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फेक न्यूज के दौर में बड़ी समस्या असली खबरों में दिलचस्पी का अभाव है

मीडिया और लोगों को सरकारों से कुछ जरूरी सवाल पूछे जाने चाहिए जिनपर कोई बात नहीं करता

Aakar Patel Updated On: Jan 29, 2018 03:08 PM IST

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फेक न्यूज के दौर में बड़ी समस्या असली खबरों में दिलचस्पी का अभाव है

मैं इसे कोलकाता से लिख रहा हूं जहां मैं लिटरेचर फेस्टिवल में बोल रहा हूं. गुजरे 10 सालों में इस तरह के कई इवेंट्स पूरे भारत में पनपे हैं और दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले हमारे यहां इस तरह के सबसे ज्यादा लिटफेस्ट्स आयोजित होते हैं. मुझे यह एक बड़ी चीज लगती है क्योंकि एक संस्कृति के तौर पर हमारे यहां लिखने और साहित्य की परंपरा रही है लेकिन लेखक का समाज पर ज्यादा प्रभाव नहीं रहा है.

ऐसे कोई आसार यहां नहीं हैं कि यहां कोई वाक्लाव हैवेल जैसा लेखक उभरे. वाक्लाव हैवेल एक लेखक थे जो कि चेक रिपब्लिक के पहले प्रेसिडेंट बने. शिक्षकों की तरह ही लेखकों का भी सम्मान और प्रतिष्ठा होती है, लेकिन हमारे यहां उनका अनुसरण नहीं किया जाता. ऐसे में हमारे यहां इतने लिटरेचल फेस्टिवल क्यों होते हैं? इनमें से हर एक में सैकड़ों-हजारों लोग क्यों इकट्ठा होते हैं, जिनमें से बड़ी तादाद में युवा होते हैं. मेरा मानना है कि इस तरह के मेलजोल में ऐसी चीजों पर चर्चा करने की गुंजाइश बनती है जिन पर कहीं और चर्चा नहीं हो सकती है.

इसी वजह से इस तरह के लिटफेस्ट्स के कई सबसे बड़े इवेंट्स का किताबों या लेखकों से कोई लेना-देना नहीं होता, बल्कि ये मौजूदा घटनाओं और समाज के बदलते व्यवहार से जुड़े होते हैं. जिस एक पैनल का इस हफ्ते मैं हिस्सा था उसमें फेक न्यूज पर बात हुई. यह एक ऐसी चीज है जिसे हम दो अलग-अलग तरीकों से देख सकते हैं. पहला तरीका ऐसा है जिस तरह से इसे यूएस प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप समझते हैं. उनका न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंग्टन पोस्ट और सीएनएन जैसी मेनस्ट्रीम मीडिया को देखने का नजरिया है और उनको लेकर दिए गए संदर्भ हैं.

पेड न्यूज़ से अलग है फेक न्यूज़ का ढंग

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बकाया दुनिया, खासतौर पर ग्लोबल जर्नलिस्ट्स के लिए ये न्यूजपेपर्स और चैनल्स प्रतिष्ठित हैं और उनकी विश्वसनीयता है, लेकिन ट्रंप के लिए ये फेक न्यूज पैदा करते हैं क्योंकि ये अक्सर उनकी आलोचना वाली न्यूज छापते या दिखाते हैं. फेक न्यूज को बताने का दूसरा तरीका ऐसा मैटेरियल है जो कि गलत इरादों से खासतौर पर सोशल मीडिया के जरिए पेश किया जाता है, यह झूठ का पुलिंदा होता है और फर्जी तरीके से गढ़ा गया होता है.

इसका एक उदाहरण एक फोटोग्राफ है जिसमें दुनिया के एक हिस्से में जारी हिंसा दिखाई गई है और इसे दुनिया के दूसरे हिस्से में होता बताया गया है. या यह तथ्यों के सेट को किसी स्थिति या किसी शख्स के प्रोफाइल के विश्लेषण के तौर पर दिखाया जाता है, लेकिन ये तथ्य सही नहीं होते और पूरी तरह से फर्जी होते हैं. यह सब सामग्री हमें व्हॉट्सएप और इसी तरह से हासिल होती है. मैं इसमें और ज्यादा नहीं जाना चाहता.

जिस पैनल में मैं था उसमें अहमदाबाद से ऑल्टन्यूज.इन के एडिटर भी शामिल थे। उनकी वेबसाइट गलत मकसद से फैलाई जा रही झूठी सामग्री को देखती है और बताती है कि यह सामग्री वास्तविक है या फर्जी है. इसने बेहद अच्छा काम किया है. खासतौर पर इसने फर्जी खबरों का खुलासा किया है जिससे गलत और झूठी खबरों के सहारे लोगों के ध्रुवीकरण को रोकने में मदद मिली है. इसी तरह की एक फर्जी खबर बच्चों का किडनैप करने वालों से जुड़ी हुई थी. पिछले साल मई में झारखंड में फैली इस अफवाह के चलते सात लोगों को पीट-पीटकर मार डाला गया.

उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण आंकड़े बताए, जैसे कि भारत में डेटा की खपत गुजरे कुछ सालों में पांच गुने से भी ज्यादा बढ़ी है. इससे पता चलता है कि काफी लोगों के पास स्मार्टफोन आ गए हैं और इससे व्हॉट्सएप फॉरवर्ड्स भी वक्त के साथ बढ़े हैं.

सवाल जो पूछे जाने चाहिए

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मीडिया बड़े पैमाने पर बंटा हुआ है. इसका मतलब यह है कि ज्यादा बड़ी तादाद में इंडिपेंडेंट, छोटे संस्थान और इंडीविजुअल्स पब्लिशर्स बन गए हैं. ऐसे में भारतीयों की इस तरह के और ज्यादा ऑथेंटिकेशन जरियों तक पहुंच होना जरूरी हो गया है. हालांकि, मेरी चिंता यह है कि फर्जी खबरों का ज्यादा होना समस्या नहीं है, बल्कि समस्या असली खबरों में दिलचस्पी का अभाव है.

मिसाल के तौर पर, हम रक्षा पर स्वास्थ्य के मुकाबले 10 गुना ज्यादा खर्च करते हैं. यह आंकड़ा 4 लाख करोड़ बनाम 40,000 करोड़ रुपये का है. यह कोई हालिया घटनाक्रम नहीं है. हमने हमेशा से नए टैंक और जहाज खरीदने पर हॉस्पिटलों, डॉक्टरों और दवाइयों से ज्यादा पैसा बहाया है. सभी सरकारों ने ऐसा ही किया है और कोई पार्टी इसका विरोध नहीं करती है.

इस साल 2018 में, नॉर्थ ईस्ट में आंतरिक सुरक्षा के लिए सेना को तैनात किए जाने के 60 साल हो रहे हैं. क्या हमें नहीं पूछना चाहिए कि क्यों भारतीय नागरिकों को इतने लंबे वक्त के लिए सैन्य शासन के अधीन रखा गया है? साफ-साफ कहना होगा कि किसी भी आबादी को जो कि आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत जीवन गुजार रही है वह सैन्य शासन के अधीन रहना ही है. लेकिन, यह एक ऐसी चीज है जिस पर न तो कोई पॉलिटिकल पार्टी कोई दिलचस्पी दिखाती है, न ही ऐसे लोग जो कि पूर्वोत्तर से नहीं हैं.

तीसरा उदाहरण बिलकुल हालिया है. देश में ऐसी पार्टी का शासन है जो कि राष्ट्रवाद के लिए खड़े होने का दावा करती है, लेकिन यह एक किस्म का राजनीतिक रंगभेद अपनाती है. जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का शासन है, वहां इसके मुस्लिम एमएलए की संख्या पर जरा नजर डालिए. गुजरात में शून्य, उत्तर प्रदेश में शून्य, महाराष्ट्र में शून्य, मध्य प्रदेश में शून्य, छत्तीसगढ़ में शून्य, झारखंड में शून्य.

धार्मिक आधार पर भारतीयों का यह विभाजन हमारे सामने हो रहा है, लेकिन इसकी उपेक्षा की जा रही है और इसकी चर्चा नहीं हो रही है. यह एक खबर क्यों नहीं है? ऐसा इस वजह से हो रहा है क्योंकि विरोध के स्वरों की सुनवाई नहीं हो रही है और ऐसे शब्द केवल लिटफेस्ट जैसे मेलजोल में ही उठाए जाते हैं.

ट्रंप और वेस्ट के लिए, फेक न्यूज की समस्या अहम नहीं है, मतलब यह कि हमारे यहां जितना असर रखने वाली नहीं है. फेक न्यूज के चलते भारत में आपकी हत्या तक हो सकती है. हालांकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि फेक न्यूज के पूरे तौर पर नदारद रहने के बावजूद भी हमारी समस्या कायम रहेगी.

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