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मोदी की कैशलेस सोसाइटी का फील गुड फैक्टर

मूलभूत समस्याओं पर फोकस किए बिना वे लक्ष्य हासिल नहीं किए जिनकी बातें मोदी करते हैं.

Updated On: Nov 18, 2016 02:21 PM IST

Krishna Kant

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मोदी की कैशलेस सोसाइटी का फील गुड फैक्टर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ समय से कैशलेस सोसाइटी पर जोर दे रहे हैं. कैशलेस सोसाइटी यानी सारा लेनदेन बगैर नगद राशि के होगा. ऐसे में लोग एटीएम डेबिट कार्ड, क्रेडिट और पेटीएम के जरिये खरीददारी करेंगे.

नोटबंदी को दिए गए भाषण में भी प्रधानमंत्री ने इस पर जोर दिया. वित्त मंत्री और वित्त सचिव की ओर से भी ऐसे बयान आए हैं कि भारत को कैशलेस सोसाइटी बनाने पर जोर दिया जा रहा है. अब सवाल यह है कि क्या भारत के लोग तकनीकी रूप से इतने स्मार्ट हैं कि वे कैशलेस सोसाइटी में तब्दील किए जा सकें?

महामारी की हद तक निरक्षरता 

जनगणना 2011 के मुताबिक, भारत में फिलहाल 26 प्रतिशत यानी करीब 32.5 करोड़ आबादी निरक्षर है. 60 लाख बच्चे स्कूलों से बाहर हैं. दूसरे, भारत में साक्षर होने का मतलब कुछ और है. स्कूलों से बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने का प्रतिशत 40 से 50 के बीच है. 2013-14 में स्कूलों में दाखिला लेने वाले 98 फीसदी में से 41 फीसदी बच्चों ने एलीमेंट्री शिक्षा पूरी होने से पहले स्कूल छोड़ दिया.

यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में करीब पांच करोड़ बच्चे माध्यमिक स्कूल तक नहीं पहुंच पाते यानी छठवीं, सातवीं और आठवीं की भी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते. दुनिया भर ऐसे सबसे ज्यादा किशोर भारत में हैं जो स्कूल नहीं जाते या कभी नहीं गए.

2014 में यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में भारत को सबसे निरक्षर देशों की श्रेणी में रखा था. 2015 में देश का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो यानी सकल नामांकन अनुपात सिर्फ 23.5 प्रतिशत रहा. विभिन्न संस्थाएं बार-बार रिपोर्ट देती हैं कि भारत में जो बच्चे स्कूलों में पढ़ते भी हैं, उनकी पढ़ाई का स्तर सामान्य से बहुत नीचे हैं.

निरक्षर आबादी के चलते 2700 अरब का नुकसान

विश्व साक्षरता संगठन ने 2012 में रिपोर्ट दी थी कि भारत की 26 फीसदी निरक्षर आबादी के चलते अर्थव्यवस्था को हर साल 53 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 2700 अरब रुपए का नुकसान हो रहा है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में निरक्षरता की स्थिति कितनी भयानक है!

विडंबना है कि शिक्षा का अधिकार लागू होने के बाद भारत में शिक्षा को लेकर कोई भी बहस या कोशिश लगभग बंद है. आॅनलाइन पैसे के लेनदेन, आॅनलाइन खरीदारी और आॅनलाइन व्यापार के लिए कम से कम प्राथमिक शिक्षा के अलावा इंटरनेट साक्षरता भी जरूरी है.

जून, 2016 तक भारत में कुल 61 करोड़ मोबाइल यूजर हैं. इनमें से मात्र 30 लाख के पास 4जी कनेक्शन हैं. भारत में ज्यादातर मोबाइल यूजर सिर्फ बात करने के लिए फोन का इस्तेमाल करते हैं.

डिजिटल साक्षरता की समस्या 

इंटरनेट लाइव स्टेट्स वेबसाइट के मुताबिक, भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 46 करोड़ है. नेशनल सैंपल सर्वे के मुताबिक भारत में सिर्फ 12 प्रतिशत लोग ई-मेल भेजना जानते हैं. सिर्फ 14 प्रतिशत लोगों को मालूम है कि कंप्यूटर पर टेक्सट फाइल कैसे बनाई जाती है.

एनएसएस की इस रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 95 प्रतिशत लोग ईमेल भेजना नहीं जानते. रिपोर्ट पर निगाह डालें तो ज्यादातर राज्यों में यही हाल है. साक्षरता, इंटरनेट साक्षरता के मामले में भारत के हालात भयानक हैं.

हफिंगटन पोस्ट में अपूर्व पाठक लिखते हैं, 'जिन लोगों के पास है ही नहीं, वे कैशलेस अर्थव्यवस्था नहीं बना सकते. सिर्फ 46 प्रतिशत लोगों की पहुंच बैंकिंग तक है, इंटरनेट कनेक्टिविटी सिर्फ 22 प्रतिशत है, बिजली की कनेक्टिविटी सिर्फ 19 प्रतिशत है, 140 लाख व्यापारियों में से सिर्फ 12 लाख के पास इलेक्ट्रानिक पेमेंट करने की मशीन है. सीधी सी बात है कि भारत के पास कैशलेस अर्थव्यवस्था का ढांचा मौजूद नहीं है. डिजिटल साक्षरता दूसरी समस्या है.'

बुनियादी ढांचे का अभाव

भारत में कैशलेस सोसाइटी के लिए कोई बुनियादी ढांचा तो है ही नहीं, सरकार खुद ही इसे लेकर भ्रमित है. अगर कैशलेश सोसाइटी पर जोर दिया जा रहा है तो 1000 के नोट को बंद करके 2000 का नोट लाने से यह कैसे संभव होगा? नोटबंदी के सिलसिले में सरकार ने पहले 500 और 1000 के नोट बंद कर दिए. फिर उसी कीमत के नए नोट भी बाजार में लाए जा रहे हैं.

इसी कड़ी में सरकार पंचायतों से लेकर मंत्रालयों तक के सारे रिकॉर्ड डिजिटाइज्ड करके ई-गवर्नेंस को बढ़ावा देना चाहती है. लेकिन जमीनी हालत इसके ठीक उलट है. डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी निवेश की जरूरत है. अॉप्टिकल फाइबर बिछाने का काम अपने लक्ष्य से काफी पीछे चल रहा है. अभी हर महीने 500 किलोमीटर तक अॉप्टिकल फाइबर बिछाया जा रहा है, जबकि हर महीने 30 हजार किलोमीटर की दर से बिछाने की जरूरत है.

दिल्ली जैसे शहरों में हर उपभोक्ता कॉल ड्रॉप और धीमे इंटरनेट की असुविधा से जूझ रहा है. छोटे शहरों, कस्बों और गांवों का और बुरा हाल है. फिलहाल भारत में करीब 2 लाख टेलीकॉम टावर्स की कमी है. इंटरनेट स्पीड के मामले में भारत दुनिया में 114वें नंबर पर है. यहां इंटरनेट की औसत स्पीड सिर्फ 2.8 एमबीपीएस है. 60 प्रतिशत से ज्यादा उपभोक्ता- इंटरनेट नेटवर्क की समस्या से परेशान हैं.

असल समस्या पर गौर करना होगा

यह ख्याल बहुत अच्छा है कि पूरा भारत ई-गवर्नेंस के दायरे में आ जाए, कैशलेस सोसाइटी बन जाए, डिजिटल इंडिया बन जाए और हर उपभोक्ता के पास ब्रॉडबैंड कनेक्शन मौजूद हो, लेकिन अब तक के असफल और अधूरे प्रयासों को देखते हुए लगता है कि भविष्य बहुत संभावनाशील नहीं है.

नरेंद्र मोदी सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है और अब तक बुनियादी शिक्षा पर उसका कोई ध्यान नहीं है. निरक्षर आबादी न सिर्फ बेराजगारी और भुखमरी बढ़ाती है, बल्कि इससे अर्थव्यवस्था पर खतरनाक स्तर का अतिरिक्त बोझ बढ़ता है. मूलभूत समस्याओं पर फोकस किए बिना वे सारे लक्ष्य हासिल नहीं किए जिनकी बातें प्रधानमंत्री मोदी करते हैं. लोगों में हर तरह की साक्षरता का स्तर सुधारे बिना बात नहीं बनेगी.

प्रधानमंत्री मोदी को याद रखना चाहिए कि विकास कार्यों के उल्लेखनीय प्रदर्शन के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के 'फील गुड फैक्टर' को जनता ने खारिज कर दिया था, क्योंकि वह आम आदमी की रोजमर्रा की वास्तविक परेशानियों से बहुत दूर था.

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