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रेप महज 'बैड सेक्स' नहीं, अभी तो पूरी लड़ाई बाकी है

फेमिनिस्ट जर्मेन ग्रियर ने कहा है कि रेप का अपराधीकरण खत्म कर देना चाहिए. उन्होंने रेप की सजा कम करने की दलील देते हुए रेप को बैड सेक्स तक कहा

Tulika Kushwaha Tulika Kushwaha Updated On: Jun 02, 2018 09:19 AM IST

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रेप महज 'बैड सेक्स' नहीं, अभी तो पूरी लड़ाई बाकी है

पिछले कुछ सालों में रेप की घटनाओं का विरोध काफी बड़े स्तर पर बढ़ा है. लेकिन एक चीज जो कभी नहीं बदलती, वो है विरोध का विरोध. जब भी किसी मुद्दे पर विरोध शुरू होता है, तो उस विरोध का विरोध करने वाले लोग भी सामने आ जाते हैं. रेप भी ऐसा ही एक मुद्दा है, जिसपर अक्सर सवाल उठाए जाते हैं और तर्क पर वितर्क पेश किए जाते हैं. जर्मेन ग्रियर भी ऐसा ही कर रही हैं. रेप पर उनका बयान खतरनाक इसलिए है क्योंकि वो खुद एक फेमिनिस्ट हैं.

ग्रियर ने वेल्श के हे फिल्म फेस्टिवल में कहा कि रेप का अपराधीकरण खत्म कर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि रेप को हिंसात्मक अपराध नहीं आलसी, लापरवाह और असंवेदनशील हरकत की तरह देखा जाना चाहिए. उन्होंने रेप की सजा कम करने की दलील देते हुए रेप को बैड सेक्स तक कहा. उनके हिसाब से ऐसी हरकत करने वालों को ज्यादा से ज्यादा 200 दिनों की कम्युनिटी सर्विस की सजा दी जानी चाहिए.

रेप बैड सेक्स और रेप डैमेजिंग नहीं होता, जैसे बयान

ग्रियर ने कहा कि जब भी एक पति अपनी पत्नी की असहमति के बिना उसके साथ संबंध बनाता है तो इसका मतलब कि वो उसके साथ रेप कर रहा है लेकिन ऐसे मामले कोर्ट तक नहीं पहुंचते. पहुंचते भी हैं, तो हर मामलों में कार्रवाई नहीं होती. ऐसे में रेप का शिकार औरतें आवाज उठाती हैं लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिलता तो ये और भी ज्यादा अपमानजनक होता है.

यहां तक कि ग्रियर ने ये भी कहा कि रेप से किसी तरह की चोट नहीं पहुंचती, कोई निशान नहीं रहता (शारिरिक और मानसिक), वो इतना डैमेजिंग कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि रेप हमें बरबाद नहीं करता ये हमें झुंझला देता है. उन्होंने इसके लिए annoying शब्द का इस्तेमाल किया.

जर्मेन ग्रियर.

जर्मेन ग्रियर.

ग्रियर की ये बातें सुनते ही झटका लगता है. आखिर रेप को बैड सेक्स कैसे कहा जा सकता है? और ऊपर से ये भी कहना कि रेप से कोई चोट नहीं पहुंचती, हताश करने वाला है. एक छेड़छाड़ की घटना भी किसी भी लड़की को सालों तक सहमा सकती है तो फिर रेप कितना भयावह हो सकता है. अगर मैं अपनी बात करूं तो मुझे खुद अपने साथ हुई छेड़छाड़ और बदतमीजी की एक-एक घटना याद है. उसी तरह आज ही मैंने छेड़छाड़ की एक घटना के बारे में पढ़ा, जिसमें छेड़छाड़ की शिकार लड़की ने अपने साथ बदतमीजी करने वाले लड़के को पकड़कर पीटा था. उसने लिखा था कि जब उस लड़के ने उसे छुआ और वो उसे पकड़ने के लिए उसकी तरफ दौड़ने लगी तो उसने अपने शरीर पर ढेर सारे हाथ महसूस किए, ये हर उस घटना की याद दिला रहे थे, जब उसे किसी ने गलत तरीके से छूने की कोशिश की थी या उसे गंदी नजरों से घूरा था. ऐसे किस्से हर दूसरी लड़की के पास होंगे.

भारत में रेप अलग ही स्वरूप में नजर आता है

लेकिन यहां बात बस छेड़छाड़ की नहीं है. यहां रेप की बात है. रेप की बात करने पर हमें निर्भया, अरुणा शानबाग, भंवरी देवी और कठुआ याद आता है, जो अमानवीय हिंसा और घृणित अपराध से कम कुछ नहीं है. रेप को लेकर हमारे यहां जर्मेन ग्रियर जैसी थ्योरी नहीं दी जा सकती क्योंकि अभी तो हमने आवाज उठाना शुरू ही किया है. लेकिन हमारे यहां एक अलग तरह का विरोध है. भारत में रेप ऐसी चीज है, जो अपराधी के बजाय पीड़िता को ज्यादा तबाह करती है. किसी और की हवस का शिकार हुई लड़की को जिंदगी भर इसका एहसास दिलाया जाता है. और वो कभी इससे बाहर नहीं निकल पाती, जिंदगी में आगे चलकर कुछ बनने, कुछ करने की संभावनाएं तो भूल ही जाइए.

रेप का शिकार हुई लड़की को इतनी मानसिक क्षति पहुंचती है कि वो सुसाइडल हो सकती है और कुछ-कुछ मामलों में हो भी जाती हैं. (ये कहीं से भी ओवरस्टेटमेंट नहीं है क्योंकि हालात ऐसे हैं कि यहां सड़क पर चलते हुए छेड़छाड़ का शिकार होने पर भी खुद के शरीर से ही घिन आती है.)

लेकिन वेस्ट में ऐसे हालात नहीं हैं. वेस्ट में देखा जाए, तो रेप की घटनाएं ज्यादा होती हैं. लेकिन वहां पीड़ता को कोसा नहीं जाता. वहां उसके उस भयावह घटना से बाहर निकलने के दरवाजे बंद नहीं कर दिए जाते. अगर पीड़िता की जिंदगी नर्क की जाती, तो माया एंजेलू, मडोना और ओप्रा विन्फ्रे जैसी औरतें हमें नहीं मिलतीं. वहां सोसाइटी आपको आपके साथ हुए ऐसी घटनाओं के चश्मे से नहीं देखती, जिनपर आपका कोई कंट्रोल नहीं था, जबकि आपको सपोर्ट मिलता है. इसके इतर आपकी खुद के व्यक्तित्व को ज्यादा महत्व दिया जाता है. इसलिए ऐसी थ्योरी वेस्ट से से ही निकल सकती है.

हालांकि, भारत में रेप पर फांसी की सजा बहस का मुद्दा है लेकिन रेपिस्ट सबके सामने है, तो वो घृणित व्यक्ति ही है. ऐसी थ्योरियां सामने आने की वजह ये भी हो सकती है कि वहां लोगों को हमारी तरह रोटी-रोजगार की तरह इस तरह चिंता नहीं करनी पड़ती. वहां नौकरियों के लिए धक्के नहीं खाने पड़ते. इसलिए वो अपना दिमाग ऐसी चीजों में लगाते हैं.

क्या आवाज उठाना बंद कर दें?

ग्रियर अपनी बातों में कुछ हद तक सही हो सकती हैं. तब जब वो कहती हैं कि रेप के खिलाफ लड़ाई में औरतें ज्यादा अपमानित होती हैं और हारती हैं. रेप के कुछ मामले ऐसे होते हैं, जहां औरतों को न्याय ही नहीं मिलता. हां वो सही हैं लेकिन क्या ग्रियर ये सुझा रही हैं कि औरतें ऐसे मामले ही न उठाएं? विरोध की आवाज उठाना बंद कर दें? नहीं. हम ऐसा नहीं होने दे सकते. हमारा वक्त अभी तो शुरू ही हुआ है. जो औरतें या लड़किया रेप जैसे भयानक ट्रॉमा से गुजरी हैं, उनके अपराधियों का सजा मिलनी ही चाहिए. अच्छी बात ये है कि ग्रियर के इस बयान का बाहर भी विरोध हो रहा है. इसका मतलब है कि लड़ाई नहीं थमेगी. और यहां भी वक्त के साथ चीजें बदलेंगी, जो बदलना है वो बदलेगा उसे कोई रोक नहीं सकता है.

जर्मेन ग्रियर ऑस्ट्रेलियन राइटर, अकेडमिक और फेमिनिस्ट हैं. 1970 में आई उनकी किताब 'The Female Eunuch' में उन्होंने औरतों की सेक्सुअलिटी पर बात की है. लेकिन 79 साल की ग्रियर ने पिछले कुछ वक्त में काफी विवादास्पद बयान दिए हैं. ग्रियर ने मीटू मूवमेंट पर कहा था कि आखिर अभी रेप के आरोप लगा रहीं औरतें इतने दिनों बाद आवाज क्यों उठा रही हैं. उन्होंने कहा था कि इन लोगों ने पहले चुप रहने के पैसे लिए, और अब आवाज उठा रही हैं. इसका क्या मतलब? उन्होंने Carrier Rapees जैसे शब्द का इस्तेमाल किया था. मतलब रेप के झूठे आरोप लगाकर लाभ उठाना. अब हार्वे विन्सटीन पुलिस गिरफ्त में है. ये ग्रियर के उस सवाल का जवाब है कि आवाज उठाने से क्या फायदा.  इसके अलावा ग्रियर ट्रांसजेंडर औरतों के लिए भी अपमानजनक बयान दे चुकी हैं.

एक फेमिनिस्ट, जो मील का पत्थर रहे नारीवादी आंदोलन का हिस्सा रह चुकी हो, उससे ऐसे बयान सुनना हताश करता है.

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