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पहली बार कार्टून पर पूरी हुई पीएचडी, अब छपेगी किताब

टीवी पत्रकार डॉ प्रवीण तिवारी की ये किताब कार्टूनिस्ट लक्ष्मण और तैलंग को होगी श्रद्धांजलि

FP Staff Updated On: Jun 13, 2017 06:18 PM IST

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पहली बार कार्टून पर पूरी हुई पीएचडी, अब छपेगी किताब

हम सभी जानते हैं कि कार्टून्स का अखबारों, वेबसाइट्स और पत्रकारिता जगत में बड़ा महत्व है लेकिन इसके बावजूद भारतीय कार्टून धीरे-धीरे अपनी चमक खोते जा रहे हैं. एक वक्त था जब इस देश में आर. के. लक्ष्मण, सुधीर तैलंग, अबु, मारियो, रंगा जैसे कई कार्टूनिस्टों ने पूरी दुनिया में नाम कमाया.

आज के दौर में भी कई अच्छे कार्टूनिस्ट मौजूद हैं लेकिन पत्रकारिता के इस मजबूत हथियार के और बेहतर इस्तेमाल की गुंजाइश अब भी बरकरार है.

ये तमाम बातें सामने आई थीं डॉ. प्रवीण तिवारी द्वारा किए गए पीएचडी शोध के दौरान. उनका ये शोध अब पुस्तक के रूप में पाठकों के सामने आ रहा है. इस पुस्तक में देश के लगभग सभी जाने माने पत्रकारों से बातचीत की गई है.

इस किताब से छात्रों को कार्टून्स की बेहतर समझ मिल पाएगी

डॉ. तिवारी के मुताबिक पाठक तो कार्टून्स को बहुत पसंद करते हैं और इनका जबरदस्त असर भी होता है लेकिन लक्ष्मण और तैलंग के स्तर की कार्टूनिंग अब नहीं हो पा रही है. इसकी बड़ी वजह कार्टून की संपादकीय समझ की कमी है. इस पुस्तक के जरिए पत्रकारिता के छात्रों को कार्टून्स के बारे में बेहतर समझ मिल पाएगी.

डॉ. प्रवीण तिवारी खुद आर. के. लक्ष्मण और सुधीर तैलंग के सान्निध्य में एक कार्टून वर्कशॉप कर चुके हैं. इसी वर्कशॉप के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि कार्टून से जुड़ा कोई भी साहित्य मौजूद नहीं है.

इसके बाद उनके गाइड और वर्तमान में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मानसिंह परमार ने उन्हें इस शोध को पीएचडी के तौर पर रखने के लिए प्रेरित किया. इस किताब में लक्ष्मण, तैलंग, उन्नी, लहरी, शेखर गुरेरा, सतीश आचार्य जैसे कई नामी भारतीय कार्टूनिस्टों के इंटरव्यूज हैं.

sudhir tailang cartoons

सुधीर तैलंग के अनुसार कार्टूनिस्ट का काम

तैलंग ने इस पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है. उनके मुताबिक कार्टुनिस्ट का काम 70-80 के दशक में आने वाली फिल्मों के हीरो की तरह है. फिल्म की शुरुआत से अंत के कुछ पहले तक विलेन हीरो के परिवार पर तमाम अत्याचार करता है.

अंत में जब हीरो विलेन की पिटाई करता है तो दर्शक भी एक गुस्से का अनुभव करता है और विलेन को पिटते देख उसे भी सुकून मिलता है. सिस्टम को लेकर आम आदमी का भी एक गुस्सा होता है और अच्छे कार्टून को देखकर सिस्टम पर की गई चोट का सुकून पाठक को भी ठीक उसी तरह मिलता है.

आर के लक्ष्मण के कार्टून्स की दुनिया

आर. के. लक्ष्मण के साथ भी डॉ. प्रवीण तिवारी ने खास बातचीत इस शोध के दौरान की थी. लक्ष्मण के मुताबिक जीवन में मूल रूप से हास्य होता है. सिर्फ उसे देखने वाली नजर की जरूरत है. इसी तरह कार्टूनिस्ट यदि उस नजर को रेखाओं के जरिए उकेर दे तो एक कामयाब कार्टून आपके सामने होता है.

लक्ष्मण ने इस बातचीत में बताया कि वो हास्य को पैदा करने की कोशिश नहीं करते हैं बस जस के तस असली स्थिति को रख देने से भी हास्य पैदा किया जा सकता है.

लक्ष्मण को राजनेताओं पर कार्टून बनाना पसंद नहीं था यही वजह है कि उनके ज्यादातर कार्टून सांकेतिक होते थे. कॉमन मैन को ज्यादा अहमियत देने की वजह भी यही थी. वो भी मानते थे कि कार्टून आम लोगों की नजर को सामने रखने वाला होना चाहिए.

डॉ. तिवारी ने कहा कि लक्ष्मण के कार्टून हास-परिहास से भरपूर थे लेकिन वो खुद एक बेहद गंभीर और अनुशासित इंसान थे. वर्तमान दौर के कार्टूनिस्टों से वे काफी निराश थे और इसीलिए उन्हें खुद ही ये कहने में हिचक नहीं थी कि देश के सबसे बेहतर कार्टुनिस्ट वे खुद ही हैं. इस तरह के शोध और कार्टून को लेकर लोगों में गहरी समझ पैदा करने की जरूरत पर वो भी जोर देते रहे.

अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में आज भी कार्टून को विशेष महत्व दिया जाता है. डिजिटल मीडिया के दौर में कार्टून की अहमियत और बढ़ जाती है. बशर्ते कार्टून उस स्तर के हो जो आम लोगों की पीड़ा को समझते हों और हंसी-हंसी में सिस्टम पर गहरी चोट कर सकते हों.

political cartoons

आज के दौर के राजनीतिक कार्टून्स

सुधीर तैलंग ने इस शोध के दौरान ये गंभीर बात भी रखी कि कार्टुनिस्ट को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं क्योंकि उसके पास व्यंग्य की ताकत होती है. जो बात संपादकीय में नहीं लिखी जा सकती या फिर जिसे कोई अन्य पत्रकार नहीं कह सकता वो कार्टुनिस्ट आसानी से कह जाता है. वो कई बार देश के बड़े बड़े राजनेताओं पर कठोर टिप्पणी भी कर सकता है. यही वजह है कि कार्टूनिंग पत्रकारिता का सबसे अहम हिस्सा माना जाना चाहिए.

इस किताब में शंकर, रंगा, अबु, मारियो जैसे गुजरे जमाने के कई जाने माने कार्टूनिस्टों के जीवन पर भी विस्तार से जानकारियां दी गई हैं.

कार्टूनिंग के अलग-अलग प्रकारों पर विस्तार से जानकारियों के साथ पाठकों पर किए गए सर्वे को भी इस किताब में शामिल किया गया है. इस सर्वे के जरिए ये समझाने की कोशिश की गई है कि पाठक कार्टून्स को कितना पसंद करते हैं और अखबारों, पत्रिकाओं पर वेबसाइट्स पर इन्हें कितनी जगह दिए जाने के हिमायती है.

ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि कार्टून ही वो सबसे पहली सामग्री होता है जिस पर नजर पड़ती है लेकिन दुर्भाग्य से अब पहले पन्ने पर वो कार्टून कोना दिखाई ही नहीं पड़ता. सोशल साइट्स पर भी कार्टून्स जमकर शेयर किए जाते हैं लेकिन उनका वो स्तर नहीं दिखाई पड़ता जो कार्टूनिंग के सुनहरे दौर में दिखाई पड़ता था.

डॉ. तिवारी का मानना है कि इस किताब के जरिए कार्टून के इस महत्व को समझा जा सकेगा. यदि मीडिया इंस्टीट्यूट्स इस विषय को भी गंभीरता से लेना शुरू करेंगे तो देश में एक बार फिर लक्ष्मण और तैलंग जैसे कई कार्टूनिस्ट देखने को मिलेंगे. ये किताब देश के इन दोनों महान कार्टूनिस्टों को एक श्रद्धांजलि भी है.

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