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हर गांव में बिजली: कई कमियां तो जरूर होंगी लेकिन मोदी सरकार के लिए शाबाशी बनती है

मणिपुर का लिसांग कुल 65 परिवारों का गांव हैं. शनिवार शाम इस गांव में आई रोशनी ने पूरे देश के अंधियारे को दूर कर दिया. लिसांग के साथ ही इस देश का हर गांव अब बिजली से जुड़ गया है.

Vivek Anand Vivek Anand Updated On: Apr 30, 2018 07:24 PM IST

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हर गांव में बिजली: कई कमियां तो जरूर होंगी लेकिन मोदी सरकार के लिए शाबाशी बनती है

मणिपुर का लिसांग कुल 65 परिवारों का गांव हैं. शनिवार शाम इस गांव में आई रोशनी ने पूरे देश के अंधियारे को दूर कर दिया. गांव में पहली बार बिजली के लट्टुओं की रोशनी फैली. इस रोशनी के साथ ही सरकार के हर गांव तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य पूरा हो गया. सरकारी दस्तावेजों में लिसांग का नाम दर्ज हो गया है. लिसांग को याद रखा जाएगा कि यही हिंदुस्तान का वो आखिरी गांव था, जहां तक रोशनी पहुंचाकर उजाले का जश्न मनाया गया.

लिसांग के साथ ही इस देश का हर गांव अब बिजली से जुड़ गया है. आजादी के 70 साल बाद ही सही लेकिन हमने इस उपलब्धि को हासिल कर लिया है. सरकार की तमाम आलोचनाओं के बीच इस कामयाबी को छोटा नहीं कहा जा सकता. हां, सवाल कई तरह के उठ सकते हैं. मसलन रिकॉर्ड के मुताबिक अगर किसी गांव के 10 फीसदी परिवारों तक भी बिजली पहुंच  जाए, गांव के सामुदायिक भवन, पंचायत भवन, स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक बिजली पहुंचा दी जाए तो उसे बिजली से रोशन गांव मान लिया जाता है.

गांव तक बिजली पहुंचाने का मतलब ये नहीं है कि गांव के हर परिवार तक बिजली की पहुंच हो. हर गांव तक बिजली और हर किसी की पहुंच तक बिजली में अंतर है. एक आंकड़े के मुताबिक अभी भी करीब 25 मिलियन यानी करीब 2.5 करोड़ परिवारों तक बिजली पहुंचना बाकी है. 24 घंटे की बिजली भी अभी दूर की कौड़ी है. लेकिन इसके बावजूद तय सीमा से पहले देश के सभी गांवों को रोशन करने के संकल्प को पूरा कर लेने की कामयाबी इतनी बड़ी है कि इन कमियों को थोड़े वक्त के लिए भूला जा सकता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर ( रायटर इमेज )

सड़क-बिजली और पानी बरसों से ये तीन मूलभूत चुनावी मुद्दे रहे हैं. इस कामयाबी को समझना हो तो आप ज्यादा नहीं 10-15 साल पहले का वक्त याद कर सकते हैं. बिजली से रोशन इलाकों में भी बिजली जाना जितना स्वाभाविक था उतना ही अस्वाभाविक था बिजली का आना.

दिल्ली में फिर भी हालात बेहतर थे लेकिन दिल्ली से सटे यूपी और हरियाणा भी बिजली की भयानक किल्लत से जूझ रहे थे. इन इलाकों में रात-रात भर बिजली गुल रहा करती थी. खासकर गर्मियों के दिनों में बिजली गायब रहना और लोडशेडिंग की वजह से कम वोल्टेज एक आम समस्या हुआ करती थी. इन सब हालातों में सुधार हुआ है. बिजली के गुल होने की वजह ने ही इन्वर्टर के सहारे थोड़ी भरपाई करने का जुगाड़ लगाया. आज भी दिल्ली में नहीं लेकिन एनसीआर में अब भी इन्वर्टर के बिना गुजारा नहीं हो सकता.

बिहार और यूपी जैसे राज्यों में बिजली की भीषण समस्या रही है. पिछले दिनों इन सभी राज्यों में बिजली की कमी में सुधार आया है. एक वो भी दौर था जब किसी इलाके का ट्रांसफर फुक जाए तो उसे बदलने में महीनों लग जाते थे. अब हालत पहले जैसे नहीं है. बिजली मामूली मसला नहीं रही. बिजली के इस्तेमाल और इसके जरिए गरीबों की आर्थिक स्थिति में सुधार का सीधा लिंक रहा है.

2011 की जनगणना बताती है कि बिहार के उन इलाकों में पिछड़ेपन और गरीबी को खत्म करने में खासा मदद मिली है जहां पर बिजली की स्थिति में सुधार आया है. यूएन की एक वर्ल्ड समिट में भी इस बात को माना गया कि बिजली की वजह से खेती किसानी में सुधार आया है, कृषि उत्पादन बढ़ा है, रोजगार के मौके बढ़े हैं, क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार आया है. महिलाओं और बच्चों के जीवनस्तर को बिजली ने खासा प्रभावित किया है.

बिहार जैसे राज्य में सिंचाई का मुख्य साधन है बोरवेल. बोरवेल से सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत होती है. यानी अगर बिजली दुरुस्त हो तो फसलों को सही वक्त पर पानी मिल पाएगा और सही वक्त पर पानी मिलेगा तो निश्चित ही कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी होगी. 10-15 साल पहले तक बिहार के गांवों में बिजली की बहुत अधिक समस्या थी.

शहरों और गांवों में बिजली के बंटवारा होता था. शहरों में जहां बिजली का वितरण लोगों के सुविधा के मद्देनजर होता था वहीं गांवों में सिंचाई के जरूरत के हिसाब से. ऐसे कई इलाके थे जहां शहरों को दिन में बिजली सप्लाई की जाती थी लेकिन रात में शहर की बिजली काटकर गांवों में दी जाती थी ताकि उस वक्त किसान अपने फसलों की सिंचाई कर सकें. हालांकि इस बंटवारे से न शहर वाले खुश रहते न गांव वाले. क्योंकि बिजली हर वक्त की जरूरत है.

आज ऐसे इलाकों में भी बेहतर हालात हुए हैं. एक आम सी सोच थी कि बिजली रहती तो बच्चे पढ़ जाते. इसी सोच ने संपन्न परिवार के बच्चों को शहर का रुख करने को मजबूर किया. आज ऐसे इलाको में भी स्थिति सुधरी है.

मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही लोगों की इस मूलभूत जरूरत को तवज्जो दी. सरकार ने हर गांव तक बिजली पहुंचाने के ले दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) की शुरुआत की. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के कुल 5,97,464 गांवों तक बिजली पहुंचा दी गई है.

एनडीए सरकार ने जब डीडीयूजीजेवाई योजना की शुरुआत की उस वक्त देश के कुल गांवों में से 18,452 गांवों तक बिजली नहीं पहुंची थी. हालांकि बाद में ये भी पता चला कि यूपीए शासनकाल के दौरान 1275 गांवों तक बिजली पहुंचा देने का दावा किया गया था वहां अभी तक बिजली पहुंची ही नहीं थी. इन गांवों को भी इस योजना से जोड़ा गया. ये सारे गांव अब बिजली से रोशन हो चुके हैं. हालांकि इनमें 1236 गांव ऐसे भी हैं, जहां कोई नहीं रहता है. इसके अलावा 35 गांवों को चारागाह रिजर्व के तौर पर घोषित किया गया है.

आंकड़ों के हिसाब से कुछ और चीजें समझने की जरूरत है. 75,893 करोड़ की इस योजना मे सरकार ने 19,727 गांवों तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा था. यानी हर साल करीब 4,930 गांवों को रोशन करना था. डीडीयूजीजेवाई के अंतर्गत देश के कुल गांवों में से 3 फीसदी गांवों तक बिजली पहुंचानी थी. इसके पहले की सरकारों ने 97 फीसदी गांवों तक बिजली पहुंचा चुकी थी. यानी पिछले 60-70 वर्षों में देश के 97 फीसदी गांवों तक बिजली की पहुंच हो चुकी थी.

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प्रतीकात्मक तस्वीर ( रायटर इमेज )

यूपीए के शासन के दौरान राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के अंतर्गत 2005 से लेकर 2014 तक देश के 1,08,280 गांवों तक बिजली पहुंचाई गई. यानी इस योजना में हर साल 12,030 गावों तक बिजली पहुंची. इस लिहाज से देखा जाए तो इस यूपीए के शासन में हर साल ज्यादा गांवों में बिजली पहुंची.

दूसरी एक बात ये भी है कि एनडीए की सरकार में डीडीयूजीजेवाई के तहत जिन 19727 गांवों तक बिजली पहुंचाई गई उसमें से सिर्फ 8 फीसदी परिवारों तक ही पूरी तरह से बिजली पहुंची है. इन गांवों के 92 फीसदी परिवारों में अब भी बिजली की सुविधा नहीं मिली है. इन आंकड़ों से साफ हो जाता है कि हर गांव तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य तो पूरा कर लिया गया है लेकिन हर परिवार तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य अब भी अधूरा है. सेलीब्रेशन तो बनता है लेकिन इस अगले टारगेट को ध्यान में रखते हुए. एक टारगेट ये भी है कि आने वाले वक्त में देश के हर कोने में किसी को ये न कहना पड़े कि बिजली आई...मतलब बिजली चौबीसों घंटे उपलब्ध हो.

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