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फेक न्यूज़ गाइडलाइंस: मीडिया को खुद अपने भीतर झांककर देखना चाहिए

गाइडलाइंस के मुताबिक, अगर कोई पत्रकार फर्जी/मनगढ़ंत खबर बनाने या झूठी खबर (फेक न्यूज) का प्रचार करते पाया जाता है, तो उसकी मान्यता निलंबित या स्थाई रूप से रद्द कर दी जाएगी

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Apr 05, 2018 11:51 AM IST

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फेक न्यूज़ गाइडलाइंस: मीडिया को खुद अपने भीतर झांककर देखना चाहिए

फेक न्यूज (झूठी या फर्जी खबर) देने वाले पत्रकारों की मान्यता रद्द करने से जुड़ी गाइडलाइंस पर मोदी सरकार का फैसला अप्रत्याशित माना जा रहा है. लेकिन जिस अभूतपूर्व तेजी के साथ सरकार ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के दिशानिर्देशों (गाइडलाइंस) को वापस लिया उसने सबको हैरत में डाल दिया है.

दरअसल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जैसे ही अपनी नई गाइडलाइंस की घोषणा की और फेक न्यूज देने वाले पत्रकारों की मान्यता रद्द करने का ऐलान किया, उसके 24 घंटों के भीतर ही प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) इस मामले में हस्तक्षेप करने सामने आ गया. पीएमओ ने आनन-फानन में इस दुर्भावनापूर्ण और लोकतंत्र के लिए खतरनाक आदेश को वापस ले लिया.

स्मृति ईरानी के नेतृत्व वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बीते सोमवार को एक प्रेस विज्ञप्ति (प्रेस रिलीज) जारी की थी, जिसमें पत्रकारों की मान्यता के संबंध में संशोधित गाइडलाइंस स्पष्ट की गईं थीं. संशोधित गाइडलाइंस के मुताबिक, अगर कोई पत्रकार फर्जी/मनगढ़ंत खबर बनाने या झूठी खबर (फेक न्यूज) का प्रचार करते पाया जाता है, तो उसकी मान्यता निलंबित या स्थाई रूप से रद्द कर दी जाएगी.

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के 3,800 पत्रकार सदस्य हैं

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपनी प्रेस रिलीज में कहा था, ‘फेक न्यूज देने वाले पत्रकार की मान्यता उस वक्त तक निलंबित रखी जाएगी, जब तक उस फेक न्यूज के संबंध में नियामक संस्थाएं (रेगुलेटिंग एजेंसीज) कोई फैसला न ले लें. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के वापस लिए जा चुके आदेश के मुताबिक, अगर कोई पत्रकार फर्जी या झूठा समाचार प्रकाशित करने या उसका प्रचार करने का दोषी पाया जाता है, तो गाइडलाइंस के पहली बार उल्लंघन के लिए उसकी मान्यता छह महीने के लिए निलंबित की जाएगी. गाइडलाइंस के दूसरी बार उल्लंघन पर उस पत्रकार की मान्यता को एक साल के लिए निलंबित कर दिया जाएगा. अगर वही पत्रकार तीसरी बार फेक न्यूज के प्रकाशन या प्रचार करने का दोषी पाया गया तो उसकी मान्यता को स्थायी रूप से रद्द कर दिया जाएगा.

दिल्ली में पत्रकारों के संगठन 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की प्रेस रिलीज पर सख्त ऐतराज जताया. इस संगठन के 3,800 पत्रकार सदस्य हैं. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संशोधित गाइडलाइंस की खासकर दो बातों को लेकर ज्यादा आपत्ति थी. पहली आपत्ति इस बात को लेकर थी कि, फेक न्यूज फैलाते पकड़े जाने पर सरकार उस पत्रकार की मान्यता निलंबित या रद्द कर देगी, लेकिन उस मामले में सिर्फ ‘न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन’ (एनबीए) और ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ (पीसीआई) जैसी संस्थाएं ही हस्तक्षेप कर सकती थीं.

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को दूसरी आपत्ति इस बात को लेकर थी कि, फेक न्यूज फैलाने का दोषी ठहराए जाने के बाद उस पत्रकार के खिलाफ सुनवाई (ट्रायल) शुरू होगी. प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के तौर पर अपना दूसरा कार्यकाल संभाल रहे गौतम लाहिरी का कहना है कि, सरकार उन पत्रकारों पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास कर रही है जिनकी पहुंच मंत्रालयों और बड़े अधिकारियों तक है.

गौतम लाहिरी के मुताबिक, ‘एक पत्रकार बहुत मेहनत के बाद समाचार के किसी स्रोत (न्यूज सोर्स) तक अपनी पहुंच बना पाता है. न्यूज सोर्स तक पहुंचना पत्रकारों का अधिकार है. लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (आई एंड बी) का फैसला इसमें रुकावट डालेगा.’ लाहिरी ने आश्चर्य जताते हुए आगे कहा, आई एंड बी का आदेश केवल मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए है. ‘प्रेस इंफोर्मेशन ब्यूरो’ की वेबसाइट के मुताबिक देश में मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या 2,403 है. तो क्या वाकई मोदी सरकार फेक न्यूज को रोकने की कोशिश कर रही थी, जो कि व्यापक रूप से ऑनलाइन फैलाई जाती हैं? दरअसल सरकार अपने नए आदेश के जरिए पत्रकारों को नियमों में जकड़ना चाहती थी. सरकार चाहती थी कि उसके आंतरिक कामकाज तक पहुंच रखने वाले चुनिंदा पत्रकारों के अधिकार खत्म किए जा सकें.

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प्राइवेट मीडिया को सहूलियत देने के लिए प्रेस इंफोर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) सरकार की नोडल एजेंसी के तौर पर भी काम करती है. वेबसाइट के मुताबिक पीआईबी की मान्यता पाने के लिए किसी भी शख्स के पास बतौर पूर्णकालिक पत्रकार पांच साल का अनुभव होना अनिवार्य है. पीआईबी से मान्यता प्राप्त तकरीबन 800 पत्रकारों ने साल 2017 में 'एग्जीक्यूटिव ऑफ प्रेस एसोसिएशन' नाम की एक संस्था का गठन किया था.

एग्जीक्यूटिव ऑफ प्रेस एसोसिएशन के निर्वाचित अध्यक्ष जयशंकर गुप्ता ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि, पीआईबी की मान्यता पत्रकारों को विभिन्न मंत्रालयों और सरकारी अधिकारियों तक पहुंचने की सुविधा प्रदान करती है. लिहाजा सरकार ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के बेरहम और सख्त फैसले को वापस लेकर एक स्वागत योग्य कदम उठाया है. जयशंकर गुप्ता के मुताबिक, ‘सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेश का फेक न्यूज से कुछ भी लेना-देना नहीं था. ऐसे फैसलों से समाचारों (खबरों) की निगरानी नहीं की जा सकती है और न ही समाचारों की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है.’

देश में ‘नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ नाम का पत्रकारों का एक बड़ा संगठन है. इस संघीय संगठन की कई राज्यों में शाखाएं हैं. अकेले दिल्ली में ही करीब 2800 पत्रकार इस संगठन के सदस्य हैं. हिंदी पत्रकार हर्ष वर्धन त्रिपाठी नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय प्रबंधक (नेशनल एग्जीक्यूटिव) हैं. हर्ष वर्धन कहते हैं कि, डिजिटल और ऑनलाइन मीडिया प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के दायरे में नहीं आते हैं. यही समस्या की सबसे बड़ी जड़ है.

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हर्ष वर्धन का मानना है कि अब, पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा एक मीडिया काउंसिल स्थापित करने की आवश्यकता है. एक ऐसी मीडिया काउंसिल बनना चाहिए जिसमें फेक न्यूज का प्रचार-प्रसार करने वाले पत्रकारों पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें दंडित करने की शक्तियां हों. हर्ष वर्धन ने प्रेस काउंसिल की दो अलग-अलग संरचनात्मक समस्याओं का भी उल्लेख किया. पहली यह कि, कई निष्क्रिय पत्रकारों को भी प्रेस काउंसिल का सदस्य बना दिया गया है. दूसरी समस्या यह है कि, प्रेस काउंसिल में सभी फैसले दो या तीन लोगों की ज्यूरी की बजाए सिर्फ एक शख्स ही लेता है.

कोई खबर विशेष फर्जी/झूठी है या नहीं

वर्तमान में प्रत्येक माध्यम के पास समाचारों की गुणवत्ता की निगरानी और पत्रकारों की जवाबदेही तय करने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं. अगर ऑनलाइन वेबसाइटों के माध्यम से समाचारों के संगठित प्रसार की बात की जाए तो हमें यह पता होना चाहिए कि, एक ऑनलाइन न्यूज वेबसाइट शुरू करने के लिए प्रेस इंफोर्मेशन ब्यूरो की मान्यता की जरूरत नहीं है. पिछले साल तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस मामले में समाचार उद्योग की सिफारिशों पर सिर्फ विचार ही कर रहा था.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की प्रेस रिलीज में कहा गया था कि, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) को यह निर्धारित करना था कि कोई खबर विशेष फर्जी/झूठी है या नहीं. आपको बता दें कि, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन क्रमशः प्रिंट और टेलीविजन न्यूज की नियामक इकाइयां (संस्थाएं) हैं.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मामले में एनबीए के पास एक ऐसा संगठन है जिसके वह खुद वित्त पोषित करता है. इस संगठन को न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्डस अथॉरिटी (एनबीएसए) कहा जाता है. यह एक स्वतंत्र संस्था है और इसका काम प्रसारण (ब्रॉडकास्टिंग) से संबंधित शिकायतों पर विचार करना और उसके बारे में फैसला लेना है. लेकिन यह अपने नाम के अनुरूप प्रसारित होने वाली सामग्री (कंटेंट) को रेगुलेट करने वाली संस्था नहीं है. दरअसल यह एक स्टैंडर्ड मॉनिटरिंग बॉडी है. फर्जी स्टिंग ऑपरेशन के मामले सामने आने के बाद साल 2007 में इसका गठन किया गया था.

'लाइव इंडिया' न्यूज चैनल के एक रिपोर्टर प्रकाश सिंह का मामला ही लीजिए. प्रकाश सिंह को एक स्टिंग ऑपरेशन के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था. उस कथित स्टिंग ऑपरेशन में दिल्ली में एक महिला टीचर से जुड़े सेक्स रैकेट के खुलासे का दावा किया गया था. न्यूज चैनल पर उस कथित स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के बाद हिंसा भड़क गई थी. उग्र भीड़ ने मांग की थी कि आरोपी महिला टीचर को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए. इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान (सुओ मोटो) लेते हुए राज्य सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया. जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने क्राइम ब्रांच को मामले की जांच के आदेश दिए.

जांच में सामने आया कि स्टिंग ऑपरेशन की खबर फर्जी थी. इस फर्जी स्टिंग ऑपरेशन की जांच से यह भी स्पष्ट हुआ कि एक झूठी खबर से किसी व्यक्ति विशेष या संस्थान की छवि को कितना बड़ा नुकसान हो सकता है. इसमें आर्थिक और कानूनी पचड़ों से होने वाले नुकसान भी शामिल हैं. फर्जी खबर की इसी घटना के बाद न्यूज ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्डस अथॉरिटी (एनबीएसए) के गठन की नींव पड़ी. एनबीएसए में ज्यूरिस्ट, सिविल सोसायटी के सदस्य और विभिन्न न्यूज चैनलों के संपादक शामिल हैं.

मशहूर हिंदी पत्रकार कमर वहीद नकवी दो साल तक एनबीएसए के सदस्य रह चुके हैं. उन्होंने बताया कि, जबसे एनबीएसए अस्तित्व में आया है, तब से पत्रकारों के मन में अपनी खबरों पर जवाबदेही की भावना बढ़ गई है. लेकिन एनबीएसए भी अपनी सीमाओं से बंधा हुआ है. क्योंकि यह एक कानूनी संस्था नहीं है और इसका अधिकार क्षेत्र भी सिर्फ अपने सदस्यों तक सीमित है.

कमर वहीद नकवी के मुताबिक, ‘मेरे समय में लगभग 50 न्यूज चैनल थे, जो कि एनबीएसए के सदस्य होते थे. आज न्यूज चैनलों की संख्या 300 से ज्यादा है. ऐसे में प्राथमिक और सहयोगी सदस्यता योजनाओं के तहत सभी लोगों को एकजुट करना एक बड़ी चुनौती है.’ नकवी ने आगे कहा कि, इस मामले में एक कानूनी संस्था को स्थापित करने के लिए सरकार को राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी. हमें एक ऐसी संस्था की जरूरत है जो 'स्वतंत्र, स्वायत्त और स्व-विनियामक हो'. जिसके पास गुणवत्ता की निगरानी करने के लिए पर्याप्त धन (फंड) हो. इसके अलावा जिसके पास देश की सभी भाषाओं के चैनलों पर नजर रखने की सुविधाएं और संसाधन हों.’

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एनबीएसए के उद्देश्य और कार्य:

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की प्रेस रिलीज पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. इसकी मुख्य वजहों में से एक यह है कि, खबरों के स्वयं-विनियमन (सेल्फ रेगुलेशन) के लिए पहले से ही एक तंत्र है, जिसे सरकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. अगर मौजूदा तंत्र को मजबूत बनाने की जरूरत है, तो वह काम सरकार के हस्तक्षेप के बिना ही हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के द्वारा किया जा सकता है. वर्तमान में 25 प्रमुख न्यूज और करंट अफेयर्स ब्रॉडकास्टर्स एनबीएसए के सदस्य हैं. जिनमें 65 न्यूज चैनल और करंट अफेयर्स चैनल शामिल हैं.

अगर समाचार पत्रों की बात की जाए तो, एक अख़बार शुरू करने के इच्छुक व्यक्ति की पृष्ठभूमि की जांच पुलिस रजिस्ट्रेशन के माध्यम से की जाती है. अखबारों और पत्रिकाओं जैसे प्रकाशनों के पंजीकरण के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कानूनी संस्था रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया (आरएनआई) के अनुसार, साल 2013-14 तक देश में पंजीकृत अखबारों की कुल संख्या 99,660 थी.

पहले आरएनआई के कार्यालय दूसरे राज्यों में भी थे, लेकिन साल 2016 के बाद से इसका केवल एक कार्यालय नई दिल्ली में है. अख़बार शुरू करने के इच्छुक व्यक्तियों को अपना आवेदन अब जि़ला कलेक्टरों के दफ्तरों में प्रस्तुत करना होता है. जिसके बाद उनके आवेदनों को आरएनआई के नई दिल्ली स्थित कार्यालय और महानगरों में अग्रेषित (फारवर्ड) किया जा सकता है. यह ज़िम्मेदारी पुलिस को सौंपी गई है.

प्रशांत कुमार दिल्ली में बतौर कंपनी सेक्रेटरी (सीएस) काम करते हैं और ‘इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज़ ऑफ इंडिया’ से जुड़े हुए हैं. वह निजी अखबार/पत्रिका शुरू करने के लिए आरएनआई को आवेदन करने वाले लोगों को कॉर्पोरेट सलाह देते हैं. फ़र्स्टपोस्ट के साथ बातचीत में प्रशांत ने बताया कि, सभी ज़रूरी दस्तावेज प्रस्तुत करने वाले आवेदकों को तीन महीने के भीतर अखबार या पत्रिका शुरू करने का लाइसेंस मिल जाता है.

प्रशांत कुमार के मुताबिक, ‘हमारे पास देश भर की सभी जगहों से आवेदन आते हैं, वह चाहे पश्चिम बंगाल में माल्दा हो या बिहार का वैशाली या हरियाणा में करनाल हो या तमिलनाडु का कोयंबटूर. पिछले तीन सालों में जब से मैंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया है, तब से लेकर आज तक मैंने एक भी आवेदन को खारिज होते नहीं देखा है. मैंने सिर्फ उन्हीं आवेदनों को निरस्त होते देखा है जिनके प्रस्तावित अखबार या पत्रिका का नाम (शीर्षक) पहले ही से किसी और के द्वारा पंजीकृत कराया जा चुका था.’

प्रशांत ने आगे कहा कि, ‘हमारे पास आधे आवेदन सामाजिक कार्यकर्ताओं के आते हैं, और बाकी के आधे आवेदन उन व्यापारिक घरानों के आते हैं जो अपना खुद का अखबार शुरू करना चाहते हैं. बुनियादी आधार पर सभी आवेदकों का पुलिस सत्यापन (वेरिफिकेशन) कराया जाता है.’ प्रशांत का कहना है कि, अखबार या पत्रिका के लाइसेंस और उसके आवेदन के बारे में जानकारी के लिए उन्हें हर महीने करीब 200 फोन कॉल्स आते हैं.

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प्रशांत कुमार का कहना है कि, ‘छोटे शहरों में अखबारों के लाइसेंस के दुरुपयोग के मामले सामने आते रहते हैं. वहां जबरन वसूली और ब्लैकमेलिंग के लिए अखबारों के लाइसेंस का गलत इस्तेमाल किया जाता है. समस्या ये है कि, लाइसेंस जारी करने और खारिज करने का काम जिला मजिस्ट्रेट और नौकरशाह करते हैं. इस प्रक्रिया में मीडिया के लोगों को शामिल नहीं किया जाता है. जबकि इस समस्या को मीडिया के लोग ही ज्यादा लोकतांत्रिक ढंग से समझ सकते हैं.’

आखिर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि फेक न्यूज को परिभाषित कौन करता है? कौन उन मापदंडों को निर्धारित करता है जिनसे किसी खबर में छिपे दुष्प्रचार (प्रोपेगेंडा) की जांच की जाती है. किसी खबर विशेष में निहित प्रोपेगेंडा सरकार के हक में या उसके खिलाफ भी हो सकता है. अगर इंटरनेट की बात की जाए तो, समस्या का एक हिस्सा फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया नेटवर्क के हाथों में आई ताकत से पैदा होता है. फेसबुक और ट्विटर पर किसी शख्स का कोई बयान या कोई घटना देखते ही देखते वायरल हो जाती है.

एक ही समय में एक ही मुद्दे पर तरह-तरह की हज़ारों प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है. फिर उतनी ही तेजी के साथ पुराने मुद्दे की जगह कोई दूसरा मुद्दा ले लेता है और सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगता है. ऐसे में सोशल मीडिया पर खबरों की निगरानी करना कठिन हो जाता है. तेजी से बदलती खबरों के बीच यह जांच करना दुष्कर है कि कौन सी खबर झूठी है और कौन सी खबर सच्ची. यहां तक कि अगर सोशल मीडिया पर फैली किसी खबर विशेष की बाकायदा पूरी जांच की जाए तो नतीजे तक पहुंचने से पहले ही वह मुद्दा ट्रेंडिंग चार्ट से हट चुका होता है. किसी खबर विशेष को प्रचारित-प्रसारित करने की पद्धति बेहद घातक है.

आज के दौर में मीडिया का स्वरूप बहुत तेजी के साथ बदल रहा है, ऐसे में पत्रकारों की सच्चाई, प्रतिबद्धता और तथ्यों के प्रति ईमानदारी निर्धारित करने के लिए तेजी से बदलने वाले कानून की सख्त जरूरत है. लेकिन इन सबके बीच मीडिया के मुख्य सार यानी अभिव्यक्ति की आजादी (फ्री स्पीच) को कोई खतरा नहीं होना चाहिए.

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