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संघ के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी के शामिल होने के फैसले से असहज हैं कथित सेक्युलर और उदारवादी

मुखर्जी 7 जून को संघ के मुख्यालय नागपुर पहुंचेंगे और वो मुख्य अतिथि के तौर पर तृतीय वर्ग वर्ष के स्वंयसेवकों के विदाई समारोह में हिस्सा शामिल होंगे

Updated On: May 30, 2018 11:30 AM IST

Sanjay Singh

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संघ के कार्यक्रम में प्रणब मुखर्जी के शामिल होने के फैसले से असहज हैं कथित सेक्युलर और उदारवादी

आपको सुनकर मजेदार लगेगा कि जो लोग दिन रात सहिष्णुता का ज्ञान बांटते रहते थे आज खुद एक मुद्दे पर इतने असिहष्णु हो गए हैं कि अपनी आलोचनाओं से देश के पूर्व राष्ट्रपति तक को नहीं बख्श रहे. दरअसल देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनने के आमंत्रण को स्वीकार किया है. मुखर्जी ने जब से आरएसएस के आतिथ्य को स्वीकर किया है तब से ही एक वर्ग प्रणब मुखर्जी को घेरने में जुटा है. दरअसल प्रणब मुखर्जी ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के निमंत्रण पर आरएसएस के तृतीय वर्ग वर्ष के स्वंयसेवकों के विदाई समारोह में शामिल होने पर अपनी सहमति जताई है.

मुखर्जी 7 जून को संघ के मुख्यालय नागपुर पहुंचेंगे और वो मुख्य अतिथि के तौर पर तृतीय वर्ग वर्ष के स्वंयसेवकों के विदाई समारोह में हिस्सा शामिल होंगे. मुखर्जी इस कार्यक्रम में लगभग 600 नए स्वंयसेवकों को संबोधित भी करेंगे.

अपने संबोधन में क्या विचार रखेंगे पूर्व राष्ट्रपति?

पूर्व राष्ट्रपति कार्यक्रम में राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखेंगे लेकिन कोई भी निश्चित तौर से ये नहीं जानता कि मुखर्जी आखिर बोलेंगे क्या? क्या मुखर्जी के शब्द वहां उनको सुनने के लिए मौजूद रहनेवाले स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणास्रोत बनेंगे या राष्ट्रवाद को लेकर उनके विचार आरएसएस के राष्ट्रवाद के विचारों से मेल खाएंगे? इसको लेकर अभी कुछ स्पष्ट नहीं किया जा सकता है और न ही इसके बारे में अभी कोई अनुमान लगाने की स्थिति में है. लेकिन माना जा रहा है कि सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक रहने का अनुभव प्राप्त कर चुके प्रणब दा इस मौके पर आरएसएस के विचारों से मिलते-जुलते विचार रख सकते हैं या फिर कुछ मुद्दों पर सावधानी बरतते हुए आलोचनात्मक विचार भी प्रस्तुत कर सकते हैं.

प्रणब मुखर्जी का विरोध कर रहे लोगों की समस्या ये नहीं है कि वो नागपुर के आरएसएस के कार्यक्रम में क्या बोलेंगे अथवा क्या नहीं बोलेंगे या फिर उनकी बात सुनने बैठे लोग उनके भाषण पर किस तरह की प्रतिक्रिया देंगे बल्कि उनकी समस्या ये है कि एक कट्टर कांग्रेसी रह चुके व्यक्ति ने आरएसएस के कार्यक्रम में जाने का फैसला क्यों किया? कथित सेक्युलर और उदारवादियों को लग रहा है कि कोई व्यक्ति जो कि देश के राष्ट्रपति जैसे गरिमामय पद रह चुका हो और इसके साथ ही जिसने अपना पूरा जीवन कांग्रेस पार्टी को समर्पित कर दिया हो वो आरएसएस के मुख्यालय में एक कार्यक्रम में शरीक होने क्यों जा रहा है?

क्यों गुजर रहा है नागवार?

ऐसे समय में जब मोदी विरोधी और बीजेपी-आरएसएस विरोधी शक्तियों को एक मंच पर लाने कि कवायद चल रही है और मोदी विरोध के नाम पर सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन खड़ा करने की वकालत की जा रही हो ऐसे में किसी बुजुर्ग कट्टर कांग्रेसी का आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होना इन कथित सेक्युलरों को नागवार गुजर रहा है. इतना ही नहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ऊपर आरएसएस को महात्मा गांधी का हत्यारा कहे जाने के मामले में उन पर मानहानि का मुकदमा अभी लंबित चल रहा है इसके बावजूद अपना जीवन कांग्रेस को समर्पित करने वाले प्रणब मुखर्जी के आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होने का निर्णय इन्हें पच नहीं रहा है.

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प्रणब के संघ मुख्यालय जाने के बाद एंटी मोदी, एंटी बीजेपी-आरएसएस की उस कहानी की हवा निकल जाएगी जिसको बनाने के लिए वो वर्षों से मेहनत कर रहे हैं. इन्हें लगता है कि पूर्व राष्ट्रपति के आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल होने और वहां आरएसएस के स्वंयसेवकों को संबोधित करने से से इस संस्था की मान्यता में और इजाफा हो जाएगा.

जेपी के उस बयान की याद आती है

ये वही लोग हैं जिन्होंने लोकनायक जयप्रकाश को 1977 में जनसंघ को जनता पार्टी सरकार में शामिल होने के निमंत्रण देने के लिए कभी माफ नहीं किया. जनसंघ जो कि बाद में बीजेपी बना, इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए बनाए गए एकजुट विपक्षी गठबंधन में शामिल हुआ था. इन्होंने जेपी की इस बात की आलोचना की कि उन्होंने जनसंघ और आरएसएस को न केवल वैधता प्रदान की बल्कि उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होने का मौका भी दे दिया. उनका मानना है कि जेपी ने संघ को अगर जनता पार्टी में शामिल नहीं किया होता और राष्ट्रीय राजनीति के माध्यम से उन्हें मुख्यधारा में आने का मौका नहीं दिया होता को शायद इतिहास कुछ और ही होता.

ये भी इतिहास का एक हिस्सा है जिसमें जेपी, इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गए इमरजेंसी से कुछ समय पहले अटल बिहारी वाजपेयी और एल के आडवाणी के निमंत्रण पर संघ के सत्र में शामिल हुए थे. उसी सत्र में जेपी ने प्रसिद्ध टिप्पणी की थी, 'मैं इस सत्र में शामिल होकर देश को ये बताने आया हूं कि जनसंघ न तो फासीवादी है और न ही प्रतिक्रियावादी. मैं इस बात की घोषणा खुद जनसंघ के मंच से कर रहा हूं. ऐसे में अगर जनसंघ फासीवादी है तो जयप्रकाश नारायण भी फासीवादी है.' जेपी ने उस समय ये भी कहा था कि 'फासीवाद का उदय कहीं और हो रहा है.'

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जेपी भी प्रणब मुखर्जी की तरह ही एक कांग्रेसी थे. लेकिन जेपी और प्रणब के बीच किसी तरह की तुलना करना अनुचित होगा, सिवाय इस बात के कि जेपी ने भी उम्र के अपने आखिरी पड़ाव पर 1970 के दशक में आरएसएस को क्लीन चिट देते हुए कहा था कि उन्हें नहीं लगता कि आरएसएस गलत है और अब प्रणब मुखर्जी को भी नहीं लगता है कि आरएसएस के साथ संवाद करना या विचारों का आदान प्रदान करना किसी तरह का पाप है.

कट्टर कांग्रेसी रहे हैं मुखर्जी, आरएसएस आलोचना भी की है लेकिन...

प्रणब मुख्रजी ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर योगदान किया है इसके अलावा उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ पदों पर भी अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है. ऐसे में मुखर्जी आरएसएस से अपरिचित नहीं हैं और उन्होंने आरएसएस को देखा है और भली भांति पहचानते हैं. मुखर्जी ने कई मौकों पर आरएसएस की सार्वजनिक रूप से कड़ी आलोचना भी की है लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने ऐसा तब तक किया जब तक वो कांग्रेस पार्टी में थे और उन्होंने वही बोला था जो कि पार्टी लाइन के मुताबिक उन्हें बोलना था.

जब प्रणब मुखर्जी ने देश के राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली तो कहीं से भी ये महसूस नहीं हुआ कि वो राष्ट्रपति भवन में भी आरएसएस के प्रति कांग्रेसी विचारों को लेकर बैठे हुए हैं. ऐसा इसलिए भी हो सकता है कि उनके कार्यकाल के अधिकतम समय में सबसे योग्य स्वंयसेवक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री थे. हालांकि नरेंद्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी की तरह कभी ये नहीं कहा कि वो खुद स्वंयसेवक रहे हैं लेकिन उनके विचारों से स्पष्ट रहा है कि वो किसी भी तरह से स्वंयसेवक से कम नहीं रहे हैं.

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प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति थे तो उन्होंने मोहन भागवत से राष्ट्रपति भवन में मोहन भागवत से एक बार से ज्यादा बार मुलाकात की थी. अपना पद छोड़ने से कुछ ही दिनों उन्होंने मोहन भागवत को निजी तौर पर लंच के लिए आमंत्रित किया था. तत्कालीन राष्ट्रपति के द्वारा लंच के लिए आरएसएस प्रमुख को आमंत्रण देना इस बात की भी ओर इशारा कर रहा था कि आरएसएस के प्रति विचार किस तरह से बदल रहे हैं और अब आरएसएस का महत्व कितना बढ़ गया है.

आरएसएस जिसकी छवि एक गोपनीय संस्था जैसी बनी हुई थी अब वो खुलकर सामने आ रही है और उन लोगों के साथ भी विचारों का आदानप्रदान करने में नहीं झिझक रही जो कि संघ के विचारों से सहमत नहीं रहे हैं. इसे एक उदाहरण से अच्छे से समझा जा सकता है.

पिछले साल सितंबर में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 50 उच्च पदों पर विराजमान विदेशी राजनयिकों के साथ मुलाकात की जिसमें पश्चिमी और इस्लामिक देशों के डिप्लोमैट्स भी शामिल थे. भागवत ने उनसे कहा कि वो आरएसएस के बारे में उनसे जो कुछ भी वो जानना चाहें वो पूछें. दरअसल उस संवाद की जानकारी दुनिया को उन दो महानुभावों ने ट्वीट्स की श्रृंखला के माध्यम से दी थी जो कि इस कार्यक्रम में आरएसएस के तरफ से शामिल थे.

वैसे 7 जून को नागपुर के संघ के मुख्यालय में प्रणब मुखर्जी के भाषण पर सबकी निगाहें रहेंगी और उनके भाषण की समीक्षा उनके आलोचकों और समर्थकों के अलवा राजनीतिक धुरंधर भी करेंगे.

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