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एक्सक्लूसिव: पीएनबी घोटाला- क्या अपनी गर्दन बचाने के लिए विक्टिम कार्ड खेल रहा है पीएनबी 

सरकारी बैंक पीएनबी को चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के ऊपर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है.

Yatish Yadav Updated On: May 28, 2018 10:39 PM IST

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एक्सक्लूसिव:  पीएनबी घोटाला- क्या अपनी गर्दन बचाने के लिए विक्टिम कार्ड खेल रहा है पीएनबी 

सरकारी बैंक पीएनबी को चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के ऊपर जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है. पिछले दो सप्ताह में इस मामले की जांच ने रफ्तार पकड़ी है. इधर पंजाब नेशनल बैंक भी आंतरिक जांच के सहारे इस बात को जानने की कोशिश में जुटा हुआ है कि कहीं उसके घर में और गड़बड़ी तो नहीं है.

पीएनबी को नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने 14 हजार करोड़ रुपए का चूना लगाया है. लेकिन इस मामले में जांच एजेंसियां जो खुलासे कर रही हैं उनके मुताबिक खुद उस बैंक के कई अधिकारी संदेह के घेरे में हैं. सीबीआई ने बैंक के कुछ बड़े अधिकारियों पर इस घोटाले की जानकारी होने का आरोप लगाया है. सीबीआई को जो अभी नवीनतम सुबूत मिले हैं उनके मुताबिक बैंक का इस घोटाले से पीड़ित होने का दावा ध्वस्त होता प्रतीत हो रहा है.

देश के सरकारी बैंकों में सबसे बड़ी जालसाजी की घटनाओं में से एक पीएनबी मामले में बैंक निश्चित रूप से पीड़ित नहीं है. सीबीआई के मुताबिक दरअसल बैंक के बड़े अधिकारियों को अच्छी तरह से पता था कि उनके मुंबई के ब्रैडी हाउस ब्रांच में क्या गोरखधंधा चल रहा है. इतना ही नहीं उन अधिकारियों को बैंक की दो विदेशी शाखाओं, हॉन्गकांग और दुबई शाखा में क्या खेल खेला जा रहा है उसकी भी पूरी जानकारी थी.

जब ये घोटाला उजागर हुआ तो पंजाब नेशनल बैंक ने बड़ी चालाकी से घोटाले का पूरा आरोप विदेशी शाखाओं पर लगा दिया. बैंक ने विदेशी शाखाओं पर निशाना साधते हुए कहा था कि संदेह होने के बावजूद विदेशी शाखाओं ने इस मामले को रिपोर्ट नहीं किया था. लेकिन एक सनसनीखेज खुलासे में इस बात का पता चला है कि पीएनबी की दुबई और हॉन्गकांग शाखा  एक जटिल आर्थिक घोटाले में लगी हुई थी. इस मामले की जांच कर रहे जांचकर्ताओं को कुछ ऐसे सुबूत मिले हैं जिससे इस बात का पता चलता है कि हॉन्गकांग और दुबई शाखा जिस गोरखधंधे में जुटे हुए थे उसकी जानकारी पूरी तरह से बड़े अधिकारियों को थी.

फ़र्स्टपोस्ट को इस संबंध में मिली एक्सक्लूसिव जानकारी यहां है- 18 अगस्त 2011 को पीएनबी की ब्रैडी हाउस ब्रांच ने 1.4 मिलियन डॉलर का बॉयर्स क्रेडिट पीएनबी की दुबई ब्रांच (506844, दुबई,एई,संयुक्त अरब अमीरात) को किया. कट और पॉलिश्ड डायमंड्स के आयातक और निर्यातक दोनों नीरव मोदी ग्रुप के ही थे. फायरस्टार डायमंड लिमिटेड,सूरत और फायरस्टार डायमंड इंक,यूएस. उस दिन शाम में 16:49 पर पीएनबी दुबई को एक स्विफ्ट संदेश भेजा गया था जिसमें लिखा हुआ था कि कृपया 1,499,735 डॉलर्स के बॉयर्स क्रेडिट को उपर्युक्त आयात लेनदेन के लिए 71 दिनों के लिए विस्तारित करें और उस रकम को हमारे डायचे बैंक ट्रस्ट कंपनी,न्यूयार्क (स्विफ्ट कोड BKTRUS33) के नोस्त्रो अकाउंट में क्रेडिट कर दें.

Nirav Modi

इसमें साफ साफ लिखा हुआ था, 'हम,पंजाब नेशनल बैंक मुंबई, बिना शर्त के इस बात के लिए तैयार हैं कि हम 06M LIBOR और 200 BPS के अंतर्गत इस बायर्स क्रेडिट के लिए निर्धारित भुगतान तिथि 1 नवंबर 2011 के आपके द्वारा तय किए हुए अकाउंट में मूलधन और ब्याज समेत पूरी राशि का भुगतान करेंगे. हम इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि अगर नियत समय तक या मैच्युरिटी की तारीख तक बायर्स क्रेडिट का भुगतान नहीं हुआ तो हम दो फीसदी की दर से दंडात्मक ब्याज का भी भुगतान करेंगे. हम इस बात कि पुष्टि करते हैं कि पूर्व कथित बायर्स क्रेडिट अग्रिम इंपोर्ट पेमेंट के विरुद्ध नहीं है. हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि ये आवेदक मेरी शाखा का उपभोक्ता है और हमने इस कस्टमर कर नो योर कस्टमर के अंतर्गत वेरीफिकेशन कर लिया है. हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि एलसी के अंतर्गत किया जा रहा ट्रांजेक्शन नियम सम्मत है और इस लेनेदेन से संबंधित सभी जरुरी मंजूरी हमने सक्षम अधिकारियों से एक्सचेंज कानूनों के तहत ले ली है. हम आपको इस बात का भरोसा दिलाना चाहते हैं कि हमारे पास इस इस व्यापार से संबंधित सभी दस्तावेज मौजूद हैं जो कि आपको आपकी जरुरत के मुताबिक उपलब्ध कराए जा सकते हैं.'

पीएनबी जो अभी तक जांचकर्ताओं के सामने इस बात की ढ़पली लगातार बजा रही थी कि किसी भी भारतीय बैंक की विदेशी शाखा ने इस संबंध में सचेत नहीं किया,वो खुद कटघरे में खड़ी है. वो इस सवाल पर चुप्पी साध कर बैठी हैं कि क्या पीएनबी की दुबई शाखा ने 18 अगस्त 2011 के बायर्स क्रेडिट को लेकर किसी तरह की पूछताछ की थी की नहीं? अगर उन्होंने पूछताछ की थी तो फिर ये घोटाला अगले सात साल तक जारी कैसे रहा?

हमने इस संबंध में पीएनबी के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील मेहता को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी लेकिन उन्होंने उसका उत्तर नहीं दिया.

इसी तरह के एक और मामले में 1.9 मिलियन डॉलर का बायर्स क्रेडिट पीएनबी के हांगकांग शाखा को 12 अक्टूबर 2011 को जारी किया गया. कट और पॉलिश्ड डायमंड्स की आयातक और निर्यातक दो कंपनियां थी,डायमंड आर यूएस और ए जाफे इंक.

यहां भी दोनों कंपनियां नीरव मोदी के मालिकाना हक वाली ही थी. इसके लिए जारी किए गए स्विफ्ट मैसेज में कहा गया था, 'बायर्स क्रेडिट रकम की अदायगी वाले दिन से 82 दिनों के लिए अपेक्षित है. इस बायर्स क्रेडिट की व्यवस्था मेरी पार्टी डायमंडस आर यूएस की तरफ से की गयी है जिसको आप विस्तारित कर रहे हैं'.

इन सबके बावजूद पीएनबी की हॉन्गकांग शाखा ने किसी तरह की चेतावनी क्यों नहीं जारी की ये एक बड़ा सवाल है? पीएनबी ने सीधे तौर पर इस बड़े घोटाले की पूरी जिम्मेदारी दूसरे बैंक पर सरकाते हुए खुद हाथ झाड़ लिया. पीएनबी की पहली आंतरिक जांच रिपोर्ट 6 अधिकारियों ने मिलकर तैयार की थी.

इस जांच रिपोर्ट को बैंक के दिल्ली हेड ऑफिस की फ्रॉड रिस्क मैनेजमेंट डिवीजन को 12 फरवरी 2018 को भेजा गया था जिसमें लिखा था, 'इन बैंको ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गाइडलाइंस की अनदेखी करते हुए कभी भी किसी भी तरह की कोई चेतावनी नहीं जारी कि और फर्जी एलओयू के आधार पर दोषी कंपनियों को फंडिंग जारी रखी' पीएनबी की आंतरिक जांच रिपोर्ट की फ़र्स्टपोस्ट ने भी समीक्षा की और पाया कि इस रिपोर्ट में दूसरे बैंकों पर जमकर निशाना साधा गया था.

इस रिपोर्ट में लिखा गया था, 'कुछ फर्जी एलओयू में कई गड़बड़ियां थी जैसे एक एलओयू में लिखा हुआ था कि एलसी के अंतर्गत दस्तावेज पूरे नहीं हैं और इसे जमा कराया जा रहा है लेकिन इसी एलओयू में दूसरे पाराग्राफ में ये लिखा हुआ था कि एलसी के अंतर्गत सभी दस्तावेज हम लोगों के द्वारा स्वीकृत कर लिए गए है. मतलब साफ है कि इन बड़ी बड़ी गड़बड़ियों के बावजूद फंड जारी करने वाले बैंक ने इन गलतियों को नजरंदाज किया और इसके बारे में रिपोर्ट नहीं की. इन विदेशी बैंक शाखाओँ के द्वारा कभी भी एलओयू जारी करने वाले बैंक से इसके बारे में जानकारी नहीं मांगी गयी यानि कि दोषी कंपनियों को भुगतान करने वाली विदेशी बैंक शाखाओं ने लापरवाही बरतते हुए गैर जिम्मेदाराना तरीके से उन कंपनियों को भुगतान करना जारी रखा.'

लेकिन आंतरिक जांच रिपोर्ट के 9वें बिंदु में साफ किया गया है कि बैंक की तरफ से सुलह प्रक्रिया को सही तरीके से करने की कोशिश की गयी थी. इससे ये बात स्पष्ट होती है कि पीएनबी अधिकारियों को इन सब घोटालों के बारे में सब कुछ मालूम था. इसमें लिखा गया है, 'नोस्त्रो अकाउंट की कोई भी कोई भी इंट्री ऐसी नहीं है जिसके बारे में सुलह की कोशिश न की गयी हो'.

Mehul Choksi

जांच ऐजेंसियों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, ऐसा मानना संभव ही नहीं है कि केवल 2 अधिकारी लागातर 7-8 साल तक घोटाला करते रहे और किसी की पकड़ में न भी आए. बिना शीर्ष प्रबंधन के जाने बिना ऐसा करना संभव ही नहीं है. इसके अलावा स्विफ्ट मैसेज और पीएनबी के खुद के आंतरिक जांच रिपोर्ट से ये बात साफ हो जाती है कि बैंक का टॉप मैनेजमेंट इस पूरे घटनाक्रम से बिल्कुल भी अनजान नहीं था.

जांचकर्ताओं को मिले सुबूतों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि 2011 से चल रहे इस घोटाले के बारे में बैंक को जानकारी थी लेकिन उसने इस पर कोई कार्रवाई न करके चुप रहना मुनासिब समझा. देश के इस बड़े घोटाले की जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक वो ये पता लगाने की कोशिश कर रहे है कि क्या इस घोटाले के लिए पूरी चेन ही जिम्मेदार तो नहीं है?

नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की चालाकी

नीरव मोदी और उसके अंकल मेहुल चौकसी इस बात से भली भांति वाकिफ थे कि एक न एक दिन उनकी जालसाजी पर से पर्दा उठेगा ही ऐसे में उन्होंने चालाकी से अपने घोटाले से जुड़े सुबूतों को मिटाना शुरू कर दिया और ऐसी चाल चली की इस घोटाले में दूसरे फंसते नजर आएं. जांच एजेंसियां नीरव और चौकसी की इन चालबाजियों की भी जांच कर रही है.

फायरस्टार इंटरनेशनल लिमिटेड के नॉन एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर गौतम मुक्काविली ने सीबीआई को दिए अपने बयान में कहा है कि उसने नीरव मोदी से इस मामले में सीबीआई की तरफ से एफआईआर दर्ज होने के बाद बात की थी. गौतम के मुताबिक नीरव ने उसे भरोसा दिलाया था कि ये केस फायरस्टार के खिलाफ है और वो इस मामले को सुलझाने के लिए पीएनबी के अधिकारियों से बात कर रहा है.

इस घोटाले का खुलासा होने के तुरंत बात गौतम ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. गौतम को कंपनी के बैंक अकाउंट्स को ऑपरेट करने का कोई अधिकार नहीं था और न ही मोदी की कंपनी में किसी तरह के हस्तक्षेप की गुंजाईश थी. गौतम के अप्वायंटमेट लेटर में गौतम से एक तिमाही में केवल 4 से 5 दिनों का कमिटमेंट था. उसी तरह से एक और इंडिपेंडेट डायरेक्टर सुरेश सेनापति, जिन्होंने 5 फरवरी 2018 को फायरस्टार और फायरस्टार डायमंड्स से इस्तीफा दे दिया, उन्हें भी मोदी की कंपनियों के काम काज के बारे में अंधेरे में रखा गया था.

सेनापति ने अपने बयान में कहा कि जैसे ही उन्हें इस घोटाले के बारे में पता चला उन्होंने तुरंत अपने पद से इस्तीफा दे दिया. ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी और उसके अंकल चौकसी 2015-16 में डायमंड इंडस्ट्री के टैलेंटेड लोगों का चयन करके अपने ग्रुप की कंपनियों की इमेज भारतीय बाजार में चमकाना चाहते थे.

नीरव की ही कंपनी में नॉन एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर संजय ऋषि का बयान मजेदार है. ऋषि 2016 में मोदी की कंपनी में आने से पहले बड़ी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर चुके थे. मोदी के साथ उनकी पहली आमने सामने की मुलाकात 12 अक्टूबर 2016 को हुई थी.

ऋषि के मुताबिक उन्हें बताया गया था कि मोदी भारत का पहला लक्जरी ज्वेलरी ब्रांड स्थापित करने को इच्छुक हैं जो कि विदेशी कंपनियों को टक्कर दे सके. इसके लिए वो ऋषि को अपने साथ लाना चाहते थे. जब ऋषि ने सुना कि गौतम मुक्काविली और सेनापति जैसे लोग नीरव की कंपनी से जुड़ रहे हैं तो उन्होंने भी नॉन एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर के रुप में कंपनी से जुड़ने के लिए हामी भर दी और ऋषि ने 6 दिसंबर 2016 को कंपनी ज्वाइन कर लिया.

ये बिल्कुल सही है कि नीरव मोदी ने पूरी योजना तैयार कर रखी थी. नए डायरेक्टर्स को अपनी कंपनी के बोर्ड में शामिल करने से पहले उसने दो लोगों को नियुक्त किया. ओगाधभाई उकाभाई कलसारिया और लालजीभाई बच्चुभाई कलसारिया को नीरव ने अपनी कंपनी डयमंड आर यूएस में पार्टनर नियुक्त किया. ये दोनों भोलेभाले लोग इस कंपनी के ब्रैडी हाउस ब्रांच के अंकाउंट संख्या 176123 के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता बन गए.

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नीरव ने इस पूरी योजना को इस तरह से अंजाम दिया था कि अगर उसका काला कारनामा कभी पकड़ में आया तो भी वो अपनी देनदारियों से इंकार करके भी साफ बच जाएगा. मोदी ने इसी तरह की चाल अपनी एक और कंपनी स्टैलर डायमंड्स में भी रची. 2016 जनवरी में उसने अपनी कंपनी में दो पार्टनर बनाए. मनोजभाई संखत और मोहन लाडुमोर पीएनबी की ब्रैडी हाउस ब्रांच स्थित खाता संख्या 3731002104763593 के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थे. फायरस्टार डायमंड इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को लिए कविता मनकीकर और हेमंत भट्ट अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता बनाए गए.

सूत्रों के मुताबिक नीरव मोदी पूरी योजना के साथ अपने काले कारनामों को अंजाम देता रहा था जिससे कि भविष्य में घोटाले के खुलासे के बाद भी उसपर किसी तरह की आंच न आ सके. नीरव की पूरी योजना का मुख्य ध्येय उसके देश छोड़कर भागने का था. नीरव की कंपनियों को शुरु में बायर्स क्रेडिट की मंजूरी नहीं मिली थी ऐसे में उसने बैंक के शीर्ष अधिकारियों के साथ मिलकर इस घोटाले को अंजाम दिया जो कि खुलासे से पहले साठ सालों निर्बाध गति से चलता रहा.

 

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