S M L

EXCLUSIVE: माओवादी टेरर फंडिंग खत्म करने के लिए सुरक्षा एजेंसियां चला रही है मिशन

फ़र्स्टपोस्ट के हाथ वह डोज़ियर लगा है जो देश के खिलाफ अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए ‘टेरर फंड’ के इंतज़ाम को रोकने के लिए तैयार किया गया है

Updated On: Jun 28, 2018 01:55 PM IST

Yatish Yadav

0
EXCLUSIVE: माओवादी टेरर फंडिंग खत्म करने के लिए सुरक्षा एजेंसियां चला रही है मिशन

2016 में प्रधानमंत्री के नोटबंदी के फैसले के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने माओवादी नेता रोहित के खिलाफ एक ऑपरेशन चलाया था. इस मामले की केस संख्या 185/2016 और मेमोरैंडम संख्या '3208/Ops' के तहत इस ऑपरेशन को मंजूरी मिली थी. इसके तहत सुरक्षा एजेंसियों ने 25 लाख रुपए ज़ब्त किए थे, जो आतंकी घटनाओं को बढ़ावा देने के लिए आगे भेजे जा रहे थे.

21 नवंबर 2016 को सुरक्षा एजेंसियों का पहला ऑपरेशन हुआ था और ताज़ा अभियान बीती 12 अप्रैल को हुआ. इस दौरान सुरक्षा बलों ने ऐसे सैकड़ों ऑपरेशन किए, जिसके तहत आंतंकी घटनाओं को अंजाम देने वाले ‘टेरर फंड‘ के स्रोतों की पहचान की गई और बहुत तेज़ी से वामपंथी उग्रवादियों को मिलने वाले पैसों पर रोक लगाने के लिए प्रभावी कार्रवाई की गई. इन पैसों का इस्तेमाल माओवादी, आतंकी हमलों को अंजाम देने में करते थे.

सुरक्षा एजेंसियों ने किया है गंभीर अध्ययन

फ़र्स्टपोस्ट के हाथ वह डोज़ियर लगा है जो देश के खिलाफ अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए ‘टेरर फंड’ के इंतज़ाम को रोकने के काम में लगी सुरक्षा एजेंसियों को लेकर तैयार किया गया है. इस काम में लगी देश की सुरक्षा संस्थाओं ने आतंकी गुटों के ढांचे, बड़े नक्सल कमांडरों की गतिविधियों, उनको मदद करने वाले तंत्र की बनावट, नक्सल प्रभावी इलाकों में उनके नेटवर्क और शहरी इलाकों में उनके असर का गंभीर अध्ययन किया.

उन्होंने छोटे आतंकी गुटों को पहुंचाए जाने वाले फंड को रोकने में पूरा दम लगा दिया. नतीजतन, फ़र्स्टपोस्ट को मिली जानकारी के मुताबिक, 9 बेहद गोपनीय ढंग से चलाए गए अभियानों से 8 करोड़ रुपए ज़ब्त किए गए, जो माओवादी आतंकियों की मदद के लिए उनके इलाकों में भेजे जा रहे थे. इन अभियानों के निशाने पर सीपीआई (माओवादी) के सीएमसी यानी सेंट्रल मिलिटरी कमीशन के बड़े पदाधिकारी और कमांडर थे. इसी धड़े के पास, नक्सलियों के लिए हथियार बनाने, उनकी सप्लाई, मिलिटरी ट्रेनिंग, आतंकियों की भर्ती और गुरिल्ला हमलों के लिए बजट बनाने की जिम्मेदारी है.

इस धड़े की क्षेत्रीय कमेटियों के सदस्यों के खिलाफ स्थानीय पुलिस की मदद से करीब 10 मामलों में कार्रवाई की जा रही है. इनमें से कुछ फंड कलेक्शन मैनेजर का तरह काम करते हैं और इनकी मदद के लिए एक आदमी ऐसा होता है जो हथियारों और विस्फोटकों का इंतज़ाम करने के लिए राज्यों के मिलिटरी कमीशन से संपर्क में रहता है. यही व्यक्ति हथियारों के भंडार की भी देखरेख करता है. इस डोज़ियर के मुताबिक करीब 13 ऐसे मामले पकड़ में आए , जिसमें दस लाख से ज़्यादा धन का इस्तेमाल हुआ था. इन सभी मामलों की जांच जारी है. पांच मामलों में तो जांच की जरूरी प्रक्रिया पूरी भी हो चुकी है.

रीजनल कमांड सेंटर्स को बनाया गया निशाना

चूंकि नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबलों के अभियानों का मुकाबला करने के लिए 2007 में ही माओवादियों ने क्षेत्रीय इलाकों में कमांड तैयार कर लिए थे, सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर वे आतंकी थे, जो क्षेत्रीय कमांड सेंटर्स को चलाते हैं. ऐसा इसलिए कि इससे उन्हें रसद की आपूर्ति काटने में मदद मिल सके. निशाने पर सीपीआई (माओवादी) का नुनुचंद उर्फ गांधी नाम का आतंकी भी था जो झारखंड में एरिया कमांडर था. एजेंसियों ने आदेश संख्या ‘1202/Ops’ के तहत 21 अप्रैल 2017 को उसकी चल-अचल संपत्ति भी ज़ब्त की. ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा. इसके तुरंत बाद 12 मई को सीपीआई (माओवादी) के सब-जोनल कमांडर रणविजय उर्फ नेपाल महतो को भी निशाने पर लिया गया. इसके खिलाफ ऑपरेशन फिलहाल जारी है. तेलंगाना में निशाने पर सत्या रेड्डी था, जो इलाके का दबंग था. सुरक्षा एजेंसियों ने उसके खिलाफ भी 30 अगस्त 2017 को एफआईआर संख्या ‘180/2017’ के तहत कार्रवाई शुरू कर दी.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

मेमोरंडम संख्या ‘2779/Ops’ के तहत 1 सितंबर 2017 को उसके फंड नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ऑपरेशन चलाया गया और 25 लाख रुपए ज़ब्त किए गए. इसके तीन हफ्तों के बाद मोस्ट वांटेड माओवादी जोनल कमांडर कुंदन और उसके साथी नक्सलवादी मनोज कुमार के खिलाफ भी अभियान चलाया गया. सूत्रों के मुताबिक इन दोनों मामलों में आतंक के लिए फंड मुहैया कराने के पूरे नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया और काफी चल-अचल संपत्ति ज़ब्त करने काम भी पूरा कर लिया गया है.

क्षेत्रीय कमांडर आईईडी धमाकों को अंजाम देते हैं, जिससे सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाया जा सके और इस काम के लिए उन्हें ज़्यादा पैसों की ज़रूरत भी नहीं होती. इस स्तर पर कमांडरों के नेटवर्क के खात्मे से सुरक्षा बलों के खिलाफ आईईडी धमाकों में खासी कमी आई.सुरक्षा बलों के एक बड़े अधिकारी ने बताया कि मोस्ट वांटेड नक्सलियों को फंड मुहैया करवाने वालों के खिलाफ भी ऐसे अभियान चलाए जा रहे हैं.

2016 के मुकाबले इस साल कम हुए हैं हमले

फरवरी और मार्च 2018 में दो ऐसे ऑपरेशंस चलाए गए थे, जिनके तहत फंड नेटवर्क और ज़मीनों में निवेश तो पकड़ा ही गया, बैंकों में रखे गए पैसे भी ज़ब्त किए गए. इन सब कोशिशों के नतीजे भी सामने आ रहे हैं. गृह मंत्रालय के एक अध्ययन के मुताबिक 2013 के मुकाबले 2017 में नक्सली हमलों में 20 फीसदी कमी आई और मारे जाने वालों की संख्या में 33 फीसदी की कमी आई है. इसी तरह 2016 के मुकाबले 2017 में हमलों में 13.4 फीसदी की कमी आई और मौतों में 5.4 फीसदी की कमी आई है. माओवादी हमलों से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ रहा, जबकि उसके बाद झारखंड, बिहार, ओडिशा और महाराष्ट्र में इस आतंक का असर देखा गया. 2017 में कुल 908 वारदातें सामने आईं और इनमें 263 लोगों की जानें गईं.

तृतीया प्रसूति कमेटी जैसे सीपीआई (माओवादी) के स्प्लिंटर गुट भी सुरक्षा बलों के निशाने पर हैं. इसका गठन झारखंड में 2002 में हुआ था और माना जाता है कि इसका संबंध झारखंड लिबरेशन टाइगर्स से है. ये संगठन झारखंड से शुरू हुआ और बाद में इसका असर बंगाल के इलाकों में भी देखा गया. उन इलाकों में काम करने वाले ठेकेदारों से पैसा वसूली ही इनकी कमाई का ज़रिया बना. तृतीया प्रसूति कमेटी यानी टीपीसी के खिलाफ 17 अप्रैल 2017 से करीब 6 अभियान चलाए गए.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

टीपीसी सदस्य कमलेश गंजू के खिलाफ शुरू किए गए पहले मामले में 36 लाख रूपए ज़ब्त किए गए. अगस्त 2017 में ऐसे ही एक और ऑपरेशन में 60 लाख रूपए की संपत्ति ज़ब्त की गई.

सुरक्षा अधिकारी ने आगे बताया कि 'खुफिया एजेंसियों समेत कई एजेंसियों के एक-दूसरे के साथ मिलकर चलाए गए अभियानों की कोशिश ये है कि फंडिंग मुहैया करवाने वालों तक माओवादियों की पहुंच हो ही न पाए और भूमिगत हो कर काम करने वाले माओवादी काडर और स्लीपर सेल, हमारी व्यवस्था के कमज़ोर पक्षों का फायदा न उठा पाएं. आतंक के लिए मुहैया कराए जाने वाले फंड की पहचान करने में हमारे खुफिया सूत्र बढ़िया काम कर रहे हैं और योजनाएं कारगर साबित हुई हैं.'

माओवादियों के आतंक के मुकाबले के लिए गृहमंत्रालय ने खुफिया तंत्र को और मजबूत किया है. इसके तहत केंद्रीय और राज्य स्तर पर खुफिया एजेंसियों की क्षमता बढ़ाना भी है. गृहमंत्रालय ने ‘रियल टाइम इंटेलिजेंस’ यानी खुफिया सूचनाओं में तेज़ी लाने के लिए जगदलपुर और गया में एक संयुक्त कमांड और कंट्रोल सेंट्रल भी गठित किया है.

गृह मंत्रालय के मुताबिक, 'माओवादियों की वसूली तो जारी रही, लेकिन नोटबंदी ने उनकी फंडिंग पर बहुत करारा वार किया. अब जबकि ज़्यादातर राज्यों में माओवादी बैकफुट पर दिखाई दे रहे हैं, यही वो वक्त है जब इस नासूर को हमें हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए.'

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Ganesh Chaturthi 2018: आपके कष्टों को मिटाने आ रहे हैं विघ्नहर्ता
Firstpost Hindi