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एक्सक्लूसिव- फ़र्स्टपोस्ट के खुलासे के बाद यूपी कोऑपरेटिव बैंक ने बैलेंसशीट में किया हेरफेर

फ़र्स्टपोस्ट के खुलासे के बाद परेशान कोऑपरेटिव बैंक ने अब एक और गोरखधंधे को अंजाम दिया है.

Updated On: Jun 15, 2018 10:32 PM IST

Yatish Yadav

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एक्सक्लूसिव- फ़र्स्टपोस्ट के खुलासे के बाद यूपी कोऑपरेटिव बैंक ने बैलेंसशीट में किया हेरफेर

अभी हाल ही में फ़र्स्टपोस्ट ने खुलासा किया था कि उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक ने किस तरह से नियमों के विरुद्ध जाकर वित्तीय अनियमितता के घिरे हुए सिंभावली ग्रुप को कर्ज दिया और केसर शुगर मिल्स के नॉन परफार्मिंग एसेट्स को लांग टर्म लोन में तब्दील कर दिया था.

इस खुलासे के बाद परेशान कोऑपरेटिव बैंक ने अब एक और गोरखधंधे को अंजाम दिया है. इस बार शीर्ष बैंक प्रबंधन ने अपने बैंक के बैलेंसशीट में ही हेरफेर करके ये दिखा दिया है कि बैंक मुनाफे में चल रहा है और मुनाफे का आलम ये है कि बैंक ने 27 करोड़ रुपए आयकर के रुप में दिए हैं.

फ़र्स्टपोस्ट ने 13 मार्च को अपनी रिपोर्ट में ये भी बताया था कि उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक में किस तरह से नियुक्तियों में भी घोटाला किया गया था. ये पता चला है कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घोटाले पर संज्ञान लेते हुए हाल ही में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) से इसकी जांच कराने का आदेश दिया है.

उत्तर प्रदेश के रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसायटीज एन के सिन्हा ने भी इस मामले में कार्रवाई करते हुए यूपीसीबीएल को सिंभावली ग्रुप को बैंक द्वारा स्वीकृत किए गए 60 करोड़ के लोन को रद्द करने को कहा है. इस मामले की जांच सीबीआई और ईडी कर रही है जिसमें ओरिएंटल बैंक ऑफ कामर्स को 109 करोड़ रुपए का चूना लगाने का मामला शामिल है.

घोटाले पर पर्दा डालने के लिए बैलेंस शीट में किया गया हेरफेर

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नियमों के मुताबिक कोऑपरेटिव बैंकों की गतिविधियों पर संबंधित राज्यों की रजिस्ट्रार ऑफ कोऑपरेटिव सोसायटीज नजर रखती है. इस घोटाले पर पर्दा डालने के लिए जिस तरह से बैलेंस शीट में हेरफेर किया गया है,वो सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है. बैंक के बैलेंसशीट में गड़बड़ी का मतलब है कि बैंक के खजाने में सेंध लगाना और ये गड़बड़ी दीर्घावधि में बैंक के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर सकती है.

फ़र्स्टपोस्ट के पास इस मामले में बैंक की दोनों बैलेंसशीट,ओरिजनल और फर्जी, दोनों की कॉपी है. बैलेंसशीट में 31 मार्च 2018 तक बैंक के एनपीए की वास्तविक स्थिति का ब्यौरा दर्ज है. यूपीसीबीएल की बरेली शाखा के ड्राफ्ट बैलेंसशीट के मुताबिक केसर शुगर मिल्स के ऊपर 74 करोड़ रुपए का कर्ज एनपीए में तब्दील हो चुका है, लेकिन मजेदार बात ये है कि बैंक के शीर्ष प्रबंधन ने इसे अस्वीकार कर गलत तरीके से रकम को सब स्टेंडर्ड लोन कैटेगरी में डाल दिया है जिससे कि फाइनल बैलेंसशीट में बैंक को मुनाफे में दिखाया जा सके.

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सूत्रों के मुताबिक बरेशी शाखा के एक मैनेजर को यूपीसीबीएल के शीर्ष प्रबंधन ने इसलिए निलंबित कर दिया क्योंकि उन्होंने जाली बैलेंसशीट पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया था. सूत्र के अनुसार निलंबन से पहले मैनेजर ने वास्तविक बैलेंसशीट को यूपीसीबी हेडक्वार्टर्स में भेजा था जहां से उन्हें ये आदेश मिला कि वो बैलेंसशीट में फेरबदल करके बैंक को मुनाफे में दिखाने के साथ साथ एनपीए को भी शून्य दिखाएं. उस महिला बैंक अधिकारी ने ऐसा करने से इंकार कर दिया और बदले में उन्हें अपनी ईमानदारी की कीमत निलंबित होकर चुकानी पड़ी.

कई प्रयासों के बावजूद भी यूपीसीबीएल के मैनेजिंग डायरेक्टर आर के सिंह ने किसी भी कॉल और मैसेज का जवाब नहीं दिया. मुख्यमंत्री और रजिस्ट्रार की कड़ी कार्रवाई पता चला है कि 13 मार्च 2018 को फर्स्टपोस्ट के द्वारा इस घोटाले के उजागर करने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी कोऑपरेटिव सोसायटीज के रजिस्ट्रार को 28 मार्च 2018 को एक चिट्ठी लिखी. पत्र में मुख्यमंत्री ने इस घोटाले की जांच रजिस्ट्रार को करने के लिए कहा.

बैंक में बड़े पैमाने पर की गई गड़बड़ियां

इस मामले की प्रारंभिक जांच आरसीएस एन के सिंह ने की जिसमें पता चला कि बैंक में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां की गई हैं. सिंह ने अपनी प्रारंभिक जांच में मिले तथ्यों को यूपी सरकार के कोऑपरेटिव सचिव को 10 मई 2018 को भेज दिया. फ़र्स्टपोस्ट को कोऑपरेटिव सोसायटीज की रेगुलेटरी बॉडी नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंस रुरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) की एक टिप्पणी भी देखने को मिली है जिसमें उसने यूपी कोऑपरेटिव बैंक के उस प्रस्ताव पर अपना विरोध प्रकट किया था जिसमें सिंभावली ग्रुप को लोन देने और केसर शुगर मिल को दिए गए लोन की रीस्ट्रक्चरिंग करने का फैसला किया गया था.

हालांकि नाबार्ड के इस विरोध को यूपीसीबीएल के चीफ आर के सिंह ने नजरंदाज कर दिया था. नाबार्ड के एक अधिकारी ने अपने गोपनीय पत्र में ये साफ कर दिया कि बैंक के दो प्रस्तावों, सिंभावली और केसर ग्रुप से जुड़े मामलों पर नियामक संस्था नाबार्ड के प्रतिनिधि से किसी तरह का कोई विचार विमर्श नहीं हुआ और इस मामले से जुड़े सारे फैसले अकेले एकपक्षीय तरीके से मैनेजिंग डायरेक्टर आर के सिंह ने लिए थे. फर्स़्टपोस्ट ने नाबार्ड के उस पत्र को देखा जिसमें ये स्पष्ट किया गया था कि यूपीसीबीएल के द्वारा उन कंपनियों के संबंध में लिए गए निर्णय पर बैंक के चीफ की स्वीकृति थी.

नाबार्ड के अधिकारी बीएन हेम्ब्रम के हस्ताक्षरित पत्र के अनुसार  'केसर मिल्स को दिए गए 65.81 करोड़ को दिए गए लोन की रीस्ट्रक्चरिंग और सिंभावली पावर को दिए गए 60 करोड़ के ऋण पर बोर्ड मीटिंग में किसी तरह की चर्चा नहीं हुई. हम लोग यूपीसीबीएल के द्वारा लिए गए इन निर्णयों पर असहमति जताते हैं.'

रजिस्ट्रार एन के सिंह ने अपनी जांच के दौरान नाबार्ड के पत्र को भी देखा था. सिंह ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नाबार्ड की आपत्तियों के बाद भी यूपीसीबीएल के मैनेजिंग डायरेक्टर आरके सिंह ने सिंभावली के मालिकों को स्वीकृति पत्र जारी कर दिया जो कि बैंकिंग नियमों की गंभीर अवहेलना है. एन के सिंह ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि 'रजिस्ट्रार ऑफिस ने 27 मार्च को पत्र संख्या 54 के माध्यम से यूपीसीबीएल के चीफ आर के सिंह से इन मामलों पर स्पष्टीकरण मांगा था.आर के सिंह ने इसका जवाब 3 अप्रैल 2018 को पत्र संख्या 1416 के माध्यम से देते हुए लिखा कि इस संबंध में सिंभावली को एक स्वीकृति पत्र जारी किया गया था लेकिन नाबार्ड के आपत्ति जताने के बाद इस प्रस्ताव को 23 मार्च 2018 को लिखे गए पत्र के माध्यम से होल्ड पर रख दिया गया. इससे स्पष्ट होता है कि नाबार्ड की आपत्तियों के बाद भी न केवल सिंभावली को लोन स्वीकृत हुआ बल्कि इस संबंध में उसे पत्र भी जारी कर दिया गया जो कि गैरकानूनी है'.

सिंभावली और केसर शुगर मिल्स लोन के लिए नहीं थे योग्य

आगे की जांच में ये भी पता चला की सिंभावली और केसर शुगर मिल्स लोन के लिए योग्य थे ही नहीं और उनसे संबंधित लोन का पूरा प्रस्ताव अतार्किक था. रजिस्ट्रार एन के सिंह ने अपनी रिपोर्ट 10 मई 2018 को राज्य सरकार को भेज दी थी. इस रिपोर्ट में उन्होंने लिखा है कि, यहां ये जानना जरूरी है कि  यूपी कोऑपरेटिव सेवा मंडल के सदस्य अशोक सिंह जो कि यूपीसीबीएल के मैनेजिंग डायरेक्टर भी रह चुके हैं, उन्होंने अपने बयान में ये खुलासा किया है कि उन्होंने पिछले साल ही यूपीसीबीएल के चीफ आर के सिंह को केसर शुगर मिल्स को मिलने वाले लोन में धांधली को लेकर पत्र लिखा था और बताया था कि किस तरह से इस मामले में नियमों को ताक पर रखकर बैंक ने काम किया है, लेकिन जानकारी देने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई.

अशोक सिंह ने यूपीसीबीएल को कंपनी से ब्याज के साथ 20.40 करोड़ रुपए वसूलने की सलाह भी दी थी. लेकिन उनकी चेतावनियों के बावजूद भी 31 जनवरी को यूपीसीबीएल की बोर्ड मीटिंग में केसर शुगर मिल्स के 65.81 करोड़ रुपए के लोन से संबंधित प्रस्ताव को सहमति दे दी गयी. प्रथम दृष्टया ही यूपीसीबीएल का ये कदम नियमों के विरुद्ध था.

एन के सिंह ने 28 मार्च 2018 को अलग से एक पत्र राज्य के मुख्य सचिव को भी भेजा जिसमें यूपीसीबीएल में नियुक्तियों में भारी गड़बड़ी का जिक्र किया गया था. वो इस बात से हैरान थे कि बैंक के विभिन्न पदों पर अंतिम रुप से चयनित अधिकतर कर्मचारी एक ही जिले इटावा से थे. फर्स्टपोस्ट को मिले दस्तावेज के अनुसार असिस्टेंट कैशियर के लिए चयनित 30 अभ्यर्थियों में से 17 इटावा जिले से थे. उसी तरह से कैशियर क्लर्क के 33 पदों के लिए चयनित उम्मीदवारों में से 17 उसी जिले इटावा के थे.

बैंक के अन्य पदों पर भी चयनित उम्मीदवारों में इटावा का ही बोलबाला था. एन के सिंह लिखते हैं कि “लगता है कि यूपीसीबीएल में चयन के लिए उम्मीदवारों के लिए योग्यता कोई पैमाना था ही नहीं. हम लोगों ने जांच के दौरान इस संबंध में गंभीर अनियमितता पायी है ऐसे में निगरानी विभाग अथवा स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम से इस मामले की जांच जरुरी है”.

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और मुख्यमंत्री कार्यालय में दर्ज हुई शिकायत

इसी बीच यूपी स्टेट इंप्लाईज कंफेडरेशन के मुखिया अजय सिंह ने इस संबंध में अपनी शिकायत रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) और मुख्यमंत्री कार्यालय में दर्ज करायी है. अपनी शिकायत में अजय सिंह ने आरोप लगाया है कि आर के सिंह ने केसर शुगर मिल्स के साथ मिलकर अवैध तरीके से अनुचित लाभ लिया है. इसके अलावा एसोसिएशन ने वैधानिक आडिटर से भी अनुरोध किया है कि वो यूपीसीबीएल की हेरफेर वाली बैलेंसशीट को मान्यता न दें.

सिंह ने 8 जून 2018 को लिखे अपने पत्र में कहा है कि “ उन्होंने अपने गोदाम में 9 अप्रैल 2018 को चीनी के 25 हजार बोरे रखवा दिए और इसे केसर शुगर मिल्स को मिले कर्ज के सिक्योरिटी के रुप में दिखा दिया. एक अधिकारी जो कि केसर शुगर मिल्स के मामले को देख रहा था उसने बताया कि ये कंपनी किसानों की 90 करोड़ की देनदार है और संभव है कि सरकार 6.5 करोड़ के इन 25 हजार चीनी के बोरों को जब्त कर ले. इससे ये साफ है कि यूपीसीबीएल को पास बंधक रखे गए चीनी के इन स्टाक्स पर पूरा अधिकार है ही नहीं ऐसे में लोन के लिए इन चीनी के बोरों को बंधक के रुप में दिखाना केवल दिखावा मात्र है.

अब सिंह इस बात कि कोशिश में जुटे हैं कि किसी भी तरह से इस यूपीसीबीएल की बैलेंसशीट मान्य न हो सके क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो अगले वित्तीय वर्ष में यूपीसीबीएल को भारी नुकसान हो सकता है. वो ये भी चाहते हैं कि बैलेंसशीट की हेराफेरी सुधरने के बाद आयकर विभाग को 27 करोड़ रुपए बैंक को वापस कर देने चाहिए.

सिंह अपनी शिकायत में आगे लिखते हैं कि “मुझे पता चला है कि मैनेजिंग डायरेक्टर आरके सिंह ने माना है कि केसर शुगर मिल्स ने ऋण के रुप में जो बंधक रखा है वो पहले से ही इलाहाबाद बैंक,यूको बैंक और पंजाब नेशनल बैंक के पास बंधक रखा हुआ है. बैंकों का 2011 में बंधक रखे गए उन बंधकों पर पहला अधिकार है जबकि यूपीसीबीएल का केवल मामूली अधिकार है वो भी कानून के सामने नहीं ठहर पाएगा. बैंक को 138 करोड़ का मुनाफा दिखाने के लिए सिंभावली शुगर्स के एनपीए को छिपाने का काम यूपीसीबीएल ने किया. हम लोग इस मामले को लोकायुक्त तक ले जाने की योजना बना रहे हैं'.

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