Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

दिवाली में पटाखे: क्या हम संवेदनहीन समाज बन चुके हैं?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की गंभीरता को समझकर उस पर और बेहतर ढंग से अमल किए जाने की जरूरत थी

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Oct 20, 2017 04:17 PM IST

0
दिवाली में पटाखे: क्या हम संवेदनहीन समाज बन चुके हैं?

ठीक एक साल पहले 2016 की दीवाली के एक दिन बाद पूरे दिल्ली-एनसीआर के अलावा देश के दूसरे कई हिस्सों में आसमान में घना कोहरा छा गया था. लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. सांस लेते हुए ऐसा लग रहा था जैसे धुंआ पी रहे हों. न जाने कितने लोग छाती में दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल में भर्ती हुए थे. तकरीबन छठवें दिन धूप की किरणें जमीन पर पहुंची थीं और फिर धीरे-धीरे वो कोहरा छंटा था.

वो भयावह याद इस साल भी लोगों के दिमाग में दीवाली का खयाल आते ही तारी हो रही थी. लोग फिर उन भयावह यादों को लेकर डरे हुए थे. फिर दीवाली के बस कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया कि आगामी 31 अक्टूबर तक दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन रहेगा.

इसके बाद वो लोग बेहद राहत महसूस कर रहे थे जो प्रदूषण से होने वाली परेशानियों को लेकर चिंतित थे. लेकिन इसके बाद शुरू हुआ व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के विरोध में दुष्प्रचार. न जाने कितने लोगों ने इसे हिंदू अस्मिता से जोड़ दिया.

सोशल मीडिया पर जमकर ऐसे पोस्ट दिखने लगे जिनमें ये डिमांड की जा रही थी कि अगर दीवाली में पटाखे बैन हो रहे हैं तो बकरीद में कुर्बानी भी बैन कर देनी चाहिए. लोगों का लॉजिक था इसमें न जाने कितने मासूम जानवरों की जान चली जाती है और उनके खून से जो जल प्रदूषण होता है वो भी बेहद खतरनाक है.

ये भी पढ़ें: पटाखे बैन का नहीं दिखा असर, दिल्ली में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचा

दिल्ली बीजेपी प्रवक्ता तेजिंदर सिंह बग्गा सुप्रीम कोर्ट के सामने ही बच्चों में पटाखे बांटते देखे गए. केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता की इस गैरजिम्मेदाराना हरकत पर क्या कार्रवाई हुई, ये शायद किसी को नहीं पता. शायद हुई ही नहीं. लेकिन होनी चाहिए थी. इसलिए होनी चाहिए थी कि खुद प्रधानमंत्री मोदी देश में सफाई को लेकर अभियान चलाए हुए हैं, ऐसे में पार्टी के छोटे नेता पर्यावरण के बचाव के लिए इतने संवेदनहीन हों ये कैसे हो सकता है?

bagga

खैर, पार्टियों ने तो वोटबैंक के लिए गलत-सही के मायने खत्म कर दिए हैं. लेकिन इस दीवाली सबसे ज्यादा तकलीफ आम लोगों के व्यवहार से हुई. नि:संदेह इस बार दिल्ली-एनसीआर में पिछली बार से कम पटाखे चलाए गए.

ये भी पढ़ें: प्रदूषण से भारत में हुईं 25 लाख मौतें, लिस्ट में सबसे ऊपर

इसमें सुप्रीम कोर्ट के बैन का भी काफी योगदान है. लेकिन इसके बावजूद लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ पटाखे चलाते देखे गए. आखिर ये कैसी संवेदनहीनता है कि जिस बच्चे की जरा सी खुशी के लिए आप पटाखे चला रहे हैं... उसके सांस लेने के लिए कैसी दुनिया बचेगी.

दिवाली में भले ही इस बार संख्या में कम पटाखे चलाए गए लेकिन लोगों में छिपी असंवेदनशीलता सबसे ज्यादा दिखी. ये तर्क खूब सुने गए कि पटाखे बेचने पर पाबंदी है, चलाने पर थोड़े ही है!

ये भी पढ़ें: दिवाली 2017: कुछ पटाखे हिंदू होते हैं, कुछ मुसलमान, कुछ अच्छे-कुछ बुरे

एक और जो खराब बात लगातार घटित हो रही है और जो इस बार भी हुई वो है सोशल मीडिया का खराब रोल. अगर यूं ही चलता रहा तो ज्यादा दिन नहीं बचे हैं जब सोशल मीडिया अपनी प्रासंगिकता खो देगा. हर बात को धर्म से जोड़ देने की नकारात्मक कोशिशें साकार होती दिख रही हैं. लोग उद्वेलित होकर हर बार गलत राह चुन ले रहे हैं. मतलब पटाखे न बजाने से पर्यावरण में प्रदूषण होगा ये सामान्य बात है लेकिन धर्म का जिक्र आते ही और ज्यादा पटाखे खरीदकर लाना और चलाना. अजीब बात है.

दीवाली के एक दिन बाद शुक्रवार को आई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बार वायु प्रदूषण की मात्रा पिछले साल से कम रही है. ये खुशी की बात है. शायद ये दिग्भ्रमित सोशल मीडिया कैंपेन न चला होता तो शायद कुछ और हजार लोग पटाखे नहीं चलाते. वो लोग बधाई के पात्र हैं जिन्होंने पर्यावरणीय मुसीबतों को समझते हुए पटाखे नहीं चलाए. और उन लोगों को संवेदनशीलता दिखानी होगी जो अब भी ऑक्सीजन से ज्यादा पटाखों के बारूद से प्रेम करते दिखे हैं.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
AUTO EXPO 2018: MARUTI SUZUKI की नई SWIFT का इंतजार हुआ खत्म

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi