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विदेश सचिव के कार्यकाल को बढ़ाने का फैसला बिल्कुल चौंकाने वाला नहीं

सबको पता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश सचिव जयशंकर पर पूरा भरोसा करते हैं.

Updated On: Jan 30, 2017 02:44 PM IST

Seema Guha

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विदेश सचिव के कार्यकाल को बढ़ाने का फैसला बिल्कुल चौंकाने वाला नहीं

विदेश सचिव एस. जयशंकर के कार्यकाल को एक साल बढ़ाने का मोदी सरकार का फैसला बिल्कुल भी चौंकाने वाली नहीं है. हम सबको पता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश सचिव जयशंकर पर पूरा भरोसा करते हैं.

मगर यहां ये याद रखने वाली बात है कि एस. जयशंकर को विदेश सचिव तब बनाया गया था, जब वो अमेरिका में भारत के राजदूत के तौर पर अपना कार्यकाल पहले ही पूरा कर चुके थे. 2010 में ही सचिव स्तर के अफसरों का कार्यकाल दो साल के लिए फिक्स किया गया था. इसकी शुरुआत निरुपमा राव से हुई थी.

जयशंकर का विदेश सचिव के तौर पर कार्यकाल पहले ही सेवा विस्तार या एक्सटेंशन पर चल रहा था. अब जबकि उनका कार्यकाल एक साल और बढ़ा दिया गया है, तो भारतीय विदेश सेवा के कम से काम आठ अफसर ऐसे हैं जिनके हाथ से मौका निकल गया. जाहिर है वो निराश होंगे.

मनमोहन सिंह की भी पसंद थे एस.जयशंकर

प्रधानमंत्री के पास इस बात का विशेषाधिकार होता है कि वो जिस अफसर पर भरोसा करते हैं उसे नियुक्त करें. हालांकि, मनमोहन सिंह जैसे नेता आम तौर पर नियमों को तरजीह देते रहे हैं. खुद मनमोहन सिंह भी एस. जयशंकर को विदेश सचिव बनाना चाहते थे. लेकिन वो ऐसा नहीं कर सके. तब विदेश मंत्रालय की सबसे सीनियर अफसर सुजाता सिंह को विदेश सचिव बनाया गया था.

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद सुजाता सिंह का कार्यकाल घटाकर उनकी जगह जयशंकर को विदेश सचिव बनाया था. अब विदेश सचिव का कार्यकाल एक साल बढ़ाकर सरकार ने विदेश मंत्रालय में निरंतरता को बनाए रखने का संकेत दिया है.

हालांकि, अफसरों की टीम के अगुवा के तौर पर विदेश सचिव का रोल काफी अहम है. मगर विदेश नीति हमेशा से ही प्रधानमंत्री के निर्देश पर चलती रही है. फिर चाहे वो भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव या फिर अटल बिहारी वाजपेयी हों.

अपने पाकिस्तानी समकक्ष एजाज़ अहमद के साथ विदेश सचिव. (फोटो: रॉयटर्स)

अपने पाकिस्तानी समकक्ष एजाज़ अहमद के साथ विदेश सचिव. (फोटो: रॉयटर्स)

पीएमओ ही तय करता है विदेश मंत्रालय की नीतियां

विदेश नीति हमेशा ही प्रधानमंत्री कार्यालय से तय होती रही है. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों का अहम रोल रहा है. ब्रजेश मिश्रा और शिवशंकर मेनन से लेकर मौजूदा एनएसए अजित डोवाल तक सभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों ने विदेश नीति तय करने में अहम रोल निभाया है.

विदेश मंत्रालय वक्त-वक्त पर अपनी राय देता है और फिर तय नीतियों को अमल में लाने का काम करता है. एस. जयशंकर के मामले में सबसे बड़ी बात ये है कि उनकी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजित डोवाल की राय तमाम मुद्दों पर एक जैसी है और दोनों अच्छे तालमेल के साथ काम कर रहे हैं.

अमेरिकी-चीनी रिश्तों में बड़ी मदद साबित हो सकते हैं एस.जयशंकर

एस. जयशंकर 1977 बैच के आईएफएस अधिकारी हैं. वो अमेरिका और चीन दोनों देशों में भारत के राजदूत रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति में चीन और अमेरिका से रिश्ते बेहतर करने को सबसे ज्यादा अहमियत दी जा रही है. दोनों को अहमियत देने के पीछे मोदी सरकार की अपनी वजहें हैं.

अमेरिका से रिश्ते सुधारने और करीब आने की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान शुरू हुई थी. मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के बीच एटमी डील से इस काम में सबसे ज्यादा तेजी आई. न्यूक्लियर डील से भारत-अमेरिका के रिश्ते नए दौर और नई ऊंचाई तक पहुंचे. हालांकि, एटमी डील के बावजूद मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका के साथ रिश्तों में ज्यादा मजबूती नहीं आ सकी क्योंकि मनमोहन सरकार घरेलू मसलों में ही उलझकर रह गई थी.

सितंबर, 2016 में आसियान में पीएम मोदी के साथ बराक ओबामा. (फोटो. रॉयटर्स)

सितंबर, 2016 में आसियान में पीएम मोदी के साथ बराक ओबामा. (फोटो. रॉयटर्स)

प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में सत्ता में आने के साथ ही अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने को अपनी विदेश नीति का सबसे बड़ा लक्ष्य बनाया हुआ है. पिछले साल दोनों देशों के बीच मिलिट्री लॉजिस्टिक का समझौता इसी बात का संकेत है. मनमोहन सिंह सरकार ये समझौता करने में हिचकिचा रही थी, जबकि इस समझौते की बुनियाद मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में ही रख दी गई थी.

पहले अमेरिका के साथ एटमी डील की बातचीत और फिर अमेरिका में भारत के राजदूत के तौर पर अपने कार्यकाल के चलते विदेश सचिव एस. जयशंकर अमेरिकी सिस्टम को अच्छे से समझते हैं. हाल ही में अमेरिका दौरे पर वो डोनाल्ड ट्रंप की ट्रांजिशन टीम के संपर्क में भी रहे थे. राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने जिन विदेशी नेताओं से बात की, उनमें पीएम मोदी पांचवे नंबर पर थे. इसी से साफ है कि ट्रंप सरकार भारत के साथ रिश्तों को काफी अहमियत देती है. इस बातचीत के दौरान पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को भारत आने का न्यौता भी दिया.

अमेरिकी-चीनी राजनीति की समझ अहम है

2015 में बराक ओबामा भारत की गणतंत्र दिवस की परेड में मुख्य अतिथि बनकर आने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे. इसे भारत की बड़ी कामयाबी माना गया था. इसमें विदेश सचिव जयशंकर का बड़ा रोल बताया जाता है. अमेरिका में राजदूत रहते हुए विदेश सचिव जयशंकर को पता था कि ओबामा सरकार में अहम लोग कौन हैं. उनके जरिए ओबामा को गणतंत्र दिवस पर भारत आने के लिए राजी किया जा सका. हालांकि ट्रंप की टीम में अरबपति हैं और सेना के पूर्व जनरल हैं, जिनके बारे में लोगों को कम ही जानकारी है. फिर भी विदेश सचिव जयशंकर को पता है कि अमेरिकी सरकार कैसे काम करती है. इसलिए मोदी सरकार को ट्रंप प्रशासन से तालमेल बिठाने के लिए उनकी जरूरत होगी. उम्मीद है कि इस काम में कोई दिक्कत नहीं आएगी.

दूसरी तरफ चीन के साथ रिश्ते, भारत के लिए मौका भी हैं और चुनौती भी. ऐसे में एस. जयशंकर का विदेश सचिव होना सरकार के काफी काम आ सकता है क्योंकि जयशंकर राजदूत के तौर पर चीन में अच्छा वक्त बिता चुके हैं. उन्हें चीन की सरकार के काम-काज की अच्छी समझ है.

अक्टूबर, 2016 में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी जिनपिंग. (फोटो. रॉयटर्स)

अक्टूबर, 2016 में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और शी जिनपिंग. (फोटो. रॉयटर्स)

मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी कई बार चीन गए थे. उस वक्त जयशंकर वहां भारत के राजदूत थे वो उसी दौरान अपनी ड्यूटी निभाते हुए मोदी के संपर्क में आए. पीएम मोदी चीन में जयशंकर के काम से काफी प्रभावित हुए थे.

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के साथ ही चीन के साथ संबंध सुधारने के लिए तेजी से काम करना शुरू किया था. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 2014 में भारत आए थे. दोनों नेताओं ने दिल्ली में वक्त गुजारने के बजाय गुजरात का दौरा किया था. बाद में दोनों नेता दिल्ली आए. दोनों नेताओं के बीच तालमेल देखकर लगा कि चीन से हमारे रिश्ते नई राह पर चल पड़े हैं. पीएम मोदी भी जब चीन दौरे पर गए तो राष्ट्रपति शी जिनपिंग के राज्य का दौरा किया.

लेकिन उसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते खराब ही होते जा रहे हैं. चीन ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत की एंट्री में अड़ंगा लगा रखा है. साथ ही वो जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को भी लगातार वीटो कर रहा है. इसके अलावा चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर में भी चीन ने 46 अरब डॉलर का निवेश किया है. ये गलियारा पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है, जिस पर भारत का दावा है.

अमेरिका के नजदीक जाने की भारत की कोशिश के पीछे एक बड़ी वजह चीन का ये रवैया भी है. ताकि अमेरिकी सहयोग से चीन को संकेत दिया जा सके कि उसकी किसी गलत हरकत से निपटने के लिए भारत ने भी पूरी तैयारी कर रखी है.

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