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किसानों का भला कौन चाहता है?

किसानों को भी इस समझ से काम लेना होगा कि वो विपक्ष के हाथों की कठपुतली न बन जाएं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jun 08, 2017 09:54 AM IST

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किसानों का भला कौन चाहता है?

भारत में लहलहाते खेतों और मुस्कुराते किसान की तस्वीरें अगर आपकी याद में कभी आती हों तो वो राज्य शायद पंजाब ही होगा. किताबों में भी बार-बार यही जिक्र पढ़ने में आया कि पंजाब किसानी में हमारे देश का अग्रणी राज्य है. जब-जब मजबूर और कमजोर किसान का जिक्र आया तो बुंदेलखंड की चिलचिलाती धूप में फटी जमीन पर खड़ा किसान दिखाई दिया तो कभी विदर्भ में कर्ज तले मरता किसान दिखा.

अब फिर किसान मरा है. इस बार जगह मध्य प्रदेश है. मंदसौर की घटना इस समय पूरे देश में मुख्य खबर है. शिवराज सिंह चौहान लगभग सभी जगह विलेन हैं. आलोचनाओं का दौर जारी है. आलोचना होनी भी चाहिए क्योंकि शिवराज राज्य के सीएम हैं.

अपनी सरकार में किसानों पर चलवाई थी गोलियां, अब शिवराज पर निशाना

मंदसौर की घटना के बाद जिस तरीके से एमपी सरकार की तरफ से हड़बड़ी में ये बात सामने आई कि किसान आपस में चली गोलियों के वजह से मारे गए हैं. फिर शाम तक राज्य सरकार की तरफ से मुआवजा घोषित किया गया. फिर मुआवजे की रकम बढ़ाकर 1 करोड़ कर दी गई. मतलब जिस हड़बड़ी में ये सबकुछ हुआ उससे संदेह और ज्यादा बढ़ा. इस तरह की सिचुएशन में सरकार का जल्दबाजी में कोई भी कदम उठाना आलोचनाओं को और दावत देने जैसा है.

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कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह सरकार पर पूरी तरह आक्रामक हैं.

दिग्विजय सिंह सीएम का इस्तीफा मांग रहे हैं. दरअसल राजनीति ऐसा खेल है जहां सत्ताधारी पार्टी से इस्तीफा मांगना विपक्षी नेताओं की पहली प्राथमिकता में होता है. दिग्विजय सिंह आज शिवराज पर कितने हमले कर रहे हों लेकिन उन्हें अपने मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ मुलताई गोली कांड जरूर याद होगा.

मध्य प्रदेश में उन्नीस साल पहले (12 जनवरी, 1998) को बैतूल जिले की मुलताई तहसील परिसर में पुलिस फायरिंग में 24 किसानों की मौत हुई थी, जबकि 150 लोग गोली लगने से जख्मी हो गए.

उस वक्त मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे. मारे गए किसानों ने धरना-प्रदर्शनों के जरिए अपनी मांगें शासन-प्रशासन तक पहुंचाने की कोशिश की थी लेकिन पुलिस ने उनकी विनती का जवाब बुलेट से दिया. एमपी की राजनीति को गहरे से समझने वाले इसे देश में अभी तक किसानों पर हुआ सबसे बड़ा हमला मानते हैं.

इस घटना ने प्रदेश की राजनीति पर भी काफी गहरा असर छोड़ा था और दिग्विजय दोबारा सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठ पाए. अब शायद दिग्विजय को इस घटना में काफी राजनीतिक संभावनाएं दिख रही हों. अब नई तरह से किसानों का मसीहा बनने की कवायद जारी है.

ये आंदोलन संघ के ही किसान संगठन ने शुरू किया था 

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शिवकांत दीक्षित (बीच में)

कमाल की बात ये है कि मध्यप्रदेश में हालिया किसान आंदोलन की शुरुआत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ही किसान संगठन भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने की थी.

उनकी तेरह सूत्रीय मांगें थीं. न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया जाना मुख्य मांग थी. 1 जून से शुरू हुआ ये आंदोलन चार जून को उस वक्त समाप्त हो गया जब सीएम शिवराज सिंह चौहान ने 13 में से दस मांगें मान लीं. बीकेएस की तरफ से कहा गया कि सरकार ने उनकी ज्यादातर मांगें मान ली हैं. अब हम आंदोलन वापस ले रहे हैं.

सीएम के साथ उस समय मौजूद रहे बीकेएस के संगठन मंत्री शिवकांत दीक्षित ने फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से हुई बातचीत में बताया कि इस आंदोलन को कुछ लोग गुमराह कर रहे है. हमने आंदोलन की शुरुआत की. हम किसानों की बात सरकार तक पहुंचाना चाहते थे. सीएम शिवराज सिंह चौहान ने हमारी ज्यादातर बातें मान ली थीं. इसके बाद फिर नीमच और मंदसौर के इलाकों में आंदोलन एकदम हिंसक हो गया. किसानों पर पर गोलियां चलीं. हम इसकी निंदा करते हैं. लेकिन देखिए एकबात समझने वाली है कि इस आंदोलन को कुछ लोग राजनीतिक रंग देना चाहते हैं, उनका किसानों के फायदे से कुछ लेना देना नहीं है.

अब अगर शिवकांत दीक्षित की मानें तो इस आंदोलन में सरकार ने किसानों की बातें मान ली थीं. आंदोलन भी उनका ही संगठन कर रहा था. तो फिर 4 जून को आंदोलन वापस लेने के बाद 5 जून को बवाल शुरू क्यों हुआ? शिवकांत दीक्षित किसी का नाम नहीं लेते हुए कहते हैं कि कुछ लोगों ने इस आंदोलन को बरगला दिया.

हाल में तमिलनाडु के किसानों की भी तस्वीर हुई थी वायरल

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अभी हाल ही में तमिलनाडु के कुछ किसानों ने जंतर-मंतर पर अजीबोगरीब तरीके अपनाकर प्रदर्शन किए थे. बाद में सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें वायरल हुईं जिसमें ये किसान अपना फोटो सेशन करा रहे थे. उस आंदोलन को लेकर भी यही चर्चाएं रहीं कि ये राजनीति से प्रेरित है. उन प्रदर्शनों के दौरान भी किसान नंग-धड़ंग और कमजोर स्थिति में दिख रहे थे.

किसानों को लेकर ये याद्दाश्त तबसे बनी है जबसे सोचने-समझने की स्थिति हुई. किताबों में उसके पहले का भी जिक्र जब भी पढ़ा तो मदर इंडिया के राजकुमार से ज्यादा कुछ भी नहीं दिखाई दिया.

ऐसा नहीं है कि भारत में किसान आंदोलन सिर्फ आजादी के बाद शुरू हुए लेकिन संगठित किसान आंदोलन राजनीतिक मजबूती के साथ आजादी के बाद ही दिखाई देने शुरू हुए. आजादी के पहले किसान आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ जंग का हिस्सा हुआ करता था. आजादी के बाद किसान आंदोलनों के पीछे राजनीतिक कारण भी काफी हद तक कारक होने लगे.

अलग-अलग मुद्दों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में किसानों ने कई हिंसक आंदोलन किए हैं. हाल के सालों में हमारे पास जाट रिजर्वेशन और नंदीग्राम और सिंगूर, भट्टा पारसौल, बुंदेलखंड, विदर्भ का मामला याद आता है. इन सारे मामलों में किसानों की स्थिति पर क्या असर पड़ा?

दिमाग पर जोर डालने पर भी आपके हाथ कुछ नहीं आएगा. इसका कारण यही है कि संगठित होकर किसान जब सड़कों पर अपनी शक्ति दिखाना शुरू करता है तो सिर्फ राजनीति होती है, उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है.

ये हमारे देश का सबसे वेल नोन फैक्ट है कि भारत कृषि प्रधान देश है. फिर ऐसा क्या है कि जिस देश में जिस चीज की प्रधानता है, वही हाशिए पर खड़ा है. ऐसा नहीं है कि किसानों की समस्याएं वाजिब नहीं हैं.

इससे शायद ही किसी को इंकार हो कि जो हमारा अन्नदाता है उसकी जायज मांगें पूरी होनी चाहिए. लेकिन किसानों को भी ये समझना होगा कि उनकी समस्याओं का राजनीतिकरण शुरू हुआ तो शायद कभी हल न आए. विपक्ष में मौजूद राजनीतिक पार्टियां भी सत्ता में रही हैं. उनके समय में भी किसानों के आंदोलन हुए थे. नतीजा ये है कि आज भी किसानों को आंदोलन ही करना पड़ रहा है.

मध्य प्रदेश में 15 सालों से बीजेपी की ही सरकार है. यूपीए 2 की सरकार के दौरान शिवराज सरकार को सर्वाधिक अनाज उत्पादन का पुरस्कार भी मिला था. इतनी भयावह स्थिति पहली बार बनी है. राज्य सरकार विपक्षी दलों पर आंदोलन को भड़काने का आरोप लगा रही है. लोगों की आम मानसिकता यही होती है कि सरकार में जो मौजूद है वो पूरी तरह शोषक की भूमिका में है. लेकिन इन सारी बातों के बीच किसानों को भी इस समझ से काम लेना होगा कि वो विपक्ष के हाथों की कठपुतली न बन जाएं.

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