S M L

मोदी सरकार के 4 साल: जनधन से GST तक 9 योजनाएं जिन्होंने इस कार्यकाल को अहम बनाया

प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र मोदी 24 मई 2018 को अपने चार साल पूरे कर लेंगे. इस दरम्यान मोदी सरकार ने आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर कई फैसले लिए हैं जिनमें 9 बहुत अहम हैं.

Updated On: May 23, 2018 04:10 PM IST

Gautam Chikermane

0
मोदी सरकार के 4 साल: जनधन से GST तक 9 योजनाएं जिन्होंने इस कार्यकाल को अहम बनाया

प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र मोदी 24 मई 2018 को अपने चार साल पूरे कर लेंगे. इस दरम्यान मोदी सरकार ने आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर कई फैसले लिए हैं जिनमें 9 बहुत अहम हैं.

इन फैसलों का रिश्ता वित्त-व्यवस्था को समावेशी बनाते हुए उसमें अधिक से अधिक लोगों को शामिल करने से है तो कालेधन की पहचान और उस पर चोट करने से लेकर कारपोरेट में दिवालियापन जैसे हालात से निपटने से भी. बीते 48 महीनों में मोदी सरकार के ये फैसले लगातार सार्वजनिक बहस-मुबाहिसों में छाये रहे हैं. इनमें से कुछ नीतियां पुराने विचारों का ही विस्तार हैं यानि पहले से जारी काम को आगे और गति दी गई है.

यहां मिसाल के तौर पर आधार और जीएसटी(सेवा एवं वस्तु कर) का नाम लिया जा सकता है जबकि नोटबंदी(डिमोनेटाइजेशन) तथा इन्‍सॉलवेंसी एंड बैंकरप्‍सी कोड(दिवालिया एवं शोधन अक्षमता संहिता) जैसे फैसले नये विचारों का नीतिगत रूप हैं.

जीएसटी सरीखे कुछ मामलों में सरकार को संसद, राज्यों तथा मीडिया का सहयोग मिला जबकि कुछ अन्य फैसलों जैसे कि नोटबंदी में ऐसी मदद ना मिली. अच्छी हो या बुरी लेकिन ये नीतियां (2014, 2015 और 2017 में एक-एक तथा 2016 में छह) मोदी सरकार की आर्थिक सोच को परिभाषित करती हैं. इन नीतियों की बिनाह पर हम जानते हैं कि मोदी अगर 2019 में सत्ता में लौटे तो उनकी सरकार में नई नीतियां किस बुनियाद पर बनेंगी. अगर वे सत्ता में नहीं लौटते तब भी जो सरकार बनेगी उसे ये नीतियां जारी रखनी होंगी जैसे कि मोदी सरकार ने आधार और मनरेगा को जारी रखा और मजबूत बनाया. इस लेख में आगे मोदी सरकार की इन नौ नीतियों का मूल्यांकन किया गया है.

प्रधानमंत्री जन-धन योजना

प्रधानमंत्री पद पर बैठने के तीन माह के अंदर नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री जनधन योजना की शुरुआत की. यह शुरुआत चमकदार वित्तीय ब्यौरों और राजनीतिक नारों के बीच हुई थी. योजना लोगों को देश के शीर्ष स्तर से वित्तीय-धारा में शामिल करने की थी. जो देशवासी बैंक में खाता नहीं खोल सके हैं, उन्हें जनधन योजना ने बैंक अकाउंट खोलने का मौका दिया. ऐसे लोगों को डेबिट कार्ड मिला तथा बीमा और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जुड़ने का मौका भी.

JAN DHAN YOJNA

जहां तक संख्या का सवाल है, इस योजना के जरिए जिस तादाद में भारतीयों का वित्तीय-धारा में प्रवेश हुआ उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था. साल 2018 की 17 जनवरी तक जनधन योजना के लाभार्थियों की संख्या तकरीबन 31 करोड़ हो चुकी थी. इसमें 60 फीसद लाभार्थी ग्रामीण इलाकों के हैं और योजना के तहत कुल जमाराशि है 73,690 करोड़ रुपये. हिसाब लगायें तो जनधन योजना के तहत खुले हर खाते पर औसतन 2377 रुपये की जमा राशि आती है, हालांकि न्यूनतम जमाराशि की कोई शर्त नहीं रखी गई है.

इससे संकेत मिलता है कि बिना बैंक खाते वाले भारतीयों को वित्तीय-तंत्र में औपचारिक रूप से शामिल करने की दिशा में कदम उठाया जा चुका है. आलोचकों ने सुरक्षा और निजता के सवाल उठाये हैं और योजना के आगे बढ़ने के साथ ये समस्याएं खुद ही खत्म हो जायेंगी. बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जनधन योजना से जुड़ने के कारण गरीबों को वित्तीय-तंत्र का फायदा हुआ है.

मध्यस्थता एवं सुलह(संशोधन) विधेयक (आर्बिट्रेशन एंड कंसिलिएशन एमेंडमेंट एक्ट)

मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले नौ महीने की अवधि में संसद में आर्बिटरेशन एंड कंसिलिएशन(एमेंटमेंट) एक्ट(एसीएए) पारित करवाया. इस कानून का मकसद व्यावसायिक विवाद के मसलों को तेजी से सुलझाने की व्यवस्था कायम करना था.

यों इस कानून का बुनियादी ढांचा तो 1899 से ही चला आ रहा है. उस वक्त इसे इंडियन आर्बिट्रेशन एक्ट के नाम से जाना जाता था. देश की आजादी के बाद इस कानून पर अमल और इसे देश की स्थितियों के अनुकूल ढालने की कोशिशों का इतिहास भी बहुत लंबा है. एसीएए के जरिए विधायी और कानूनी बाधाओं को दूर करने की कोशिश की गई है. मिसाल के लिए आर्बिट्रेशन के मसले पर कायम जस्टिस सर्राफ समिति ने लिखा है कि व्यावसायिक विवाद से संबंधित मसलों में मध्यस्थता के दौरान, उससे पहले और उसके बाद की स्थितियों में भी अदालतें फैसले को लंबी देरी तक टाले रहती हैं.

नये कानून ने हितों की टकराव की स्थिति को ज्यादा सहज बनाया है और मध्यस्थ के जरिए खुलासे की व्यवस्था दी गई है.

कानून का सबसे अहम पहलू है कि अब व्यावसायिक विवाद में मध्यस्थता और सुलह के जरिए समाधान 12 महीनों के भीतर कर लेना अनिवार्य है. कानून का मूल मकसद भी यही है कि व्यावसायिक विवादों में समाधान की राह तेजी से अपनायी जाय.

हाइड्रोकॉर्बन के अन्वेषण और लाइसेंसिंग की नीति

मोदी सरकार ने अपने शासन के 23वें महीने में ऊर्जा क्षेत्र की निजी कंपनियों और सरकार के बीच चली आ रही बाधाओं को दूर करने के प्रयास किए. इसके लिए हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग(हेल्प) नीति लायी गई और 19 साल पुराने नेल्प(न्यू एक्सप्लोरेशन लाइसेंसिंग पॉलिसी) को खत्म किया गया. जहां तक ‘हेल्प’ के क्रियान्वयन का सवाल है, इसमें प्रस्तावित वित्तीय मॉडल में लाभ में हिस्सेदारी की उस व्यवस्था को बदला गया है जो नेल्प के लागू रहते अमल में थी. निजी कंपनियों को तेल और गैस के फील्ड नीलामी पर देने के नियमों में सुधार किया गया है. पुराने नियमों के कारण सरकार और निजी कंपनियों के बीच कारोबारी बाधाएं आ रही थीं.

नियम में सुधार से कंपनियों को छोटे-मोटे खर्चों में छूट हासिल होगी और उन्हें प्रशासनिक मामलों में भी एक हद तक फैसले लेने में सहूलियत होगी. नई नीति में तेल और गैस के खोज और उत्पादन के सिलसिले में हर तरह के हाइड्रोकार्बन जैसे कोल बेड मीथेन, शेल गैस तथा तेल, टाइट गैस तथा गैस हाइड्रेट आदि में एक समान लाइसेंसिंग की व्यवस्था है. नेल्प के लागू रहते हाइड्रोकार्बन की अलग-अलग किस्मों के लिए अलग-अलग लाइसेंस की व्यवस्था थी. अक्सर होता ये था कि कंपनी खोजने किसी और हाइड्रोकॉर्बन को चली है लेकिन अपनी खोज में हासिल हुआ कोई और हाइड्रोकॉर्बन.

ऐसे में कंपनी को नये सिरे से लाइसेंस लेना होता था. नये नियम में प्राकृतिक गैस के सिलसिले में कंपनियों को मार्केटिंग और मूल्य-निर्धारण के मामले में पहले की तुलना में ज्यादा सहूलियत दी गई है. बहरहाल, अभी यह साबित होना शेष है कि नेल्प की तुलना मे हेल्प कारगर हो पाता है या नहीं.

आधार

यूपीए सरकार ने साल 2009 की जनवरी में लोगों के पहचान के सत्यापन की एक युक्ति के रूप में ‘आधार’ की शुरुआत की थी. मोदी सरकार ने अपने शासन के 23 वें महीने में 26 मार्च 2016 को आधार को मजबूत बनाने के प्रयास किए और उसे संस्थागत रूप दिया. लोगों के सामाजिक कल्याण को ध्यान में रखते हुए बात उनके बीच पेंशन बांटने की हो या फिर मजदूरी का भुगतान करने की, बहुत जरूरी है कि जो राशि जिसके हिस्से और अधिकार की है वह उसी को मिले. लोगों को ऐसी बुनियादी सुविधाएं फराहम करने के वादे से भी चुनाव जीते जाते हैं.

Aadhaar-CARD

‘आधार’ योजना यों तो भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण( यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया- यूआईडीएआई) के तहत चल रही थी लेकिन यूआईडीएआई को कोई संवैधानिक सहारा हासिल नहीं था. नतीजतन मोदी सरकार ने ऐसा प्रस्ताव पेश किया और संसद ने वित्तीय अनुदान तथा अन्य लाभ और सेवाओं को मुहैया कराने के सिलसिले में आधार (टारगेटेड डिलवरी ऑफ फायनेन्शियल एंड अदर सब्सिडिज, बेनिफिटस् एंड सर्विसेज) एक्ट पारित किया. आज आधार देश में सबसे विश्सनीय पहचान-संख्या का पर्याय बन चुका है. इसका इस्तेमाल टैक्स भरने से लेकर म्यूचुअल फंड जैसे फायनेंशियल प्रॉडक्ट खरीदने तक में हो रहा है.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली(पीडीएस), रोजगार गारंटी योजना, गरीबों को नकदी फराहम करने जैसे सामाजिक कल्याण की योजनाओं तथा बैंक खाते खोलने में इसका इस्तेमाल हो रहा है. हालांकि आधार के ऐसे उपयोग को कई अदालत में चुनौती दी गई है और यह कहते हुए आपत्ति उठायी गई है कि राज्यसत्ता नागरिकों के अंगुलियों की छाप तथा आंख की पुतलियों के निशान जैसी अत्यंत निजी निशानियां एकत्र कर रही है.

एक ना एक रास्ते ऐसी आपत्तियों का समाधान निकल ही जायेगा लेकिन ध्यान रखने की बात ये है सॉफ्ट पावर एक्सपोर्ट के लिहाज से आधार में बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं.

इन्‍सॉलवेंसी एंड बैंकरप्‍सी कोड

बीते 18 मई 2018 को टाटा स्टील की साथी इकाई बमनीपाल स्टील ने 35200 करोड़ रुपये में भूषण स्टील का 72.65 फीसद मालिकाना खरीद लिया. भूषण स्टील बंद होने के कगार पर था. इस समाचार की अहमियत कर्नाटक चुनाव के हल्ले में दबकर रह गई लेकिन इन्‍सॉलवेंसी एंड बैंकरप्‍सी कोड के तहत यह दिवालियेपन की कगार पर पहुंची एक कंपनी को उबारने का पहला प्रयास है. यह एक नया कानून है जिसे मोदी सरकार अपने शासन के 24वें महीने में लेकर आयी, संसद ने इस कानून को मंजूरी दी.

कॉरपोरेट में जगत में अगर इन्सॉल्वेंसी (ऋण शोधन की अक्षमता) की समस्या पैदा होती है तो उसका समाधान जल्दी से हो सके- नये कानून का यही प्राथमिक लक्ष्य है. भूषण स्टील के अधिग्रहण के मामला संकेत करता है कि नया कानून क्रोनी कैपिटलिज्म को खत्म करने की दिशा मे बड़ा कदम साबित होगा.

विश्वबैंक के मुताबिक साल 2016 में ऋण शोधन की अक्षमता के मामले को निपटारे का वैश्विक औसत 2.5 साल था. इसके बरक्स जापान के लिए यह आंकड़ा 0.6 साल, सिंगापुर और कनाडा के लिए 0.8 साल, अमेरिका के लिए 1.5 साल और चीन के लिए 1.7 वर्ष है. भारत के लिए यह आंकड़ा 4.3 साल का है. नये कानून में कारोबारी जगत की इकाइयों, व्यक्तियों और साझेदारी की फर्मों के ऋण अशोधन तथा पुनर्योजन के नियमों को संशोधित किया गया है और उन्हें साफ-सुथरा बनाते हुए ज्यादा एकीकृत रूप दिया गया है.

मकसद ऋण अशोधन की समस्या का निश्चित समय सीमा के भीतर क्रमवार समाधान करना है ताकि ऐसे व्यक्तियों, फर्मों तथा इकाइयों की संपदा का मोल यथासंभव अधिकतम रहे, उद्यमशीलता (आंत्रेप्रेन्योरशिप) को बढ़ावा मिले, ऋण मुहैया कराया जा सके तथा मामले से जुड़े तमाम पक्षों के हितों में संतुलन में कायम हो. नया कानून संसद के 10 अधिनियमों के संशोधन के बाद बना है. इसके तहत इन्‍सॉलवेंसी एंड बैंकरप्‍सी बोर्ड का गठन किया गया है. बोर्ड को ऋण अशोधन की समस्या से संबंधित एजेंसियों, पेशेवर व्यक्तियों तथा सूचना फराहम करने वाले सहायता-केंद्रों की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है. बोर्ड को ही इस नये कानून को अमल में लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

एक पंक्ति में कहें तो अब इस नये कानून के सहारे व्यवसाय के नाकाम होने की सूरत में उससे निकलना आसान हो गया है.

बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन अधिनियम

मोदी सरकार ने अपने शासन के 31 वें महीने में जमीन-जायदाद से जुड़े कालेधन की समस्या के समाधान के लिए कदम उठाते हुए एक कानून को सख्त बनाया. यह कानून बेनामी संपत्ति के लेन-देन को रोकने से जुड़ा है. भारत में बेनामी संपत्ति की समस्या लंबे समय से चली आ रही है. इसमें कोई व्यक्ति अपने कालेधन(वह रकम जिसपर टैक्स अदा नहीं किया गया) से किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर संपदा खरीद लेता है और खुद ही उस संपदा पर नियंत्रण रखता है.

साल 1988 का बेनामी प्रापर्टी ट्रांजैक्शन एक्ट कमजोर था. इसमें अदालतों को कोई विशेष शक्ति नहीं दी गई थी. जब्त संपदा की सुपुर्दगी से संबंधित कोई विशेष प्रावधान नहीं थे. वाद से संबंधित अपील का कोई ढांचा भी नहीं बताया गया था. नया कानून यानि बेनामी लेन-देन (निषेध) संशोधन अधिनियम 1 नवंबर 2016 से लागू है. इसमें अधिकारियों को बेनामी संपदा के जब्ती के अधिकार दिए गए हैं. दोषी पाये जाने पर 1 साल से लेकर 7 साल तक की जेल का प्रावधान है. साथ ही जुर्माने की व्यवस्था दी गई है. जुर्माना संपदा के बाजार-मूल्य के 25 फीसद तक हो सकता है.

कानून के अमल में आने के छह माह के भीतर अधिकारियों ने बेनामी संपदा के लेन-देन के 400 मामले पकड़े. इसमें बैंकों में जमाराशि, जमीन का प्लॉट, फ्लैट तथा आभूषण आदि के मामले शामिल हैं.

नोटबंदी

demonetisation

प्रतीकात्मक तस्वीर

मोदी सरकार ने अपने शासन के 31वें महीने में एक फैसला लिया जो बहुत विवादास्पद साबित हुआ. इसका बहुत आलोचना हुई और फैसले को बाधक करार दिया गया. यह नोटबंदी(विमुद्रीकरण) का फैसला था. साल 2016 के 8 नवबंर को मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा कि आधी रात के बाद से 500 तथा 1000 रुपये के नोट वैधानिक रुप से चलन में नहीं रहेंगे.

सत्ता के शीर्ष पर होने वाले भ्रष्टाचार तथा देश में व्याप्त कालेधन की समस्या से नोटबंदी की फैसले को जोड़ते हुए मोदी ने इसे राष्ट्रविरोधी तथा समाज-विरोधी तत्वों के खिलाफ सियासी लड़ाई का अभियान बताया.

नोटबंदी का एक मकसद जाली नोटों तथा सीमा पार से आतंकवादियों को होने वाली फंडिंग पर अंकुश लगाना भी था. नोटबंदी के फैसले के बाद ऐसी बहुत सी खबरें आयीं जिनमें कहा गया कि लोगों और छोटे व्यापारियों को परेशानी हो रही है. यह भी कहा गया कि 98.96 फीसद नोट फिर से बैकिंग-व्यवस्था में लौट आये हैं. नोटबंदी के कारण लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी लेकिन वित्तमंत्री ने ऐसी खबरों को ‘किस्सागोई’ करार दिया.

नोटबंदी के कारण रियल इस्टेट के कारोबार को चोट पहुंची क्योंकि मांग घट गई थी, आपूर्ति का पूरा तंत्र प्रभावित हुआ और लोगों के मन में बाजार को लेकर अनिश्चितता बढ़ी. स्टॉक मार्केट के क्षेत्रवार संकेतक जैसे रियलटी, फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स तथा ऑटोमोबाइल में गिरावट के संकेत थे क्योंकि स्टॉक मार्केट नकदी की उपलब्धता को लेकर बहुत संवेदनशील होता है. अर्थजगत का अनौपचारिक क्षेत्र नकदी के दम पर चलता है और इसे भी चोट पहुंची. लोगों को बेशक परेशानियां हुईं लेकिन कालाधन आखिरकार बैंकिंग प्रणाली में लौटा और उसकी पहचान की जा सकी. कालेधन की पहचान की यह प्रक्रिया अब भी जारी है.

रियल इस्टेट के नियमन और विकास का अधिनियम (रेरा)

मोदी सरकार ने 31 वें महीने में एक और अहम फैसला लिया. रियल इस्टेट के नियमन और विकास से संबंधित अधिनियम लागू हुआ. रियल इस्टेट के क्षेत्र के लिहाज से भारत में नीति-निर्माण की हालत बड़ी विरोधाभासी और विडंबना भरी रही है.

एक तरफ यह दिखता है लोगों को आवास जैसी बुनियादी जरूरत की किल्लत झेलनी पड़ रही है और ऐसे विकसित इलाकों की कमी है जहां आवासीय परियोजनाएं खड़ी की जा सकें तो दूसरी तरफ यह भी नजर आता है कि बनावटी तरीके से जमीन और आवास की कीमतें बढ़ायी जा रही हैं. इस क्षेत्र में कालेधन से होने वाले लेन-देन का बोलबाला है और रियल इस्टेट का पूरा कारोबारी माहौल कारपोरेट, सरकारी अधिकारी तथा निजी व्यक्तियों के सांठगांठ से होने वाले भ्रष्टाचार से भरा पड़ा है. ऐसे में आम नागरिक उन्हीं ताकतों की दया पर निर्भर रह जाता है जो बाजार का मनमाने तरीके से दोहन करते हैं. दशकों से यह जरुरत महसूस की जा रही थी कि रियल इस्टेट जैसे जटिल कारोबारी क्षेत्र पर नजर रखने के लिए कोई ना कोई नियामक संस्था होनी चाहिए.

मसले से जुड़ा एक पेंच यह भी है कि जमीन और उससे जुड़ा विकास राज्यों के अधीन आता है जबकि उपभोक्ता किसी एक राज्य से बंधा हुआ नहीं है, वह प्रवास पर होता है और उसका एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना तथा रहना-बसना लगा रहता है. नये कानून में इसी समस्या के समाधान को ध्यान में रखते हुए एक रेग्युलेटर(विनियामक) की व्यवस्था की गई है ताकि इस संस्था के जरिए रियल इस्टेट के कारोबारी जगत पर निगरानी रखी जा सके और उपभोक्ता के हितों की रक्षा की जा सके.

इसके लिए विवादों के समाधान के तंत्र तथा अपीलीय ट्राइब्यूनल का भी इंतजाम किया गया है. दुर्भाग्य कहिए कि इस कानून को अमल में लाने का जिम्मा राज्यों सरकारों का है और हालांकि ज्यादातर राज्यों ने कानून पर अमल की अधिसूचना जारी कर दी है लेकिन उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा को लेकर कदम बढ़ाने में उनकी हिचक कायम है. अगर इस कानून के अमल के बारे में ठीक से नहीं सोचा जाता तो फिर रियल इस्टेट के नियमन और विकास का अधिनियम(रेरा) मोदी सरकार की सबसे बड़ी नाकामयाबी साबित हो सकता है.

वस्तु एवं सेवाकर(जीएसटी)

सार्वजनिक वित्त-व्यवस्था पर असर तथा कर-चोरी को रोकने के लिहाज से मोदी सरकार का सबसे बड़ा फैसला जीएसटी लागू करने का रहा है. यह आजाद भारत के इतिहास में अबतक का सबसे ज्यादा जटिल कानून भी है. मोदी सरकार ने अपने शासन के 39वें महीने में जीएसटी लागू करने का फैसला किया. इसके लिए सहायक तैयारी संविधान के 101 वें संशोधन को लागू करके की जा चुकी थी. इसके बाद संसद ने चार केंद्रीय कानूनों की कारअमली को मंजूरी दी. इसके अतिरिक्त सभी 29 राज्यों ने अपने विधानसभा में इस सिलसिले में सहायक साबित होने वाले कानूनों को मंजूरी दी. देश के सात संघशासित प्रदेशों के लिए अधिसूचना केंद्र सरकार की तरफ से जारी हुई.

Launch of GST

जीएसटी के जरिए केंद्र स्तर के आठ टैक्स तथा राज्य स्तर पर लागू होने वाले 9 तरह के टैक्स को समाप्त किया गया. बहरहाल, ऐसी व्यवस्था के दायरे से पेट्रोलियम उत्पाद तथा शराब को बाहर रखा गया है. दुनिया के 140 देशों में प्रचलित अप्रत्यक्ष करों की तर्ज पर मोदी सरकार ने भारत में सबसे बड़े नीतिगत सुधार का काम पूरा कर दिखाया है. जीएसटी की कहानी तकरीबन तीन दशक पहले 1985 में शुरु हुई थी. ढांचागत सुधार का काम पूरा कर लिया गया है. बाकी छिटपुट संशोधन और सुधार चलते रहेंगे.

जीएसटी के क्रियान्वयन को लेकर आलोचना भी हुई. तर्क दिया गया कि छोटे उद्यमियों को टैक्स विवरण भरने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन यह शुरुआत दौर की बात थी. इस परेशानी से बचा जा सकता था. नौकरशाही के कारण यह परेशानी पेश आयी और ऐसे नुक्तों पर समय रहते सोचा जाना चाहिए था.

(यह आलेख मूल रूप से ओआरएफ में प्रकाशित हुआ. फर्स्टपोस्ट हिन्दी ने यहां ओआरएफ की अनुमति से लेख को छापा है.)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
#MeToo पर Neha Dhupia

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi