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किसानों की कर्ज माफी पर राष्ट्रीय नीति क्यों नहीं?

भारत कृषि प्रधान देश है. लेकिन यहां के कृषक परेशान हैं. अब राजनीति से परे सभी दलों को सरकार के साथ मिल कर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति पर काम करना होगा जिसका लाभ छोटे और मझोले किसानों तक पहुंचे.

Updated On: Jun 30, 2018 12:15 PM IST

Aparna Dwivedi

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किसानों की कर्ज माफी पर राष्ट्रीय नीति क्यों नहीं?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में रिकार्ड तोड़ जीत के बाद बीजेपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार 19 मार्च 2017 में बन गई थी. लेकिन उसके बाद सबको इंतजार था सरकार की पहली कैबिनेट बैठक का. ये इंतजार इसलिए था क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश के किसानों से वादा किया था, 'होली के बाद नई सरकार बनेगी और सरकार बनने के बाद उसकी पहली मीटिंग होगी और उसमें मैं उत्तर प्रदेश के सांसद के नाते आप लोगों को विश्‍वास दिलाता हूं कि किसानों के कर्ज को माफ करने का निर्णय ले लिया जाएगा.' चुनाव प्रचार में जोर-शोर से किया वादा सरकार पर भारी पड़ रहा था. क्योंकि किसानों का कर्जा माफ करने का मतलब सरकार पर 37 हजार करोड़ का खर्चा था. उत्तर प्रदेश सरकार को केन्द्र सरकार का साथ मिला तब भी राज्य के बजट पर काफी बोझ था.

किसानों के कर्जे की माफी को लेकर चुनाव प्रचार में जोर-शोर से वादा किया जाता है लेकिन अभी तक कोई नीति नहीं बनी है. उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने एक बार फिर किसानों का मुद्दा उठाते हुए एक राष्ट्रीय नीति की मांग की. प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में पटनायक ने मांग की है कि किसानों की कर्ज माफी पर बाकायदा नीति बने जो कि ये तय करे कि अगर किसानों की कर्ज माफी की जाएगी तो उसमें राज्य सरकार और केन्द्र सरकार का हिस्सा हो.

बढ़ते खर्चे और कर्जे से परेशान किसानों ने बाकायदा आदोलन छेड़ दिया है. अपने ऊपर बढ़ते कर्ज और खेती में लगातार गिरावट और बढ़ते घाटे से परेशान किसानों ने 2017 में सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. मध्यप्रदेश से शुरू हुआ आंदोलन महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, तमिलनाडू और हरियाणा समेत कई राज्यों में फैलता गया. पुरानी तकनीक और मॉनसून पर निर्भर रहने वाले ज्यादातर किसान कर्ज में डूब रहे हैं. इस साल फरवरी में महाराष्ट्र में चालीस हजार किसानों ने मुंबई तक पैदल मार्च कर सरकार को हिला दिया था.

किसानों पर कर्जा

क्या है कर्ज माफी का मुद्दा? सरकारी आंकड़ा अपने में ही बहुत भयावह कहानी कह रहा है. भारत में किसानों की जनसंख्या पर नजर डालें तो जनगणना 2011 में किसानों की संख्या 118.7 लाख बताई गई है. उनमें से आधे से ज्यादा किसानों पर कर्ज का बोझ है. इसकी मुख्य वजह खेती का फायदे का सौदा न होना और जमीनों का खत्म होना है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 79 लाख से ज्यादा किसान परिवार कर्जे में दबे हैं.

Radha Mohan Singh

लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा था कि देश में 52 प्रतिशत कृषक परिवारों के कर्जदार होने का अनुमान है और प्रति कृषि परिवार पर बकाया औसत कर्ज 47,000 रुपये है. कृषि मंत्री ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के कृषि वर्ष जुलाई 2012-जून 2013 के संदर्भ के लिए देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 70वें राउंड के कृषि परिवार के सर्वेक्षण आंकड़ों के आधार पर यह बात कही. उन्होंने बताया, ‘अखिल भारतीय स्तर पर बकाया ऋणों का लगभग 60 प्रतिशत संस्थागत स्रोतों से लिया गया था जिसमें सरकार से 2.1 प्रतिशत, सहकारी समिति से 14.8 प्रतिशत और बैंकों से लिया गया ऋण 42.9 प्रतिशत था.’

उन्होंने 2014, 2015 के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े तथा वर्ष 2016 के अनंतिम आंकड़ों के हवाले से लोकसभा में बताया कि देश में साल 2014 से 2016 तक, तीन वर्षों के दौरान ऋण, दिवालियापन एवं अन्य कारणों से करीब 36 हजार किसानों एवं कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की है.

कृषि मंत्री ने ये भी कहा कि सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए काफी कुछ कर रही है. जानकारों का मानना है कि कर्ज माफी ही उनकी समस्या का हल नहीं है. बल्कि इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे.

कर्ज माफी सही नीति नहीं

कर्ज माफी की बजाय किसानों की आय बढ़ाने के उपाय पर विचार करना चाहिए. किसान, किसान नेताओं और नीति विश्लेषकों का कहना है जब तक किसानों की उपज का मूल्य निर्धारित नहीं होगा,किसान की आमदनी नहीं बढ़ेगी. कर्ज माफी योजना के तहत कुछ किसान एक बार तो ऋण मुक्त हो जाते हैं, मगर अगले सीजन की फसल के लिए उनके सामने वही समस्या मुंह खोले खड़ी मिलती है.

मसलन महंगे बीज, खाद, उर्वरक और कीटनाशकों, सिंचाई के संसाधनों के बढ़ते खर्चे के चलते किसान फिर कर्ज के मकड़ जाल में फंस जाता है. चूंकि, एक बार जिनका कर्ज माफ हो गया है उन्हें कर्ज देने में बैंक भी आनाकानी करते हैं और ऐसे में किसानों के सामने साहूकारों से ज्यादा ब्याज दर पर कर्ज लेने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचता.

इसके अतिरिक्त, फसलों का उचित दाम न मिलना और खेती के सारे संसाधनों मसलन बीज, उर्वरक, कीटनाशक, कटाई, बुआई, सिंचाई के लिए मशीनों और बाजार पर निर्भरता वो वजहें हैं, जिससे बिना कर्ज के खेती करना करोड़ों किसानों के लिए संभव ही नहीं है.

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स्वराज इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष योगेन्द्र यादव के मुताबिक साल 1966-67 के अकाल के बाद से सरकार की कृषि नीति का उद्देश्य यह था कि देश में खाद्यान्न का उत्पादन कम ना हो जाए और खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ ना जाएं. चिंता उत्पादन की थी, उत्पादक की नहीं. इसलिए सरकारी नीतियों के द्वारा फसलों के दाम दबा कर रखे गए. गरीबों को सस्ता अनाज मिल सके इसका बोझ किसान के कंधों पर डाल दिया गया. फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था तो बनी, लेकिन इसे इतना दबा कर रखा गया कि किसान की लागत भी मुश्किल से निकल पाती है. मंहगाई और मौसम की मार झेल रहे किसानों की दशा लगातार खराब होती जा रही है.

स्वामीनाथ आयोग की रिपोर्ट

किसानों की हालत सुधारने के लिए साल 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग बनाया गया. इस आयोग के अध्यक्ष स्वामीनाथ ने दो सालों में अपनी छह रिपोर्ट तैयार कीं जिनमें कई तरह के सुधार की बात कही गई. इन सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) औसत लागत से 50 फीसदी ज्यादा रखने की बात कही गई. ताकि छोटे किसान भी मुकाबले में आएं, यही इसका मकसद है. किसानों की फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य कुछेक नकदी फसलों तक सीमित न रहें, इस लक्ष्य से ग्रामीण ज्ञान केंद्र और बाजार का दखल स्कीम भी लॉन्च करने की सिफारिश की गई है.

स्वामीनाथ आयोग की रिपोर्ट में भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर दिया गया है. अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि है. आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है. हालांकि बीमा योजना लागू की गई लेकिन किसानों का आरोप है कि बीमा कंपनियां अलग अलग बहाने से बीमा के पैसा देने में कतराती हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

अब सवाल ये उठता है कि किसानों की कर्ज माफी के लिए क्या किया जाए? अपने पत्र में नवीन पटनायक ने कर्ज माफी को राजनीतिक मुद्दा न बनाते हुए बाकायदा केन्द्र और राज्य की हिस्सेदारी वाली नीति पर जोर दिया. उनका कहना है कि केन्द्र और राज्य के बीच 60-40 की हिस्सेदारी होना चाहिए ताकि सारा बोझ राज्य पर ना पड़े.

साथ ही छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने वाले क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट की तर्ज पर किसानों के लिए भी कुछ ऐसे ही ट्रस्ट बनाने की बात कही है. पर जानकारों का मानना है कि सबसे जरूरी न्यूनतम समर्थन मूल्य का काम किसानों की को-ऑपरेटिव को तय करने दें. साथ ही बाजार भाव पर फसल बिके. इसकी देख-रेख की व्यवस्था सरकार करे. इससे राजनीति कम और किसानों की आमदनी में इजाफा होगा. भारत कृषि प्रधान देश है. लेकिन यहां के कृषक परेशान हैं. अब राजनीति से परे सभी दलों को सरकार के साथ मिल कर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति पर काम करना होगा जिसका लाभ छोटे और मझोले किसानों तक पहुंचे.

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