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एल्फिन्स्टन भगदड़: क्या मृतकों के सिर पर नंबर लिखने से पहले पुलिस ने दिमाग का इस्तेमाल किया?

जहां कीमती जिंदगियों की क्षति अपने आप में दुखद है, वहीं इस तरह की तस्वीर मृतकों और उनके परिवार के लिए गंभीर संवेदनहीनता दर्शाती है

Sanjay Sawant Updated On: Sep 29, 2017 09:33 PM IST

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एल्फिन्स्टन भगदड़: क्या मृतकों के सिर पर नंबर लिखने से पहले पुलिस ने दिमाग का इस्तेमाल किया?

शुक्रवार सुबह 11 बजे से कुछ देर पहले मुंबई के एल्फिन्स्टन स्टेशन पर रेलयात्रियों को एक भयानक हादसे का सामना करना पड़ा. इन हादसों में चोटें लगने से और दम घुटने से 22 लोगों की मौत हो गई और 37 अन्य घायल हो गए.

इसके बाद अनुमान के मुताबिक स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकार की शाखाएं ट्वीट करने, मीडिया को साउंड बाईट्स देने, तात्कालिक समाधान बताने और जांच के आदेश देने में लग गईं. इसके अलावा बीजेपी के कुछ नेताओं ने ऑफ द रिकॉर्ड यहां तक कह दिया कि यह एक षड्यंत्र था. आप पूछेंगे कैसा षड्यंत्र? रेलमंत्री पीयूष गोयल आज ही मुंबई पहुंच कर 100 नई रेल सेवाओं को शुरू करने वाले थे. आपको लगता है कि यह तो संवेदनहीनता की हद हो गई; नहीं, वह तो अभी बाकी थी.

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जब मृतकों के परिजन केईएम अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने दीवार पर उन 22 मरने वाले लोगों की तस्वीर दिखी. इन लोगों के माथे पर 1 से लेकर 22 तक नंबर लिखे हुए थे.

मुंबई पुलिस के प्रवक्ता डीसीपी दीपक देवराज ने फर्स्टपोस्ट को बताया, 'मुझे नहीं पता यह किसने किया है.' केईएम अस्पताल के एक सीनियर डॉक्टर ने गोपनीयता की शर्त पर बताया कि मृतक को इस तरह चिह्नित करने का यह तरीका दुनियाभर के फॉरेंसिक विभागों में आम है. हालांकि यह बात सही हो सकती है पर ऐसी तस्वीरें सार्वजनिक करना तो किसी फॉरेंसिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है.

जहां कीमती जिंदगियों की क्षति अपने आप में दुखद है, वहीं इस तरह की तस्वीर मृतकों और उनके परिवार के लिए गंभीर संवेदनहीनता दर्शाती है.

क्या पहचान के और तरीके नहीं?

यह ठीक है की इस तरह के हालात में परिजनों को सूचित करना जरूरी है पर ऐसा करने के और तरीके भी होते हैं. दीवार पर ऐसे पोस्टर बना कर लगाने वालों को जरूर इतना वक्त रहा होगा कि उन्होंने पहले इन शवों की तस्वीरें लीं, सॉफ्टवेयर की मदद से उन्हें एक साथ सेट किया, पोस्टर में बाकी जानकारियां लिखीं और एक पोस्टर में एक बॉर्डर जोड़ा फिर जाकर उसे प्रिंट करवाया. ऐसे में क्या ये नंबर डिजिटल तरीके से नहीं डाले जा सकते थे? या फिर किसी कार्ड पर भी ये नंबर लिखे जा सकते थे.

या फिर मरने के बाद इन 22 लोगों की ब्रैंडिंग ऐसे जानवरों की तरह करनी जरूरी थी जिन्हें हलाल करने कत्लखाने ले जाया जाता है. अगर इन मौतों का जिम्मेदार भारतीय रेल है तो उन मृतकों के सम्मान की हत्यारी मुंबई की भोईवाडा पुलिस है.

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