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दिल्ली के सरकारी स्कूल अब उम्मीद जगाते हैं, लेकिन रातों-रात नहीं आएगा बदलाव

इस साल दिल्ली सरकार ने अपने कुल बजट का 26 फीसदी शिक्षा के क्षेत्र के लिए रखा है. शिक्षा के लिए कुल 13.997 करोड़ रुपए रखे गए हैं

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada Updated On: Jun 02, 2018 04:41 PM IST

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दिल्ली के सरकारी स्कूल अब उम्मीद जगाते हैं, लेकिन रातों-रात नहीं आएगा बदलाव

स्वास्थ्य और शिक्षा दो ऐसे क्षेत्र हैं जिस पर आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार गर्व कर सकती है. इस साल आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार ने अपने कुल बजट का 26 फीसदी शिक्षा के क्षेत्र के लिए रखा है, जबकि पिछले वित्तीय बजट में शिक्षा के लिए 23.5 फीसदी बजट निर्धारित किया गया था. शिक्षा के लिए कुल 13.997 करोड़ रुपए रखे गए हैं और ये सभी क्षेत्रों में दिए गए बजट में सबसे ज्यादा हैं. इसी तरह से स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए भी अच्छी खासी राशि बजट में आवंटित की गई है. स्वास्थ्य के क्षेत्र के लिए कुल बजट की 13 फीसदी राशि निर्धारित की गई है जो कि 6,729 करोड़ रुपए है.

लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में खास ध्यान देने के बाद भी इस बार के सीबीएसई के परीक्षा परिणामों ने दिल्ली सरकार को चौंका दिया है. इस परीक्षा परिणाम की अहमियत दिल्ली सरकार के लिए इसलिए ज्यादा है क्योंकि इस बार दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पास प्रतिशत काफी कम रहा है. ऐसे में दिल्ली सरकार के शिक्षा पर विशेष ध्यान देने के बाद भी इस तरह के परिणाम निश्चित रूप से आप सरकार के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं. दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परिणाम सीबीएसई से संबंधित सभी वर्ग के स्कूलों में सबसे खराब है.

दसवीं की परीक्षा से पहले संपन्न हुए प्री बोर्ड परीक्षाओं में ऐसी स्थिति नहीं थी. उस समय सरकारी स्कूलों ने बढ़िया प्रदर्शन किया था और उनके यहां कुल मिलाकर पास प्रतिशत 86.70 फीसदी रहा था जबकि निजी स्कूलों में पास प्रतिशत 89.45 फीसदी रहा था और सरकारी अनुदानों से चलने वाले शिक्षण संस्थानों का पास प्रतिशत 69.96 फीसदी था. सरकारी स्कूलों के इस शानदार प्रदर्शन के लिए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने उनकी काफी तारीफ भी की थी.

छठवीं कक्षा से पहले की पढ़ाई जीरो

ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर गड़बड़ी हो कहां रही है? दरअसल सबसे बड़ी समस्या उस समय खड़ी होती है जब एमसीडी स्कूलों के बच्चे छठवीं कक्षा में सरकारी स्कूलों में दाखिले के लिए पहुंचते हैं. जुलाई 2016 में दिल्ली कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (डीसीपीसीआर) ने बच्चों के पढ़ने के स्तर को लेकर एक सर्वे किया. इस सर्वे में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए. सर्वे में पता चला कि 74 फीसदी बच्चे हिंदी का एक साधारण वाक्य 'जंगल का शेर है, तक नहीं पढ़ पा रहे हैं.

डीसीपीसीआर के सदस्य अनुराग कुंडु के मुताबिक यहीं से दिल्ली सरकार की मुश्किल शुरू होती है जब उन्हें पिछले सात साल की लापरवाही और बुरे प्रदर्शन को झेलना शुरू करना पड़ता है. कुंडु के मुताबिक कई सालों तक कमजोर पढ़ाई की वजह से स्टूडेंट्स जब आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों में दाखिला लेता है तो वो उससे सामंजस्य नहीं बैठा पाता. डीसीपीसीआर का गठन 2005 के कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (सीपीसीआर) के कानून के अंतर्गत हुआ है. इस संबंध में दिल्ली सरकार ने जुलाई 2008 में एक नोटिफिकेशन जारी करके इसके गठन को मंजूरी दी थी.

सरकारी स्कूलों के बच्चों के पढ़ने में कमजोरी को देखते हुए आम आदमी पार्टी ने ‘ईच चाइल्ड कैन रीड’ कैंपेन शुरू किया जिससे कि बच्चों के पढ़ने की क्षमता में सुधार हो सके. कुंडु बताते है कि 35 कार्य दिवसों वाला ये अभियान दिल्ली में शिक्षक दिवस यानी 5 सितंबर से शुरू किया गया था और इसका समापन बाल दिवस यानी 14 नवंबर को किया गया था.

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एमसीडी स्कूलों में शिक्षा के स्तर में गिरावट की कई और वजहें भी हैं. एमसीडी शिक्षक डिप्लोमा प्राप्त होते हैं और उन्होंने केंद्रीय शिक्षक पात्रता परीक्षा (सीटीईटी) पास की हुई होती है जबकि दिल्ली के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के पास डिग्री होती है. औसतन एमसीडी स्कूल एक बच्चे पर एक साल में 19 हजार रुपए खर्च करता है जबकि दिल्ली के सरकारी स्कूलों के लिए ये आंकड़ा प्रति बच्चा 56 हजार रुपए सालाना है. कुंडु के मुताबिक, पिछले तीन सालों में इसका बजट तीन गुणा तक बढ़ गया है. कुंडु बताते हैं कि 'आपको ये जानकर हैरानी होगी कि वही एमसीडी एक बंदर को बचाने में 57 हजार रुपए खर्च कर देती है.' दिल्ली में कुल 1,700 एमसीडी स्कूल हैं जबकि सरकारी विद्यालयों की संख्या 1,050 है.

गहन और सूक्ष्म नीतियों के दूरगामी उपाय

शिक्षा और इसके क्षेत्र में बहुत बारीक सी गलती है और इसका निदान भी कुछ ऐसा ही है. राघव चोपड़ा जिन्होंने दो सालों तक टीच फॉर इंडिया फेलोशिप के तहत दिल्ली के तुगलकाबाद एक्सटेंशन स्थित लड़कियों के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाया था, वो कहते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में गहन और सूक्ष्म नीतियों को लागू किया जा रहा है लेकिन उसका परिणाम मिलने में थोड़ा समय लगेगा.

2018 में समाप्त हुए दो साल के अपने शिक्षण कार्यकाल के दौरान उन्होंने कहा था कि छठीं कक्षा के बच्चे अगर दूसरी कक्षा के बच्चों जितना ही पढ़ पा रहे हैं तो इस गड़बड़ी को दूर करने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. वो दो कार्यक्रमों, चुनौती और बुनियाद को लागू किए जाने के गवाह भी बने थे. इन कार्यक्रमों में बच्चों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया था जो बच्चे पढ़ने में अच्छे थे, उन्हें एक विशेष कक्षा में रखा गया जहां पर उनका आगे के लिए विशेष ध्यान देने की व्यवस्था की गई, जबकि कमजोर बच्चों को एक अलग कक्षा में रखा गया जहां पर उनको एक महीने तक विशेष कोचिंग देने की व्यवस्था की गई थी. चोपड़ा के मुताबिक उन्होंने दो विशाल पीटीएम पहली बार देखे जिसमें अभिभावक अपने बच्चों के शिक्षकों को खोजते नजर आए. ऐसा नजारा देखना उनके लिए अस्वभाविक था क्योंकि ऐसी भीड़ तो पहले केवल प्राइवेट स्कूलों में ही नजर आती थी.

बारीक मामलों की बात करें तो दो और योजनाएं चल रही हैं जिसका परिणाम मिलने में कुछ समय लग सकता है. पहला ये कि शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के बजट को 300-400 रुपए से बढ़ा कर 5000 रुपए प्रतिदिन कर दिया गया है. ऐसा इसलिए किया गया है कि प्रशिक्षण का स्तर सुधारा जा सके और बच्चों के मनोविज्ञान और क्रियाशीलता पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा मिले सके. दूसरी योजना के तहत 220 सदस्यों वाले मेंटॉर टीचरों का एक नया कैडर बनाया गया है. इन सभी शिक्षकों को पांच पांच स्कूल दिए गए हैं जिनमें उन्हें अभी के टेंड्र के मुताबिक गहन स्तर पर कोचिंग और उसपर अभिभावकों से फीडबैक लेने का कार्य सौंपा गया है. ये प्रगतिशील कदम तो है लेकिन बाहर से निरीक्षण करने की बजाए सहयोगी पर्यवेक्षण के परिणाम मिलने में अभी समय लगेगा.

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इस बार दसवीं बोर्ड की परीक्षा 9 साल के बाद ली गई थी और इस दौरान सिलेबस दोगुना हो चुका था. कुंडु समझाते हुए कहते है कि 'अगर कोई बच्चा जो कि अद्धवार्षिक परीक्षा का आदि हो और उसे सीधे एक ही बार में पूरे सिलेबस के आधार पर परीक्षा देने को कहा जाए तो इससे बच्चे के प्रदर्शन पर तो असर पड़ेगा ही.'

कर्नाटक शिक्षण मॉडल से भी मिल सकती है मदद

एक और मुद्दा है जिसपर निश्चित रुप से ध्यान दिए जाने की जरूरत है. साइंस स्ट्रीम जिसे सबसे ज्यादा लाभदायक विकल्प माना जाता है वो सरकारी स्कूल के बच्चों में लोकप्रिय है ही नहीं. मूलभूत सुविधाओं के अभाव की वजह से साइंस टैलेंट सर्च एग्जामिनेशेन को आईएमओ/आरएमओ एकेडमिक मॉडल और एनएसओ डिजिटल ऑनलाइन टेस्टिंग मॉडल के रूप में तब्दील किया जा सकता है. ये एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर अभी और भी काम करने की जरूरत है.

कर्नाटक शिक्षण मॉडल को अपनाने से भी सरकार को इस विषय में मदद मिल सकती है. इस योजना के अंतर्गत कर्नाटक सरकार और शिक्षण फाउंडेशन ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं जिसके अंतर्गत चित्रदुर्ग और दावणगेरे जिले के 1500 सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालयों के एक लाख से ज्यादा बच्चों को फाउंडेशन प्रेरक कार्यक्रमों के बारे में जानकारी देगी.

इस कार्यक्रम के लिए फाउंडेशन ने सर्व शिक्षा अभियान और प्राइमरी और सेकेंडरी शिक्षा डिपार्टमेंट के साथ तीन साल तक काम करने का समझौता किया है और इसी के अंतर्गत वो बच्चों को सरकारी शिक्षकों और अधिकारियों के माध्यम से प्रेरक कार्यक्रमों की जानकारी देती है. 11 करोड़ रुपए के इस अनुबंध को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के अंतर्गत अमलीजामा पहनाया गया है, जिसमें 50 फीसदी हिस्सेदारी सरकार की और 50 फीसदी भागीदारी निजी क्षेत्र की रहती है. इस तरह के कार्यक्रमों को लागू करने से व्यवस्था में अच्छी योजनाएं बेहतर तरीके से शामिल होती हैं और इसका परिणाम भी अच्छा मिलता है.

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