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व्यंग्य: जा पर बिपदा बाढ़ की 'वो' ना जाने पीर

जैसे-जैसे बाढ़ का पानी बढ़ रहा है नेताजी की संवेदना भी बढ़ रही है

Updated On: Jul 23, 2017 03:12 PM IST

Shivaji Rai

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व्यंग्य: जा पर बिपदा बाढ़ की 'वो' ना जाने पीर

बारिश और बाढ़ से सूबे की तस्‍वीर ही नहीं बदली है. सियासत की रंगत भी बदल गई है. वर्षों तक दड़बे में घुसे रहने वाले नेताजी अचानक बाढ़ में घिरे लोगों के हमदर्द हो गए हैं. चप्‍पू चलाकर सुबह-शाम इलाके का दौरा कर रहे हैं. लोगों का दुख-दर्द जानने में लगे हैं.

समर्थक इसे नेताजी की संवेदनशीलता और विपक्षी इस सक्रियता को 'बाढ़ पर्यटन' की संज्ञा दे रहे हैं. संज्ञा-सर्वनाम से तटस्‍थ नेताजी नए उपमान के साथ निष्‍काम भाव से आगे बढ़ रहे हैं.

मौन साधे नेताजी 'ये आंसू मेरे दिन की जुबान है' की तर्ज पर अपने आंसुओं से ही विपक्ष के आरोपों को खारिज कर रहे हैं. नेताजी की आंखों से आंसू इस कदर टपक रहे हैं, जैसे गरीब की झुग्गी-झोपड़ी में बारिश का पानी. मिनटों में हाथ में रखा रूमाल तरबतर हो जा रहा है.

रोना बंद हो रहा है पर सुबकना थम नहीं रहा है. दर्द इतना है कि मुंह से बोल नहीं फूट रहे हैं. लीटर भर मिनरल वाटर पीने के बाद बोलने की हालत में आ रहे हैं. मुंह खोलते ही सरकार को बदहाली के लिए दुत्‍कार रहे हैं. मीडिया में सरकार के नकेरापन को धिक्‍कारते हुए बयान दे रहे हैं कि ‘लोगबाग बाढ़ से घिरे हैं और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है. बाढ़ पीड़ितों की सुध ना अफसर ले रहे हैं ना सरकार.’

नेताजी के मन में अचानक अंकुरित हुई संवेदना का सुपरिणाम भी मिल रहा है. एक तरफ पार्टी में वाहवाही मिल रही है, वहीं बिरादरी में भी हनक बढ़ रही है. उत्‍साह से लबरेज नेताजी दौरों का क्रम लगातार बढ़ा रहे हैं. वो तो मीडिया के कुछ करमजले पत्रकार हैं जो पिछली गुमशुदगी को लेकर सवाल पूछ रहे हैं.

हद तो यह कि कल एक पत्रकार ने लाइव रिपोर्टिंग में आंदोलन, धरना-प्रदर्शन की सलाह दे डाली. फिर मजबूरी में नेताजी कैमरे पर ही 'हाय-हाय' कर सीना कूटने लगे. नेताजी के पुक्‍का फाड़कर रोना देख जनता घंटों सन्‍न रही.

जनता समझ नहीं पा रही थी कि नेताजी को रोने का दौरा पड़ा है या घड़ियाली रोग लग गया है. वो तो किंकर्तव्‍यविमूढ़ गांववालों पर दशा पर दया दिखाते हुए लीलाधर ने समझाया कि नेताजी की बदली रंगत से घबराने की जरूरत नहीं. 'सिर्फ खरबूजा ही खरबूजे को देखकर रंग नहीं बदलता. नेता भी बदले आबोहवा में रंग बदलता है. नेता और खरबूजे का डीएनए एक होता है. लिहाजा दोनों ही अपनी आबादी देख रंगत बदलते हैं.

गुरु कहते हैं कि सियासी व्‍यक्ति के दिल में बाढ़ और सूखे के दौरान भाषण का हौल उठना स्‍वाभाविक है. गरीब, किसानों की दुर्दशा पर रोना-धोना भी सहज है. यही शुभ लक्षण ही बाद में नेता को मसीहा बनाते हैं. संसद-विधायक और मंत्री की कुर्सी दिलाते हैं.

नेताजी की कसरत और लीलाधर के ज्ञान को सुनकर अवधू गुरू की आंखें चौधियां गई हैं. अवधू गुरु धीरे-धीरे समझने लगे हैं कि बाढ़ के आने पर सरकारी अफसरों और कर्मचारियों की बीवियां क्‍यों खुश हो जाती हैं. क्‍यों मन्‍नत मानती हैं कि हे प्रभु अबकी ऐसी बाढ़ लाओ कि सब कुछ 'गीला-गीला' हो जाए. नदी-नालों का जलस्‍तर इतना बढ़ाओ कि अपना जीवनस्‍तर उठ जाए.

अवधू गुरु अब समझने लगे हैं कि पिछली बाढ़ के बाद डीएम साहब का परिवार कैसे 'फॉरेन टूर' पर गया था. कैसे एसडीएम साहब के घर राहत फंड से होम थियेटर और एलसीडी पहुंच गया था. लेखपाल के घर में राहत फंड से कैसे कई 'राहत कार्य' हो गए. गुरू को अब सतसई का 'जा पर बिपदा बाढ़ की जाने कैसी पीर' का दोहा भी नेताओं और सरकारी मुलाजिमों के कारगुजारियों के सामने झूठा लगने लगा है.

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