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जानिए सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी कहानीः प्लानिंग से एक्जिक्यूशन तक

भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा (रिटायर्ड) के नेतृत्व में इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था, जानिए सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी कहानी डीएस हुडा की जुबानी

Updated On: Jan 21, 2018 04:15 PM IST

FP Staff

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जानिए सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी कहानीः प्लानिंग से एक्जिक्यूशन तक
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पठानकोट, पुंछ और उरी पाकिस्तान ने जब सब्र का बांध तोड़ दिया, तो मजबूर होकर भारत को 28-29 सितंबर 2016 को 'सर्जिकल स्ट्राइक' का सहारा लेना पड़ा. भारतीय कमांडो ने PoK में घुसकर आतंकियों को ढेर किया और उनके लॉन्च पैड को हमेशा के लिए नेस्तनाबूद कर दिया. इस खतरनाक ऑपरेशन को अंजाम देकर हमारे जवान सुरक्षित अपनी सीमा में लौट भी आए.

भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुडा (रिटायर्ड) के नेतृत्व में ही इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था. आखिर 'सर्जिकल स्ट्राइक' होती क्या है? कैसे होती है इसकी प्लानिंग? कैसे इसे एक्शन में बदला जाता है? जानें, सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी कहानी डीएस हुडा की जुबानी...

जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले के उरी सेक्टर में 18 सितंबर 2016 की सुबह 4 आतंकी कंटीले तारों को काटकर पीछे से आर्मी कैंप में घुसे, लेकिन सेंट्री पोस्ट को देखते हुए उन्हें पीछे हटना पड़ा. करीब 200 मीटर की दूरी पर उन्हें फिर से एक सुरक्षित जगह दिखी. वहां से आतंकी दीवार फांदकर कैंप में दाखिल हुए. सुबह का वक्त था, कैंप में जवान सो रहे थे.

इस कैंप में रहने वाले सैनिक बटालियन में नए-नए शामिल हुए थे. दूसरी यूनिट के साथ उन्हें रिप्लेस होना था. नई यूनिट को आगे करी 13 हजार फीट की ऊंची जगह पर पैदल चलकर जाना था. ऐसे में अपने भारी सामानों को छोड़ने के लिए नई यूनिट के जवान कुछ दिन के लिए उरी सेक्टर के कैंप में ठहरे हुए थे.

उरी हमले के बाद ही तय हो गई थी सर्जिकल स्ट्राइक की कहानी 

उरी गैरिसन इंफेंट्री ब्रिगेड का हेडक्वार्टर है. यहां भारी सामानों की स्टोरिंग के लिए अच्छा खासा स्पेस है. लाइन ऑफ कंट्रोल में तैनात होने वाले जवान यहां अपना भारी सामान छोड़ने आते हैं. अतिरिक्त जवानों के लिए अलग से टेंट लगाया जाता है.

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सुबह का वक्त था, तो ज्यादातर जवान सो रहे थे. कुछ जवान पहरेदारी में लगे थे. आतंकियों के अचानक हमला करने से उन्हें संभलने का मौका नहीं मिला. हमलावर राइफल से फायरिंग कर रहे थे. उनके पास ग्रेनेड और केमिकल मिक्स भी था. आतंकियों ने कैंप को पूरी तरह से तबाह कर दिया. 19 सैनिक शहीद हुए.

दोपहर में मैं और जनरल दलबीर सिंह दिल्ली से उरी के लिए रवाना हुए. जले हुए टेंटों और राखों के ढेरों में जवानों की बॉडी पड़ी थी. वो मंजर देखकर हम दोनों को यह साफ हो चुका था कि इस आतंकी हमले का मुंहतोड़ जवाब देना बहुत जरूरी है. किसी और कारण से नहीं, तो भारतीय सेना के गौरव को बनाए रखने के लिए एक्शन लेना होगा.

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नॉदर्न कमांड में दोनों स्पेशल फोर्सेज के कमांडिंग ऑफिसरों (COs) ने हमें लाइन ऑफ कंट्रोल के पास उन जगहों की लिस्ट तैयार करने का टास्क दिया, जिन्हें आतंकी टारगेट कर सकते हैं. इसी दौरान मैं क्रॉस बॉर्डर ऑपरेशन की संभावनाएं, लक्ष्य और उद्देश्यों पर चर्चा करने के लिए दिल्ली लौटा. इस मिलिट्री प्लान के लिए हमें स्पष्ट राजनीतिक गाइडेंस की जरुरत थी.

छोटी सूचनाओं को नरजअंदाज करना हो सकता था खतरनाक 

नॉर्दर्न कमांड में हम पिछले एक साल से आतंकी कैंप में स्ट्राइक की प्लानिंग कर रहे थे. टारगेट से जुड़ी हर छोटी से छोटी जानकारियां इकट्ठा की जा रही थी. इसके बाद प्लानिंग हुई. हालांकि, वास्तविक चीजें हमारी प्लानिंग से कुछ अलग थी.

जब अचानक से बहुत सारी जिम्मेदारियां आ जाती हैं, तो आपके दिमाग में हार-जीत की संभावनाओं को लेकर बहुत सारी चीजें चलने लगती हैं. एक छोटे से इनपुट को भी नजरअंदाज करना हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकता था. ऐसी अनिश्चितता में हम बस यही कर सकते थे कि अपने अधिकारियों (कमांडिंग ऑफिसर्स) पर पूरा भरोसा करें और पूरे आत्मविश्वास के साथ टास्क को खत्म करें.

हमारा ऑपरेशन पूरा हुआ. हमारे जवानों ने पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के अंदर घुसे और वहां कई आतंकी कैंप को तबाह कर दिया. सर्जिकल स्ट्राइक के प्लानिंग में हमने कई घंटे बीता दिए और तब जाकर फाइनल प्लान तैयार हुआ. गोपनीयता के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की टीम छोटी रखी गई थी. लेकिन, इससे ऑपरेशन पर कोई असर नहीं पड़ा.

हमारा लक्ष्य ऑपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देना था. इसके लिए हमने मामूली से मामूली जानकारी को भी नजरअंदाज नहीं किया. ऑपरेशन की शुरुआत से लेकर आखिर तक हमारी नजर थी. हमारे यह सुनिश्चित करना था कि हमारे जवान आतंकी कैंपों को तबाह करने के बाद वहां से सुरक्षित निकल आए.

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आपको हमेशा परफेक्ट इंटेलिजेंस नहीं मिल पाता. कैंप ए का तबाह करना सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा. यह कैंप पाकिस्तानी क्षेत्र के बिल्कुल गहराई में था. यहां सबसे ज्यादा आतंकी थे. कई पाकिस्तानी आर्मी के पोस्ट से होकर इस रूट तक पहुंचा जा सकता था.

छोटी टीम बॉर्डर पार जाकर पहले ही ले चुकी थी जायजा 

लंबी बहस के बाद यह तय हुआ कि लाइन ऑफ कंट्रोल के पार हालात का जायजा लेने और रूट कंफर्म करने के लिए एक टीम भेजा जाए. हम रिस्क ले रहे थे. लेकिन, यह काम कर गया. एक छोटी टीम बॉर्डर के पार गई. वहां रूट का पता लगाने के बाद लौटी. इससे हमें प्लान को फाइनल करने में सबसे ज्यादा मदद मिली.

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सर्जिकल स्ट्राइक की रात उधमपुर ऑपरेशन रूम में लगे स्क्रीन पर हम आतंकी कैंपों के तबाह होने की लाइव इमेज देख रहे थे. भोर तक कैंप ए को छोड़कर सभी कैंपों में स्ट्राइक हो गया था. हम उत्सुकता से इंजतार कर रहे थे. आतंकी कैंप से निकलकर इधर उधर भाग रहे थे. फायरिंग कर रहे थे. पहले हम समझ नहीं पा रहे थे कि क्या आतंकियों को इस तरह के ऑपरेशन का अंदाजा हो गया था? सुबह 6:12 हमने स्क्रीन पर रॉकेट लॉन्चर का एक ब्लैक प्लम देखा. हमला शुरू हो चुका था.

जंग में जीत हासिल करने के कई तरीके होते हैं. लेकिन, सबसे अच्छा वो तरीका होता है, जिसमें आपकी जीत भी हो और आपके सैनिक भी जिंदा रहे. एक सैनिक जंग में अपनी जिंदगी को खतरे में डाल देता है. लेकिन, सेना को अपने हर जवान की मौत का हमेशा अफसोस रहता है. मेरे लिए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सभी जवानों का सुरक्षित लौटना सबसे बड़ी सफलता रही.

एक अंग्रेजी कहावत है- victory has a thousand fathers, but defeat is an orphan (जीत के हजार दावेदार होते हैं, लेकिन हार अकेला होता है.) इसमें कोई शक नहीं है कि सर्जिकल स्ट्राइक की सफलता में कई लोगों का योगदान रहा. कई खास लोग इस अभूतपूर्व प्लानिंग का हिस्सा रहे.

हालांकि, इस ऑपरेशन का कुछ क्रेडिट उन जवानों को को जाता है, जिन्होंने एलओसी के पार जाकर अपनी जिंदगी को खतरे में डाला. उन्होंने ऐसा किसी लाभ या सम्मान के लिए नहीं किया था. वो बस उस आदेश का पालन कर रहे थे, जो उन्हें उनके अधिकारियों ने दिया था. यही जवान सर्जिकल स्ट्राइक के रियल हीरो हैं.

(साभारः न्यूज 18)

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