभी चुनौती दी हो, का कल्याण हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो देश और समाज को ही लाभ होगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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