S M L

झारखंडः नेतागिरी के चक्कर में आदिवासी मेला में चुंबन प्रतियोगिता

वोट बैंक के चक्कर में इस मेले का आयोजन झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैनर तले इलाके के लिट्टीपाड़ा के विधायक साइमन मरांडी ने किया था

Updated On: Dec 11, 2017 04:16 PM IST

Brajesh Roy

0
झारखंडः नेतागिरी के चक्कर में आदिवासी मेला में चुंबन प्रतियोगिता

आदिवासी अपनी सरलता, निश्छलता और समृद्ध संस्कृति के लिए जाने जाते हैं. देश के किसी भी कोने में आदिवासी समुदाय के बीच आप चले जाएं आप इनकी जीवन शैली और इनके आदर सत्कार के कायल हो जाएंगे. झारखंड के आदिवासियों की भी यही पहचान रही है.

लेकिन जब इनकी अस्मिता से खिलवाड़ होता है तो न केवल आदिवासी समाज के लिए वो चिंता का विषय होता है बल्कि आप और हमें भी उसकी पीड़ा महसूस होती है. ऐसा ही कुछ हुआ है झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र में.

नेताओं ने अपनी नेतागिरी की फांस में यहां के भोले भाले आदिवासियों की संस्कृति से खिलवाड़ किया. आदिवासी हितों की सबसे बड़ी पार्टी का दावा करने वाली झारखंड मुक्ति मोर्चा के बड़े नेताओं और विधायकों की मौजूदगी में एक रात्रि आदिवासी मेला के दौरान विवाहित जोड़ों के बीच पहली बार ‘चुंबन प्रतियोगिता’ का आयोजन किया गया. ये आयोजन झारखंड संथाल परगना के लिट्टीपाड़ा क्षेत्र के डुमरिया में शनिवार की रात आयोजित हुआ.

आदिवासी मेला के नाम पर फूहड़ प्रदर्शन 

पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति की चमक दमक में फंसे नेताओं ने आदिम जनजाति पहाड़िया समाज के विवाहित स्त्री-पुरुषों के बीच ‘चुंबन प्रतियोगिता’ का आयोजन करवाया. इस प्रतियोगिता में दो दर्जन से ज्यादा विवाहित जोड़ों ने भाग लिया.

हालांकि इस रात्रि मेला में आदिवासी और पहाड़िया नृत्य के साथ लंगड़े नाच का भी आयोजन हुआ था लेकिन दर्शकों के आकर्षण का केंद्र चुंबन प्रतियोगिता ही रहा. आयोजकों ने इसके लिए खूब प्रचार प्रसार भी किया था.

परिणाम दिखा खूब भीड़ जमी और सैंकड़ों आदिवासी ग्रामीण इसके गवाह भी बने. नेताओं की मौजूदगी में पीड़ा देने वाली बात ये भी है कि ये आयोजन संथाल परगना के दो वीर स्वतंत्रा सेनानी सगे भाई वीर ‘सिदो कान्हु’ के नाम पर आयोजित आदिवासी मेला में हुआ.

ये भी पढ़ेंः झारखंड की सड़कों पर दिन में भी हेडलाइट ऑन कर चलानी होगी गाड़ी

आश्चर्य की बात ये भी है कि इस मेले का आयोजन झारखंड मुक्ति मोर्चा के बैनर तले इस क्षेत्र के लिट्टीपाड़ा के विधायक साइमन मरांडी ने किया. मौके पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के पूर्व विधायक पार्टी के बड़े नेता प्रो. स्टीफन मरांडी, पार्टी के जिला अध्यक्ष श्याम यादव सहित कई नेता शामिल थे.

महिलाएं हुई शर्मसार, समाज ने कहा ठीक नहीं हुआ 

आदिवासी मेला में हुई चुंबन प्रतियोगिता को लेकर महिलाएं बेहद शर्मसार हुई हैं. खास तौर पर इस प्रतियोगिता में शामिल महिलाओं ने कहा ‘नेताओं ने उन्हें बदनाम कर दिया. आदिवासी समाज में खुलापन है लेकिन ऐसी अश्लीलता नहीं है. हम लोगों को अपने पति के दवाब के कारण इस प्रतियोगिता में शामिल होना पड़ा.’

जाहिर सी बात है आज भी अपनी सभ्यता संस्कृति के तहत पुरुष प्रधान समाज में और खास तौर पर ग्रामीण परिवेश में महिलाओं की उतनी नहीं चलती. या कह लें कि वे अपने पति का विरोध खुलकर नहीं कर सकतीं. फिर पुरुष नशे में हों तो बिलकुल नहीं.

jharkhand 12

जानकारी के अनुसार इस रात्रि मेला और चुंबन प्रतियोगिता के लिए पुरुष प्रतिभागियों में से ज्यादातर लोगों ने शाम से ही अपना मूड बना लिया था. झारखंड महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष और जेएमएम की नेता महुआ माजी ने भी इस आयोजन को शर्मनाक बताया है.

बीजेपी को मिला मौका, किया सवाल 

जेेएमएम के वर्चस्व वाली संताल परगना क्षेत्र में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की बाट जोह रही बीजेपी के लिए तो ये बड़ा मुद्दा बन कर उभरा है. बीजेपी ने इस चुंबन प्रतियोगिता के लिए जेएमएम पर सीधा वार किया है.

ये भी पढ़ेंः गाय पर राजनीति के चक्कर में आदिवासी परंपराओं से खेल रहे नेता

राज्य की महिला बाल विकास कल्याण मंत्री डॉ लुईस मरांडी ने साफ तौर पर कहा कि 'जेएमएम संथाल परगना की समृद्ध संस्कृति से न केवल खिलवाड़ कर रही है बल्कि वोट बैंक के लिए निचले पायदान पर उतर गई है.’ उन्होंने ये भी कहा कि यदि कोई शिकायत मिली तो आयोजकों के खिलाफ कड़े कदम उठाए जाएंगे.

कौन हैं सिदो कान्हु 

भारत में ब्रिटिश हुकूमत के अधीन महाजनी प्रथा और सरकार की बंदोबस्ती नीति के खिलाफ 30 जून 1855 को पहला विद्रोह हुआ था, जिसे 'संथाल हुल' के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन 20 हजार संथाली लोग, अत्याचार और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए भोगनाडीह में जमा हुए थे.

sido kanhu

इस क्रांति के अग्रदूत थे चार भाई सिदो, कान्हु, चांद और भैरव मुर्मू. ये हुल ब्रिटिश इतिहासकार हंटर के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उग्र क्रांतियों में से एक था, जिसमें 20 हजार संथाली शहीद हुए थे.

शोषण इस हद तक था कि इन आदिवासियों को 50 प्रतिशत से 500 प्रतिशत तक खेती-कर देना पड़ता था. जब सिदो मुर्मू और कान्हु मुर्मू ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई तो हजारो-हजार लोगों के समूह ने इनका स्वागत किया, जिन्होंने भोगनाडीह गांव में जमा होकर खुद को स्वतंत्र घोषित किया और स्थानीय जमींदार, पूंजीपतियों, सूदखोरों के खिलाफ जंग छेड़ने की शपथ ली.

कहा जाता है कि सिदो मुर्मू को अंग्रेज पुलिस ने पकड़ लिया और कान्हु एक एनकाउंटर में मारा गया. झारखंड में हर साल जून महीने की 30 तारीख का दिन इसी क्रांति की याद में 'हुल दिवस' के रूप में मनाया जाता है.

बहरहाल जो हुआ अच्छा नहीं हुआ. आदिवासी समाज से लेकर गैर आदिवासी समाज ने भी इस आयोजन को जमकर कोसा है. चर्चाएं ये भी है कि नेता अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए किस हद तक गिर सकते हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi