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गंगा को बचाने के लिए 112 दिन के आमरण अनशन के बाद नहीं रहे प्रो. जीडी अग्रवाल

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और गंगा के निर्मल प्रवाह के अग्रदूत प्रो. जीडी अग्रवाल का 112 दिनों के अनशन के बाद निधन हो गया है

Updated On: Oct 11, 2018 05:03 PM IST

FP Staff

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गंगा को बचाने के लिए 112 दिन के आमरण अनशन के बाद नहीं रहे प्रो. जीडी अग्रवाल

आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और गंगा के निर्मल प्रवाह के अग्रदूत प्रो. जीडी अग्रवाल का 112 दिनों के अनशन के बाद निधन हो गया है. प्रो. अग्रवाल बीते 22 जून से हरिद्वार में आमरण अनशन पर बैठे हुए थे. प्रो. अग्रवाल गंगा नदी की धारा में बांधों के जरिए पैदा किए अवरोधों के विरोधी थे. उनकी सरकार से मांग थी कि सभी हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बंद किए जाएं.

करीब 111 दिनों के अनशन के बाद उन्होंने मंगलवार को पानी भी त्याग दिया था. उनकी मौत बुधवार को ऋषिकेश के एम्स में हार्ट अटैक की वजह से हुई.

टाइम्स इंडिया में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक प्रो. अग्रवाल ने कहा था, ' हमने प्रधानमंत्री और जलसंसाधन मंत्रालय को बहुत सारे पत्र भेजे लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. मैं बीते 109 दिनों से आमरण अनशन पर हूं और अब मैंने फैसला किया है कि मैं अपनी तपस्या और आगे बढ़ाउंगा और गंगा नदी के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दूंगा. मेरी मौत के साथ ही मेरे अनशन का अंत होगा.'

हालांकि प्रो. अग्रवाल का अनशन तुड़वाने के लिए उत्तराखंड के पूर्व सीएम और दिग्गज नेता रमेश पोखरियाल निशंक ने काफी कोशिशें की थीं लेकिन उनकी कोशिशें बेकार गईं.

जीडी अग्रवाल से स्वामी ज्ञान स्वरूप

पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक किसान परिवार में पैदा हुए जीडी अग्रवाल आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग में स्नातक किया था. बाद में उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री भी हासिल की थी.

वो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले मेंबर सेक्रेटरी भी रहे. वो कानपुर आईआईटी सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के हेड भी रहे. इसके अलावा भी प्रो. अग्रवाल के या तो कई पदों पर रहे या किसी प्रोजेक्ट से जुड़े रहे. गांधीवादी तरीके जीवन जीने वाले प्रो. जीडी अग्रवाल ने साल 2011 में सन्यास धारण कर लिया था और उसके बाद गंगा से जुड़े अभियान पर ही अपना जीवन समर्पित कर दिया. स्वतंत्रता सेनानी पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा शुरू की गई एक संस्था गंगा महासभा के वो संरक्षक भी थे.

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