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फेसबुक, फेमिनिज्म और बहस मुबाहसे

महिला और दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाली नई पीढ़ी सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से मुखर है

Updated On: Dec 25, 2016 06:14 PM IST

Krishna Kant

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फेसबुक, फेमिनिज्म और बहस मुबाहसे

जिस विचार का समय आ गया हो, उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती. -विक्टर ह्यूगो

बात की स्वीकार्यता के लिए जरूरी है कि बात हो और बार बार हो. महिला और दलित वर्ग से ताल्लुक रखने वाली नई पीढ़ी जबरदस्त तरीके से मुखर है और उसे यह स्पेस दिया है सोशल मीडिया ने. एक पूरी पीढ़ी अगर अपने साथ होने वाले भेदभाव और अन्याय को पुरजोर तरीके से कह रही है तो जाहिर है कि स्थिति बदलनी ही है.

मशहूर कथाकार और हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा कि उनको 'इंद्रप्रस्थ भारती' पत्रिका निकालने में फेसबुक से बहुत मदद मिलती है. इंद्रप्रस्थ भारती हिंदी अकादमी की पत्रिका है.

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मैत्रेयी पुष्पा का कहना है कि फेसबुक पर आम लोग भी बेहद अच्छा लिखते हैं. कई अच्छे लेखक हैं, अच्छी लेखिकाएं हैं. इसमें से बेहतर के चुनाव और बदतर की छंटनी करने की समझ हो तो आपका अनुभव बेहद अच्छा हो सकता है.

सोशल मीडिया आम लोग, छात्र, छात्राएं, अध्यापक या तमाम अन्य पेशों से जुड़े लोगों के लिए अभिव्यक्ति का जबरदस्त माध्यम बनकर उभरा है. खासकर स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के लिए फेसबुक ने ऐसी जगह उपलब्ध कराई है जो कहीं और संभव नहीं थी.

पिछले तीन चार सालों में फेसबुक ने लेखन और विमर्श का माहौल एकदम से बदल दिया है. महिलाओं की नई पीढ़ी फेसबुक पर न सिर्फ सक्रिय है, बल्कि वह अपने तमाम तीखे सवालों के साथ मुखर है.

कई युवा लेखिकाएं लगातार महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर धारदार लेखन कर रही हैं. यह तय है कि अगर फेसबुक जैसा सहज माध्यम नहीं होता तो इनका लेखन भी शायद सामने नहीं आता.

गीता यथार्थ

गीता एक पढ़ी लिखी, नौकरीशुदा जागरूक महिला हैं. वे बेहद अच्छा लिखती हैं. वे बहुत संवेदनशील मां भी हैं. बावजूद इसके उनको ससुराल पक्ष से प्रताड़ित किया गया. इस प्रताड़ना की कलई भी उन्होंने फेसबुक पर ही खोली.

एक पोस्ट में वे लिखती हैं, 'लड़कियां, लड़कियों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं. क्योंकि सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी पितृसत्ता की वाहक होती हैं. (सबसे बड़ी या छोटी ये आप डिसाइड करे. हालांकि मैं भी इसकी भुक्तभोगी रही हूं). और... औरत का औरत के लिए बुरा होना, नई बात नहीं है. लेकिन इसमें कौन सी सत्ता जिम्मेदार है, इसको समझना जरूरी है. औरत, औरत के लिए बुरी होकर, महिला सत्ता तो कायम नहीं कर रही!'

अर्चना गौतम

अर्चना गौतम डीयू की छात्रा हैं. उनकी राजनीति और सामाजिक न्याय पर बहुत गहरी समझ है. राजनीतिक दलों, घटनाओं, सरकारी नीतियों और तमाम राजनीतिक मसलों पर वे बहुत धारदार लिखती हैं.

हाल ही में अर्चना गौतम ने अपनी एक पोस्ट में लिखा, 'कई सारी नारीवादी साइट्स को गुलाबी रंगों में रंगे देखा. नारीवाद का गुलाबी रंग से रिश्ता है, समझ नहीं आया! पुरुषवादी बाजारवादी आधुनिकता ने औरत और पुरुष को अलग-अलग रंगों में विभाजित कर दिया है. पुरुषों को नीला रंग दे दिया और औरतों को गुलाबी रंग थमा दिया. अपने फायदे के लिए और नारीवादियों ने बेझिझक अपना लिया! मेरे ख्याल से स्त्री हो या पुरुष उसको कभी भी कोई भी रंग पसंद आ सकता है.'

प्रीति कुसुम

प्रीति कुसुम लगातार महिलाओं, दलितों, मुसलमानों आदि के मसले पर लिखती हैं. हाल ही में उन्होंने नकाब प्रथा और धर्म के बहाने महिलाओं के शोषण पर एक धारदार पोस्ट लिखी. एक मुस्लिम सहकर्मी के साथ हुई बातचीत को साझा करते हुए उन्होंने लिखा, 'नोटबंदी से शुरू हुई चर्चा में मैंने जानबूझ कर बुर्के की बात छेड़ी. उसका कहना था कि 'मेरी बीवी नहीं पहनती पर मैं हिजाब का हिमायती हूं क्योंकि ऐसा क़ुरान में लिखा है. औरत को मर्द के लिए बनाया गया है वो मर्द की बराबरी कर ही नहीं सकती!'

उसने कुरान पढ़ा नहीं था. प्रीति का जवाब था कि 'तुमने क़ुरान नहीं पढ़ी, तुम वो रट रहे जो बचपन से तुम्हें रटाया गया. हालांकि, उस आदमी का मानना था कि 'औरतों के पास दिमाग कहां होता है?' वह ऐसा सोचता है क्योंकि उसके यहां एक भी लड़की पढ़ने या काम करने नहीं जाती. प्रीति ने उसे लड़के और लड़की को बराबर अवसर देने, पढ़ाने और काम पर जाने देने की सलाह दी.

वे आगे लिखती हैं कि 'लड़कियों को फैशन पिलाया जाता है...पूरी दुनिया में... उन्हें बेहोश रखने के लिए, अपने फायदे के लिए. अपने यहां तो बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है अच्छी बहू और बीवी बनने की. जब बोया बबूल तो आम कहां से होय!'

मेघा मैत्रेयी

मेघा मैत्रेयी मनोविज्ञान की पढ़ाई कर रही हैं. वे आजकल लड़कियों को प्रेम, रिश्ते और परिवार वगैरह के कारण उपजे अवसाद से निपटने के तरीके बता रही हैं. वे लड़कियों को समझाती हैं कि किसी भी कीमत पर अपना बेशकीमती समय और उर्जा बर्बाद करने की जगह खुद को बचाने और मजबूत बनने पर ध्यान दें.

मेघा की ताजा पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'हमारे समाज की बनावट कुछ ऐसी है कि परिवार का नाम लड़के भी उठाते-डुबाते हैं, पर जब 'घर की इज्जत' का टेंडर निकलता है तो मुख्य दावेदार हम लड़कियों को ही माना जाता है (बिना हम से पूछे). इसके कई प्रभाव हैं पर मैं यहां एक बात पर फोकस करूंगी- ब्लैकमेल.'

वे आगे लिखती हैं, 'आपने अपने जीवन में कई घटनाएं पढ़ी-सुनी होंगी जब किसी पुराने आशिक की ब्लैकमेलिंग से तंग आकर लड़की जान तक दे देती है. आप ऐसी कुछ घटनाओं के साक्षी भी रहे होंगे. जब कोई दो व्यक्ति रिलेशनशिप में होते हैं तो हर जोड़े के बीच बहुत संवेदनशील बातों, तस्वीरों की अदला-बदली होती है. पर जिस पार्टनर पर आपने भरोसा किया वह हद दर्जे का लुच्चा निकला तो? ऐसे में जिंदगी अचानक नर्क से बदतर लगने लगती है.'

फिर वे समझाते हुए लिखती हैं कि आप अगर ऐसे किसी दौर से गुजर रही हों तो अपना जीवन खत्म करने की जगह लोगों की मदद लें, शर्म न करें, इस बात से न डरें कि आपका नाम सामने आने पर आप जिएंगी कैसे? परिवार की इज्जत का ठेका सिर्फ आपके पास नहीं हैं. उनकी सलाहियत में तमाम नियम कानून ध्वस्त होते हैं. क्योंकि पुराने ढर्रे को तोड़े बगैर नया ढर्रा बन पाना मुमकिन नहीं है.

अनीता मिश्रा

फेसबुक पर सक्रिय अनीता मिश्रा अखबारों के लिए लेखन करती हैं. सामाजिक-राजनीतिक मसलों पर बेहद साफ समझ रखती हैं. उनके लेखन में व्यंग्य भी है, तीखे सवाल भी हैं. हाल ही में उन्होंने लड़कियों की व्यथा और मॉरल पोलिसिंग से जुड़ी एक कहानी लिखी.

कहानी यूं है- 'हमारे पुराने मोहल्ले में एक बाजपेयी चचा हुआ करते थे. चचा चश्मा चढ़ाए कुर्सी डालकर चबूतरे में पेपर लेकर बैठ जाते थे. पेपर हाथ में महज पकड़े होते. पेपर में झुकी आंखें चश्मे के पीछे से आती–जाती लड़कियों को ताकतीं (बुरी नजर से नहीं). बस चचा की हॉबी थी मोहल्ले भर की लड़कियों की फाइल मेनटेन करना. कौन कितने बजे आई, कितने बजे गई, कैसे कपड़े पहने थी,चेहरे पर क्या हाव–भाव था. फिर चटखारे लेकर सबको बताना. यानी चचा फ्री का चरित्र प्रमाणपत्र बांटते.'

वे आगे लिखती हैं कि 'हम लड़कियां लेट होतीं या मॉडर्न कपड़े पहनतीं तो तनाव में आ जाती थीं चचा के सामने से गुजरते हुए. भला हो चचा की लड़की चुन्नी दीदी का जिन्होंने भागकर दूसरी जाति के लड़के से शादी की. तब जाकर मोहल्ले की लड़कियों को राहत मिली. तो दूसरों की जिंदगी में नाक घुसाना हमारा नेशनल करेक्टर है. इससे बाज नहीं आना चाहिए. किसने किससे इश्क किया, किससे शादी की, क्यों तलाक लिया, बच्चों का क्या नाम रखा, सबमें अपनी इंडियन नाक घुसाते रहिए, जब तक अपने घर वाले नाक ना मरोड़ें तब तक बाजपेयी चचा बने रहिए.'

जिस सोशल मीडिया पर लिखने के लिए समय समय पर कई लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिस सोशल मीडिया को अक्सर प्रतिबंधित या नियंत्रित करने की बात होती है, क्या वह गंभीर बहसों का अड्डा भी हो सकता है? जवाब है हां.

(यह सीरीज जारी रहेगी.)

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