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एर्दोगन-मोदी मुलाकात: पाक को परे रख बनाने होंगे तुर्की से रिश्ते

पाकिस्तान जरुर इस रिश्ते में अड़ंगा लगाता रहेगा

Vivek Katju Updated On: May 02, 2017 01:55 PM IST

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एर्दोगन-मोदी मुलाकात: पाक को परे रख बनाने होंगे तुर्की से रिश्ते

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन भारत के दौरे पर दिल्ली आए हैं. इस दौरे के कुछ दिन पहले एर्दोगन ने एक भारतीय टीवी चैनल पर साक्षात्कार में न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप (एनएसजी) का सदस्य बनने की भारत की चाहत और संयुक्त राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के विस्तार के बारे में बात की. एर्दोगन की बातों से जाहिर हुआ कि इन मसलों पर भारत और तुर्की का नजरिया अलग है और तुर्की की सोच बहुत कुछ मसले पर पाकिस्तान की सोच के करीब है.

एक अहम बात यह भी रही कि एर्दोगन ने जम्मू-कश्मीर समस्या का समाधान खोजने की जरुरत पर बल दिया, जोर देकर कहा कि भारत और पाकिस्तान को आपस में बातचीत करनी चाहिए. साथ ही उन्होंने अपने 'अच्छे दोस्त' प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सराहना की और जम्मू-कश्मीर के मसले पर बहुपक्षीय वार्ता की संभावनाओं को रेखांकित किया. एर्दोगन की बातचीत में पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद का जिक्र जरा भी नहीं आया.

कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान ने दुनिया के मुल्कों को जो पट्टी पढ़ाई है, वह सारा कुछ एर्दोगन की बातों में नजर आ रहा था.

पाकिस्तान के करीब है तुर्की

एक दिलचस्प बात यह भी है कि राजकीय दौरे से तुरंत पहले भारत को मुश्किल में डालने का करतब तुर्की ने कोई पहली बार नहीं दिखाया. तुर्की के तत्कालीन राष्ट्रपति अबदुल्लाह गुल 2010 में भारत के दौरे पर आने वाले थे और अफगानिस्तान के मसले पर उस वक्त इस्तांबुल में क्षेत्रीय स्तर का सम्मेलन होना था.

New Delhi: Prime Minister Narendra Modi with President of Turkey, Recep Tayyip Erdogan at Hyderabad House in New Delhi on Monday. PTI Photo / PIB (PTI5_1_2017_000251B)

अब्दुल्लाह गुल के दौरे के चंद हफ्ते पहले तुर्की ने तय किया कि इस सम्मेलन में भारत को नहीं बुलाना है. तुर्की ने ऐसा पाकिस्तान के कहने पर किया. सम्मेलन में न बुलाने के तुर्की के फैसले से भारत के शीर्ष अफसरान को दुख पहुंचा और कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को लगा कि अब अब्दुल्लाह गुल का भौरत दौरा अगर निरस्त नहीं किया जाता तो कम से कम उसे अगले कुछ दिनों के लिए टाल जरुर देना चाहिए. खैर, वरिष्ठ अधिकारियों के इस ख्याल को तब ज्यादा सख्त मानकर तवज्जो ना दी गई.

बातचीत के दौरान गुल ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि अफगानिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में कोई भी देश दरार नहीं डाल सकता. यह संदेश तुर्की तक गूंजा.

इस्तांबुल का सम्मेलन कालक्रम में ‘हार्ट ऑफ एशिया वार्ता प्रक्रिया’ बनकर उभरा है और भारत इस वार्ता प्रक्रिया का पूर्ण साझीदार है. पिछले साल दिसंबर महीने में हार्ट ऑफ एशिया वार्ता प्रक्रिया की एक बैठक अमृतसर में हुई और भारत ने इसकी अध्यक्षता की.

एर्दोगन के मंसूबे क्या हैं?

आखिर एर्दोगन ने ऐसी बातें क्यों की जिससे उनकी मेहमानवाजी कर रहा भारत पसोपेश में पड़ा दिख रहा है? यह बात तो जग-जाहिर है कि पाकिस्तान और तुर्की में बड़ी गाढ़ी दोस्ती है. लेकिन क्या सिर्फ यही एक वजह थी जो एर्दोगन अपने भारत दौरे की पूर्व संध्या पर पाकिस्तानी बीन पर तुर्कानी धुन निकालते नजर आए? एक वजह यह भी हो सकती है लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि फिलहाल एर्दोगन का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा हुआ है.

erdogan

एर्दोगन ने हाल ही में एक जनमत संग्रह में बड़े थोड़े से अंतर से जीत हासिल की. जनमत संग्रह तुर्की के संविधान में संशोधन के लिए था ताकि राष्ट्रपति को पहले की तुलना में कार्यपालिका के अकूत अधिकार मिल जाएं.

बीते डेढ़ दशक से एर्दोगन तुर्की के सार्वजनिक जीवन पर छाए हुए हैं. वे 2003 से 2014 तक तुर्की के प्रधानमंत्री के पद पर थे और अब वहां के राष्ट्रपति हैं. इस दौरान उन्होंने बड़ी कामयाबी से तुर्की की राजनीति पर सेना के निर्णायक असर को खत्म किया है.

पिछले साल सेना की तरफ से आधे-अधूरे मन से एक तख्तापलट की कोशिश हुई. एर्दोगन ने इस बगावत का सर कुचल दिया. तुर्की की सेना अपने को कमाल अतातुर्क की धर्मनिरपेक्षता और यूरोप-केंद्रित नजरिए का रहनुमा समझती है जबकि एर्दोगन की सियासी मंसूबे हैं कि वे कुछ वैसा दिखें जैसा कि किसी वक्त में ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान दिखा करते थे.

हालांकि एर्दोगन अपना ये मंसूबा कभी जाहिर नहीं करते और अपनी नीतियों की पैरोकारी में यही कहते हैं कि यह तुर्की की परंपरागत सियासत की लकीर पर चलने वाली राजनीति की ऊपज है. शायद इसी सोच के कारण एर्दोगन को लगता है कि वे संवेदनशील माने जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय मसलों में दखलंदाजी कर सकते हैं.

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप अर्दोआन

जाहिर है जम्मू-कश्मीर पर एर्दोगन की फिजूल की टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अच्छी नहीं लगी होगी. मोदी को यह भी अखरा होगा कि एर्दोगन ने जब न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप की सदस्यता की बात कही तो भारत और पाकिस्तान का जिक्र समान रुप से किया. हां, संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद के विस्तार की बात एर्दोगन की विदेश नीति का हिस्सा है. सो यूएन की सुरक्षा परिषद में सुधार की बात उन्होंने सिर्फ पाकिस्तान को ध्यान में रखकर कही होगी- ऐसा नहीं माना जा सकता.

मोदी को अलग रणनीति बनानी होगी

खैर, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तुर्की के राष्ट्रपति की टिप्पणी को खास अहमियत नहीं दी. उनका ज्यादा जोर इस बात पर है कि भारत और तुर्की साथ मिलकर अलग-अलग क्षेत्रों खासकर व्यापार और निवेश के मामले में क्या-क्या कर सकते हैं. बुनियादी ढांचे में तुर्की का निजी क्षेत्र भागीदारी करे, इस पर मोदी की खास नजर है. मोदी ने आतंकवाद के मसले को भी अपने ध्यान में रखा है. उन्होंने कहा है कि आतंकवाद से दोनों देशों को समान खतरा है.

मोदी का यह नजरिया बड़ा मानीखेज है. तुर्की और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत मजबूत हैं और निकट भविष्य में इस रिश्ते में कोई खटास नहीं आने वाली. लेकिन इसका कत्तई यह मतलब नहीं कि भारत तुर्की के साथ अपने द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में आगे ना बढ़े.

भारतीय विदेश मंत्रालय की नई सचिव(पश्चिम) रुचि घनश्याम ने कहा भी यही कि भारत और तुर्की को द्विपक्षीय संबंधों की दिशा में “अपने-अपने हिसाब” से बढ़ना है. कूटनीति की दुनिया में पेशकदमी के खेल इसी तर्ज पर होते हैं.

एक इस्लामी देश के रुप में तुर्की एक अहम इलाकाई ताकत है और भू-रणनीतिक लिहाज से भी तुर्की बहुत महत्वपूर्ण मुकाम पर कायम है. पश्चिम एशिया में तुर्की अहम भूमिका निभा रहा है, भले ही उसकी यह भूमिका विवादास्पद रही हो.

तुर्की की महत्वाकांक्षा दुनिया के सियासी रंगमंच पर एक बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरने की है. तुर्की को इस बात की निराशा है कि यूरोपीय संघ में शामिल होने की उसकी कोशिशें अधूरी रह गईं. एर्दोगन अब यूरोपीय जीवन-मूल्यों को तिलांजलि देने में लगे हैं. ऐसे में यूरोप के लिए तुर्की को स्वीकार कर पाना लगातार असंभव होता जा रहा है. इन बातों को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों की दिशा में आगे बढ़ना भारत के हित में है. हां, साथ ही साथ भारत को यह भी ध्यान में रखना होगा कि भारत और तुर्की बहुत से अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों (जैसे पश्चिम एशिया) पर एक-दूसरे से अलग राय रखते हैं.

मिसाल के लिए तुर्की किसी भी सूरत में इस बात पर राजी नहीं है कि सीरिया में बशर अल असद का शासन चले जबकि भारत के संबंध असद से बहुत अच्छे हैं.

द्विपक्षीय सबंधों की दिशा में आगे बढ़ते हुए भारत को तुर्की से साफ-साफ कह देना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर के मसले पर भारत किसी तीसरे पक्ष की दखंलदाजी बर्दाश्त नहीं करेगा इसलिए जम्मू-कश्मीर के मसले पर तुर्की का कुछ कहना बेमानी मतलब का है. तुर्की से यह भी कहना होगा कि भारत की अवाम ऐसी टिप्पणियों को अच्छा नहीं मानती और इस कारण दोनों देशों में रिश्ते कायम करने के लिहाज से ऐसी टिप्पणियां बाधक हैं.

South Asian Association For Regional Cooperation Meet In Kathmandu

मिसाल के लिए पाकिस्तानी फौज ने दो भारतीय जवानों के शव के साथ बर्बरता का बरताव किया है. ऐसे में भारतीय टीवी चैनल पर एर्दोगन ने अगर नवाज शरीफ की बड़ाई की है तो इससे यही जाहिर होता है कि उन्हें पाकिस्तान की सियासत की ठीक समझ नहीं है क्योंकि पाकिस्तान में सुरक्षा संबंधी फैसले सेना ही करती है, नवाज शरीफ तो बस मूक दर्शक बने देखते रखते हैं.

मोदी और एर्दोगन दोनों ने न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप के मुद्दे पर कुछ नहीं कहा. इससे जाहिर होता है कि इस मसले पर दोनों देशों में सहमति कायम नहीं हुई. तुर्की इस मसले पर पाकिस्तान का साथ देगा, यह बात अब साफ दिख रही है. एनएसजी में शामिल होने के अपने मकसद पर आगे बढ़ते हुए भारत को यह बात ध्यान में रखनी होगी.

एर्दोगन के सलाहकारों का कहना है कि नरेन्द्र मोदी और एर्दोगन के बीच तालमेल अच्छा है. सो भारत और तुर्की व्यापार और निवेश के मसले पर आपसी रिश्तों के मामले में आगे बढ़ सकते हैं. हां, पाकिस्तान जरुर इस रिश्ते में अड़ंगा लगाता रहेगा.

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