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बलात्कार के झूठे मामले: 'ठगे जाने के एहसास' को कानून समझा सकता है?

सवाल है कि आखिर औरतें शादी के वादे न पूरा करने के आरोप पर बलात्कार के मामले क्यों दायर करती हैं?

Updated On: Feb 12, 2017 04:17 PM IST

Ila Ananya

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बलात्कार के झूठे मामले: 'ठगे जाने के एहसास' को कानून समझा सकता है?

मेरे एक दोस्त ने एक बार बेंगलुरु में एक कॉफी शॉप पर तीन महिलाओं की गुपचुप बातचीत सुनी थी. उनमें से एक खबर पढ़कर सुना रही थी कि एक महिला जिसका अपनी उम्र से बड़े आदमी के साथ सम्बन्ध था, उसने उस पर मुम्बई की एक अदालत में बलात्कार का मुकदमा ये कहकर दायर कर दिया था कि उस आदमी ने उससे शादी का वादा किया था.

मेरे मित्र ने बताया कि उसके बाद पांच मिनट तक किसी ने कुछ नहीं बोला. तब अचानक उनमें से एक महिला बोली, 'ओह, उसे जरूर उस आदमी से बहुत सारी उम्मीदें रही होंगी.' जिसके जवाब में उसकी दोस्त ने तुरंत कहा, 'क्या कह रही हो, ये रेप कैसे हो सकता है?'

पिछले साल मुम्बई उच्च न्यायालय में आई एक याचिका में किसी रिश्ते के खत्म होने पर बलात्कार के झूठे आरोपों में फंसाए जाने वाले लोगों की सुरक्षा सुनश्चित करने के लिए दिशा-निर्देशों की बात की गई थी. लेकिन अहम सवाल ये है कि आखिर औरतें शादी के वादे को न पूरा करने के आरोप पर बलात्कार के मामले क्यों दायर करती हैं? और क्या उन्हें 'बलात्कार के झूठे मामले' कहना सही है?

28 दिसंबर, 2016 को एक नई याचिका सामने आई और इस बार ये मांग आई थी एक औरत और आदमी की तरफ से जो पहले रिलेशन में थे.

मुंबई हाइकोर्ट में कई केस दायर हैं

इस याचिका की कहानी इस तरह है. साल 2015 में एक 20 वर्षीय महिला, जिसका एक 34 वर्षीय व्यक्ति से सम्बन्ध था, ने उसके खिलाफ मुकदमा दायर किया और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 417 के तहत धोखाधड़ी के लिए उस पर कार्रवाई की मांग की. उसे हाल ही में पता चला था कि वो शख्स पहले से ही शादीशुदा था और उसके शादी के वादे झूठे थे.

हालांकि पुलिस ने उसे भारतीय दंड संहिता (बलात्कार के लिए दंड) की धारा-376 के तहत बलात्कार के लिए भी नामजद किया. तब मुम्बई उच्च न्यायालय में इस FIR को निरस्त करने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की गई.

अब उल्लेखनीय ये है कि इन दोनों ने ही मिलकर एक याचिका मुम्बई उच्च न्यायालय में दायर की है जिसमें उन्होंने भविष्य में किसी भी ऐसी घटना घटने की स्थिति में दिशा-निर्देश चाहा है. 9 फरवरी को मुम्बई उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई की.

याचिकाकर्ताओं की वकील स्वप्ना कोडे हमें बताती हैं कि सुनवाई के बाद अदालत ने उन्हें एक जनहित याचिका दायर करने का निर्देश दिया क्योंकि यह मामला जनता के हित से जुड़ा था.

दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य प्रकरण

2013 में सुप्रीम कोर्ट में दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य प्रकरण के दौरान ऐसे ही एक मामले की सुनवाई हुई थी. पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में पहले से एक 19 वर्षीय महिला और उसके परिवार की ओर से दायर बलात्कार के मामले में दीपक गुलाटी को दोषी ठहराया गया था.

इस फैसले के अनुसार, इस आदमी ने शादी करने की बात कहकर उसको अपने साथ कुरुक्षेत्र चलने के लिए राजी कर लिया था और शादी का वादा करके 'झाड़ियों के पीछे उसकी इच्छा के खिलाफ उसके साथ संभोग किया' था. कुरुक्षेत्र पहुंचकर वे कुछ दिनों के लिए उस आदमी के रिश्तेदारों के घर रहे, जहां उस आदमी ने तीन दिन उसके साथ 'बलात्कार किया' और चौथे दिन उसे घर से बाहर कर दिया.

यहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों को बलात्कार से जुड़ा मानने के लिए पहले ये जरूरी है कि आप कोर्ट को यह मनवा सकें कि व्यक्ति के शुरू से ही 'गुप्त इरादे' थे. उन्होंने इस पर जोर दिया कि वादे के टूटने (किसी भी कारण से) और पहले से ही झूठे वादे को पूरा न करने में फर्क है. सुप्रीम कोर्ट ने उस व्यक्ति को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

आप किसी भी गलतफहमी में न रहें और ये जान लें कि इस तरह के शादी करने के वादे को तोड़ने के मामले में कोई अलग से कानून नहीं है. इसकी बजाय सामान्य तौर पर भारतीय दंड संहिता के तीन खंड यहां इस्तेमाल होते हैं. हैरानी की बात है कि पुलिस, जो अक्सर महिलाओं के लिए यौन हिंसा के अपराध दर्ज कराने में मुश्किलें खड़ी करती है (खास करके TLF के रेडी टु रिपोर्ट श्रृंखला में) इन मामलों में उत्साहपूर्वक FIR दर्ज करती नजर आती है.

bombay high court

इस तरह की FIR आमतौर पर सेक्शन 375 (बलात्कार), सेक्शन 376 (बलात्कार का दंड) और सेक्शन 417 (धोखाधड़ी) के अंतर्गत दर्ज होती हैं. इनमें से प्रत्येक सेक्शन को सेक्शन 90 के साथ जोड़कर पूरे मामले पर विचार किया जाता है जिसके तहत स्वीकृति और स्थिति को नजर में रखा जाता है. अगर गलत तथ्य पेश करके स्वीकृति प्राप्त की जाती है तो इस स्थिति में इसे स्वीकृति नहीं माना जाएगा.

साल 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने स्वीकृति के मुद्दे पर नई उलझनें पैदा कर दीं. इसमें वो सबूत मांगे गए, जो शायद उतने ही अस्पष्ट और मुश्किल होते हैं, जितने आरोपी के इरादे. जो इस मामले की कठिनाई को और भी बढ़ाने वाले होते हैं. जैसे इस तरह के कुछ मामले जो हाईकोर्ट में पहुंचे, उनमें कुछ अलग तरह की ही सजाएं सुनाई गईं.

वकील कहते हैं कि ऐसे ज्यादातर मामले निचली अदालत में ही या तो समझौते में या फिर आरोपमुक्त होकर खत्म हो जाते हैं क्योंकि असली इरादा सिद्ध करना बहुत ही मुश्किल होता है. तो भी अगस्त, 2015 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले में एक व्यक्ति को दस साल की सजा सुनाई गई, जबकि मुम्बई हाईकोर्ट ने मार्च, 2016 को एक अन्य आरोपी को यह कहते हुए जमानत दे दी कि 'जब महिला शिक्षित और परिपक्व है, वो 'नहीं' कह सकती है.'

इन मामलों की जांच में सावधानी की जरूरत

दिल्ली उच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन के मुताबिक, दिल्ली में इस तरह के मामले दर्ज होने की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है. अपने अनुभव से जॉन कहती हैं कि इन मामलों में से ज्यादातर ऐसे लोग दर्ज कराते हैं जो एक आदमी के साथ अपने कई वर्षों के रिश्ते के दौरान सहमतिपूर्वक सहवास करते रहे थे.

वो इस बात पर तर्क देती हैं, 'हमें इस तरह के हर मामले की और भी सावधानी से जांच करने की जरूरत है क्योंकि हममें से सभी को शादी के अपने फैसले को कभी भी बदलने का हक है.'

दिल्ली के राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में कानून के एसोशिएट प्रोफेसर और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में संवैधानिक कानून, नीति और शासन केंद्र के कार्यकारी निदेशक मृणाल सतीश का तर्क कुछ यूं है,

जब महिलाएं इन मामलों को दर्ज करने खुद आएं तो समझ लीजिये कि अक्सर इसके पीछे उनके मन में ठगे जाने का अफसोस होता है कि उन्होंने जिस व्यक्ति को सहवास की अनुमति दी वह उनसे शादी करने का इरादा ही नहीं रखता था.

लेकिन क्या ठगे जाने के एहसास के अलावा भी कोई और कारण हैं?

हमने कानून और नीति अनुसंधान केंद्र की सह-संस्थापक जायना कोठारी से, जो कर्नाटक उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में एक वकील के रूप में काम कर रही हैं, से ये सवाल किया.

एक महिला जिसे कोठारी प्रतिनिधित्व कर रही थीं, तीन या चार साल से एक आदमी के साथ रह रही थी. उन्होंने खुद को शादीशुदा बताकर एक घर किराए पर लिया था और उस व्यक्ति ने एक कार लोन भी ले लिया था जिसमें महिला को अपनी पत्नी और गारंटर के रूप में दिखाया था. शुरू में काफी समय तक जब भी महिला उससे शादी के लिए कहती वो कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देता था. और फिर आखिर में उन दोनों ने एक मंदिर में जाकर एक सादी सी शादी कर ली और इस तरह वे एक दूसरे की जिम्मेदारी से औपचारिक तौर पर भी बंध गए.

लेकिन अंत में वह व्यक्ति उस महिला को सिर्फ इतना कहकर छोड़ गया कि वह किसी और से प्यार करता था. और हां इस बात को मानने से भी उसने साफ इंकार कर दिया कि उन्होंने कभी शादी की भी थी.

इस तरह के ज़्यादातर मामले आमतौर पर निचले मध्यम वर्ग से लेकर मध्यम वर्ग तक के परिवारों से सम्बंधित महिलाओं द्वारा दर्ज कराये जाते हैं.

कोठारी का कहना है कि ‘धोखा दिया गया’ की भावना से भी कहीं अधिक की पीड़ा होती है मन में. वो कहती हैं, 'वर्षों में बनाये गए इन रिश्तों में भावनात्मक जटिलताओं के साथ-साथ वित्तीय मुद्दे भी शामिल होते हैं.'

कई अन्य उदाहरणों में मामला दर्ज कराने वाली महिलाओं ने बताया कि उनसे शादी का वादा किया गया था. लेकिन जब वे गर्भवती हो गईं तो उनके पुरुष साथी उनको छोड़ गए.

मीडिया ने अपनाया है गलत रुख

मीडिया ने इस तरह के मामलों को लगभग उपेक्षित ढंग से ही लिया है और इनकी बढ़ती संख्या को पुरुषों के विरुद्ध झूठे मामलों के रूप में भी पेश किया है. कोठारी कहती हैं कि इस गंभीर मुद्दे के साथ होने वाली इस तरह की लापरवाही 'शादी के वादे को तोड़ने' जैसी हल्की बात के रूप में पेश की जा रही है.

ऐसा ही सतीश का भी कहना है कि मीडिया द्वारा इस तरह के मामलों की 'झूठे मामले' कहकर होने वाली बर्खास्तगी और अदालतों द्वारा इसे कानून का दुरुपयोग करार दिया जाना, सिर्फ इस तरह की गलत धारणाओं को जन्म देती हैं कि महिलाएं कानून का फायदा उठा रही हैं.

क्या ठगे जाने के इस एहसास को हमारे कानूनों में समझाया जा सकता है? कोई कैसे इसे समझाए? क्या इसे समझने में ये बात इससे कहीं आगे निकल जाती है?

ऐसा ही रेबेका जॉन कहती हैं, 'मुझे नहीं लगता कि कार्यकर्ताओं और नारीवादियों के रूप में हमको इसके भीतर झांकने से बचना चाहिए. हमें ये देखने की जरूरत है कि ये मामला बलात्कार की श्रेणी में आता है या नहीं. किस परिस्थिति में इसे बलात्कार कहा जाना चाहिए और इन मामलों को दर्ज करने में क्या व्यक्तिगत अधिकारों का भी हनन हो रहा है, वगैरह.

द लेडीज फिंगर (TLF) महिलाओं की राजनीति, संस्कृति, स्वास्थ्य, सेक्स, जॉब और भी कई विषयों पर ताजा और चुटीला नजरिया पेश करने वाली एक ऑनलाइन पत्रिका है.

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