S M L

किसानों का आंदोलन: शहरवाले ध्यान दें! 10 दिनों के लिए गांव बंद हैं

कृषि और किसान पर जल्द ध्यान न दिया गया तो न ये सरकार बच सकेगी न मौजूदा नीतियों पर अर्थव्यवस्था ही सुधर पाएगी

Mahendra Saini Updated On: Jun 02, 2018 03:49 PM IST

0
किसानों का आंदोलन: शहरवाले ध्यान दें! 10 दिनों के लिए गांव बंद हैं

हालिया उपचुनावों में विपक्षी एकता बीजेपी के लिए बड़ी मुसीबत बनकर उभरी है. लेकिन लगता नहीं कि मिशन-2019 में बीजेपी के लिए ये अकेला सिरदर्द है. पार्टी के लिए बाधाओं की पूरी फेहरिश्त सामने है, जिससे पार पाना बिल्कुल भी आसान नहीं होने वाला वाला है. कुछ मुसीबतें 4 साल की सत्ता के दौरान बने एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर की उपज हैं. कुछ उन सपनों के पूरा न किए जाने या कहें कि टूट जाने का नतीजा हैं, जो खुद बीजेपी ने 2014 में वोट मांगते समय जनता को दिखाए थे.

सपने दिखाई गई जनता का एक बड़ा वर्ग भूमिपुत्रों यानी किसानों का है. जिंदगी में बेहतर बदलाव की उम्मीद में इन्होंने नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया था. लेकिन सपनों के हकीकत में न बदल पाने पर अब ये आंदोलन को मजबूर हैं. आंदोलन का नाम है गांव बंद. ये पहले के किसान आंदोलनों से कई मायनों में अलग है और विस्तृत भी. पहले ही दिन इसने शहरों में असर दिखाना शुरू कर दिया है. ईश्वर जाने शहरों के अगले 9 दिन कैसे कटने वाले हैं.

क्या है गांव बंद आंदोलन?

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल समेत देश के कई राज्यों में किसानों ने 10 दिन का गांव बंद अभियान चला रखा है. 1 जून से शुरू हुआ ये आंदोलन 10 जून तक चलेगा. 9 दिन तक गांव बंद रहेंगे और 10वें दिन पूरे भारत को बंद किया जाएगा. इसका नाम जरूर गांव बंद है लेकिन सबसे ज्यादा असर डालेगा ये शहरों में रहने वालों पर. अगर ये आंदोलन 10वें दिन तक खिंचा तो निश्चित रूप से शहरों की जिंदगी उलट-पुलट हो जाएगी.

किसान कल्याण मजदूर महासंघ अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा का दावा है कि इस आंदोलन में देश भर के 130 किसान संगठन जुड़े हुए हैं. इन संगठनों से जुड़े किसानों ने तय किया है कि मांगों पर सरकार का ध्यान खींचने के लिए 1 से 10 जून तक अपनी किसी भी उपज को वे शहरों में नहीं भेजेंगे. यानी गांवों में जो भी फल, सब्जी, दूध, अनाज पैदा होंगे, उन्हें वे शहर वालों को नहीं बेचेंगे. न ही शहर की दुकानों से ही किसान कुछ खरीदेंगे.

ये भी पढ़ें: क्या है स्वामीनाथन की रिपोर्ट? जिसे लागू कराने के लिए किसान कर रहे हैं आंदोलन

इस तरह शहर में रहने वाली बड़ी जनसंख्या के सामने रोजमर्रा की चीजों की किल्लत हो जाएगी. यही किल्लत उन्हें किसानों की अहमियत समझाएगी और इसी के चलते किसानों की दयनीय हालत पर उनका ध्यान जा सकेगा. जयपुर के किसान प्रह्लाद गुणदैया का कहना है कि गांवों की अपेक्षा शहरों पर सरकारों का जल्दी ध्यान जाता है. कम से कम इस बहाने सरकार और जिम्मेदार लोग गांवों की मूल समस्या पर चर्चा तो करेंगे.

फोटो पीटीआई से

फोटो पीटीआई से

क्या हैं किसानों की मांगें?

किसान संगठनों की मुख्य मांगें कर्जमाफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करना है. अरसे से लालफीताशाही में उलझी इन सिफारिशों के मुताबिक न्यूनतम समर्थन मूल्य फसल की लागत का डेढ़ गुणा होना चाहिए. एक मांग 60 वर्ष से ऊपर के किसानों के लिए 5 हज़ार महीने की पेंशन को लागू किये जाने की भी है.

किसानों की मांगों को गहराई से समझें तो ये इतनी भारी नहीं हैं कि उनसे अर्थव्यवस्था ही उथलपुथल हो जाए. राजस्थान विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर सी बी यादव के मुताबिक इनमें से अधिकतर मांगें वे ही हैं, जिन्हें 2014 में बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था. फिर भी ये समझ से परे है कि सत्ता में आने के 4 साल बाद भी आखिर इन्हें पूरा क्यों नहीं किया गया.

कर्जमाफी शुरू पर शर्तें लागू!

हालांकि राजस्थान में कर्जमाफी की घोषणा पर अमल शुरू हो गया है. लेकिन दूसरे राज्यों की तरह यहां भी कम पढ़े-लिखे किसानों के सामने बहुत सी छिपी-अनछिपी शर्तें जोड़ दी गई हैं. जैसे, पहले पूरा कर्ज माफ करने का ऐलान हुआ. अब 50 हजार तक का ही माफ किए जाने की बात हो रही है.

इन्हीं शर्तों पर श्रीगंगानगर के एक युवा किसान ने अच्छा तंज कसा है. इस किसान ने अपनी उगाई सब्जी को खुद बेचने का फैसला किया है. अपनी दुकान के ऊपर उसने लिखवा दिया है कि मंत्रियों, विधायकों, नेताओं और अफसरों को सब्जी तभी बेची जाएगी जब वो ई-मित्र में जाकर आधार और भामाशाह कार्ड का पंजीकरण कराएं. इसके बाद मोबाइल पर आए ओटीपी पासवर्ड को यहां दिखाएं. तभी सब्जी मिलेगी.

ये भी पढ़ें: मंदसौर: शहादत का दर्द नहीं वोटों की चिंता में किसानों को अपने पक्ष में करने की चल रही खींचतान

दरअसल, पिछले दिनों सरकार ने एमएसपी पर सरसों और गेहूं की फसल खरीदने के लिए किसानों को पहले आधार और भामाशाह कार्ड को पंजीकरण कराने के लिए बाध्य किया था. बहुत से किसानों ने जब तक इन शर्तों को पूरा किया, तब तक खरीद का तय कोटा पूरा होने के नाम पर इसे बंद कर दिया गया.

ऐसी शर्तों के चलते लहसुन उगाने वाले किसानों को भारी घाटा उठाना पड़ा है. हाड़ौती में कुछ लहसुन उत्पादक किसानों की सदमे से मौत हो गई. लेकिन गृहमंत्री और बीजेपी के दूसरे नेताओं ने सहानुभूति दिखाने के बजाय उलजुलूल बयान देकर किसानों को भड़काने का ही काम किया. सांगोद विधायक हीरालाल नागर ने कहा कि किसान घाटे के कारण नहीं बल्कि मुआवजे के लिए खुदकुशी करता है. वही, कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी ने कहा कि कांग्रेस राज में ज्यादा किसान मरे इसलिए किसानों की खुदकुशी पर बीजेपी से सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए.

ऐसे बयान सोचने पर मजबूर करते हैं कि संविधान आखिर किससे और कैसे लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की अपेक्षा करता है? क्या ऐसे जनप्रतिनिधि कभी राज्य के नीति निदेशक सिद्धान्तों को लागू कर सकेंगे? क्या आज़ादी के 70 साल बाद भी किसानों के नसीब में सिर्फ घाटा, शोषण और खुदकुशी ही आएगी? आखिर, क्यों किसानों को हाड़तोड़ मेहनत और प्राकृतिक आपदाओं से जूझने के बाद भी उसका वाजिब हक़ नहीं दिया जा रहा?

सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता हर साल बढ़ा दिया जाता है. हर 10 साल में नए वेतन आयोग की हजारों करोड़ की सिफारिशें भी सरकारों को बोझ नहीं लगती. कॉर्पोरेट सेक्टर सरकार से बड़े-बड़े बेल आउट पैकेज लेने में कामयाब रहता है. भगोड़े व्यवसायी बैंकों का एनपीए बढ़ाकर भागने में कामयाब हो जाते हैं. लेकिन किसानों के हाथ क्या लगता है- महंगे खाद बीज खरीद कर घाटे की फसल या भूखे रहने की मजबूरी?

किसानों को नहीं मिला योजनाओं का वास्तविक फायदा

हालांकि ऐसा नहीं है कि मौजूदा सरकारों ने किसानों के हित में कुछ किया न हो. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, कृषि बीमा योजना, सॉइल हेल्थ कार्ड, कृषि कौशल जैसी योजनाएं आगे बढ़ाई गईं. 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का ऐलान किया गया. लेकिन वास्तविकता ये है कि धरातल पर इन योजनाओं या घोषणाओं का कोई फायदा भूमिपुत्रों को नहीं मिल पाया है.

एक हकीकत देखिए कि राजस्थान में अपने खाते से कृषि बीमा योजना का प्रीमियम कटवा चुके कुछ किसानों ने जब फसल खराब होने पर मुआवजे के लिए आवेदन किया तो उन्हें मना कर दिया गया. बीमा कंपनी ने कहा कि उनके नाम कोई पालिसी नहीं है. जांच हुई तो पता चला कि बैंक ने बीमा कंपनी को प्रीमियम जमा ही नहीं करवाया. मामला खुल गया तो सॉफ्टवेयर की गलती बता दी गई, नहीं खुलता तो शायद बैंक अपना कुछ एनपीए किसानों के प्रीमियम से कम कर लेता?

ये भी पढ़ें: किसान आंदोलन में RSS का किसान संघ शामिल नहीं, मानता है राजनीतिक षड्यंत्र

गांव बंद के अलावा चारा क्या?

अपनी उपज को यूं सड़क पर फेंक देना एक किसान के लिए न आर्थिक कारणों से आसान है न ही सामाजिक कारणों से. फिर भी वे ऐसा कर रहे हैं क्योंकि ऐसे हालात में हड़ताल के अलावा चारा ही क्या बचता है. राजस्थान में गांव बंद आंदोलन का सबसे ज्यादा असर जयपुर, सीकर, झुंझुनूं, नागौर, बीकानेर, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के कृषि समृद्ध जिलों में देखने को मिल रहा है. जयपुर डेयरी (सरस) में रोजाना 11 लाख लीटर दूध पहुंचता है लेकिन आंदोलन के पहले दिन 2 लाख लीटर दूध कम पहुंचा. किसानों ने या तो दूध इकट्ठा ही नहीं होने दिया या फिर टैंकरों को रोककर सड़क पर फैला दिया.

सब्जियों को भी शहरी मंडियों में भेजने के बजाय सड़कों पर या जानवरों के सामने फेंक दिया गया. श्रीगंगानगर में किसानों और व्यापारियों के बीच संघर्ष के हालात भी बन गए. यहां कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करना पड़ा.

पिछले साल गर्मियों में मध्य प्रदेश के 6 किसानों को मंदसौर में जान गंवानी पड़ी थी. इन गर्मियों में गन्ना किसानों ने कैराना में बीजेपी को दिखा दिया कि उन्हें हल्के में लेने की गलती न की जाए. 2 दिन पहले आए तिमाही आंकड़ों में कृषि विकास दर घटकर आधी रह गई है. स्पष्ट है कि कृषि और किसान पर जल्द ध्यान न दिया गया तो न ये सरकार बच सकेगी न मौजूदा नीतियों पर अर्थव्यवस्था ही सुधर पाएगी.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
International Yoga Day 2018 पर सुनिए Natasha Noel की कविता, I Breathe

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi