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अस्पतालों का बुरा हाल, वेंटिलेटर खराब होने पर ऐसा होता है मरीज का इलाज!

देश में अस्पताओं के हालात काफी बदतर हो चुके हैं. आए दिन अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ी स्थिति से जुड़े मामले सामने आते रहते हैं.

Updated On: Oct 18, 2018 05:53 PM IST

FP Staff

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अस्पतालों का बुरा हाल, वेंटिलेटर खराब होने पर ऐसा होता है मरीज का इलाज!
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देश में अस्पताओं के हालात काफी बदतर हो चुके हैं. आए दिन अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाओं की बिगड़ी स्थिति से जुड़े मामले सामने आते रहते हैं. अब हाल ही में एक ताजा मामला सामने आया है जहां सड़क दुर्घटना में घायल एक मरीज को वेंटिलेटर के खराब हो जाने पर परिवार के जरिए मैन्युअल मशीन का सहारा लेकर उन्हें जिंदा रखा गया.

मुंबई मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक मामला महाराष्ट्र के मुंबई का है. जहां बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के जरिए चलाए जा रहे एक अस्पताल सियॉन में एक घायल व्यक्ति को भर्ती करवाया गया. 40 वर्षीय व्यक्ति का नाम शकील अहमद है और तेज रफ्तार ऑटो के टक्कर मार देने से सड़क हादसे में शकील घायल हो गया था. जिसके बाद उन्हें सियॉन अस्पताल में भर्ती करवाया गया लेकिन वहां घायल के परिवार वालों का काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

अंबु बैग

मामले में शकील अहमद को ट्रैकियोस्टॉमी (श्वसन नली में टयूब लगाने की प्रक्रिया) के बाद वेंटिलेटर पर रखा गया था लेकिन ऐन वक्त पर मशीन भी धोखा दे गई और वह खराब हो गई. वेंटिलेटर को जीवन रक्षक मशीन के तौर पर जाना जाता है लेकिन नाजुक पलों में इस मशीन के खराब हो जाने से हर किसी की धड़कने बढ़ना लाजमी है. जिसके बाद अंबु बैग का सहारा लिया गया. अंबु बैग एक मैन्युअल लंग मशीन को कहा जाता है. जिसे लगातार पंप करना होता है ताकि मरीज सांसे लेता रहे. इसके फेल हो जाने से मरीज की मौत भी हो सकती है.

हालांकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. शकील अहमद के परिवार के सदस्यों को 8 घंट तक नए वेंटिलेटर के लिए इंतजार करना पड़ा. तब तक उन्हें अंबु बैग को पंप करके ही मरीज की जान बचाए रखी. परिवालों का कहना है कि वे लोग पहले शकील को बीएमसी के गोवंडी शताब्दी अस्पताल लेकर गए. जहां न तो सीटी स्कैनर था और न ही वेंटिलेटर. जिसके बाद उन्हें सियॉल अस्पताल ले जाया गया. जहां उन्हें ट्रॉमा वॉर्ड में वेंटिलेटर पर रखा गया.

अहमद के छोटे भाई अकीलुद्दीन के मुताबिक शकील की हालत बेहद खराब थी. ऐसे में वेंटिलेटर खराब होने के बाद उनके पास अंबू बैग के जरिए सांस देने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वहीं ऐसी स्थित में उन्हें दूसरे अस्पताल में शिफ्ट भी नहीं किया जा सकता था.

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