S M L

पढ़ी-लिखी शहरी महिलाएं बच्चे पैदा करने के मामले में ज्यादा रिस्क लेती हैं

ग्लोबल रिसर्च के अनुसार नवजात और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए आदर्श जन्म अंतराल तीन से पांच साल का है

Updated On: Apr 11, 2018 01:28 PM IST

FP Staff

0
पढ़ी-लिखी शहरी महिलाएं बच्चे पैदा करने के मामले में ज्यादा रिस्क लेती हैं
Loading...

पिछले एक दशक से 2015-16 के दौरान, 15 से 29 साल की भारतीय महिलाओं और स्कूल में अधिक वर्ष तक जाने वाली महिलाओं ने ‘कम और असुरक्षित अंतराल’ पर बच्चों को ज्यादा जन्म दिया है. यह जानकारी स्वास्थ्य आंकड़ों पर इंडियास्पेंड द्वारा किए गए विश्लेषण में सामने आई है.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की 2015-16 की रिपोर्ट के मुताबिक, 24 महीनों से कम का जन्म अंतराल ( दो लगातार जीवित जन्मों के बीच का समय ) का परिणाम जन्म के समय बच्चे का कम वजन और मृत्यु के रूप में भी हो सकता है.

ग्लोबल रिसर्च के अनुसार नवजात और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए आदर्श जन्म अंतराल तीन से पांच साल का है. दस सालों में, भारत में, 15-29 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं में जन्म के बीच का अंतर 25 महीने से कम होकर 22.5 महीने हुआ है.

नाम न बताने की शर्त पर नई दिल्ली स्थित एक जनसांख्यिकी विशेषज्ञ ने कहा, 'असंगत एनएफएचएस डेटा को देखे बिना टिप्पणी करना मुश्किल है, जो 2015-16 तक जारी नहीं किया गया है. हमें यह देखना होगा कि 15-19 साल की महिलाओं में पैदा हुए बच्चों में कितने जीवित या मरे हुए थे और फिर उलझे हुए कारणों की जांच करनी होगा. भारत की बढ़ी हुई नवजात मृत्यु दर के साथ, यह संभव है कि युवा महिलाओं में औसत दर्जे का अंतराल उन लोगों में बढ़ गया है जिनके बच्चों की जन्म लेने के फौरन बाद मृत्यु हुई हो.'

लड़कियों की उम्र में शादी के मामले सबसे ज्यादा शहरों में बढ़े

भारत में पुरुषों के लिए विवाह के लिए कानूनी आयु 18 और महिलाओं के लिए 21 है. कम उम्र में विवाह के मामले, विशेष रूप से लड़कियों के, शहरी क्षेत्रों में बढ़े हैं ( 2011 में शहरी इलाकों में 10 से 17 साल की उम्र के बीच पांच लड़कियों में से एक शादीशुदा थी ). हालांकि इसके पीछे तत्काल कारण स्पष्ट नहीं थे.मगर परंपरा की लगातार पकड़ बनी हुई है, जैसा कि इंडियास्पेंड 9 जून, 2017 की रिपोर्ट में बताया है. आंध्र प्रदेश और तेलंगना में बाल गरीबी पर चल रहे वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, 22 साल की उम्र में, 56 फीसदी महिलाएं शादीशुदा थी. इंडियास्पेंड ने 17 नवंबर, 2017 की रिपोर्ट में इस बात क खुलासा किया है.

कुल मिलाकर, 15 से 49 साल की महिलाओं के लिए लगातार जीवित जन्मों के बीच औसत अंतर 27-28 दिन बढ़ गया.

उच्च शिक्षा स्तर वाली महिलाएं ही केवल एकमात्र ऐसा समूह थी, जिनके बीच 2005-06 में जन्म अंतराल 36.5 महीने था, जो 24-25 दिन कम हो कर 2015-16 में 36 महीना हुआ है.

वर्ष 2015-16 के दशक में, सबसे गरीब 20 फीसदी घरों में महिलाओं ने कम अंतराल पर बच्चों को जन्म दिया है.

छोटा परिवार भी कम से कम एक बेटा चाहता है !

वर्ष 2015-16 तक एक दशक के दौरान, शहरी इलाकों में भारतीयों का एक उच्च हिस्सा और उच्च शिक्षा के साथ लोगों ने कम से कम एक बेटे की चाहत की बात कही है.

जबकि पांच साल तक स्कूली शिक्षा प्राप्त वे महिलाएं, जिन्होंने कहा कि वे बेटियों से ज्यादा बेटों को पसंद करती हैं, उनके हिस्से में 2 प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है जबकि आठ वर्ष या अधिक वर्ष स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाली ऐसी महिलाओं के हिस्से में 1-3 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई है.

जबकि पुरुषों में, पांच साल तक स्कूली शिक्षा प्राप्त यह कहने वालों का कि वे बेटियों से ज्यादा बेटों को पसंद करते हैं, उनमें 4 प्रतिशत अंक की गिरावट हुई है जबकि आठ वर्ष या अधिक वर्ष स्कूली शिक्षा प्राप्त करने वाली ऐसे पुरुषों के हिस्से में 3 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है.

शहरों में लोग बेटी से ज्यादा रखते हैं बेटों की चाह

शहरी इलाकों में, पुरुषों और महिलाओं के एक उच्च हिस्से ने कहा कि वे बेटियों से ज्यादा बेटों को पसंद करते हैं. हालांकि, बेटों को वरियता देने वाले शहरी पुरुषों की संख्या में 3 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई है. यह आंकड़े 2005-06 में 13.6 फीसदी से बढ़ कर 2015-16 में 16.4 फीसदी हुए हैं. वहीं इसी अवधि के दौरान, शहरी महिलाओं में बेटों चाहत रखने वालों में 0.2 प्रतिशत अंक की वृद्धि हुई यानी यह आंकड़े 14 फीसदी से 14.2 फीसदी हुआ है.

एक वैचारिक संस्था ‘इंडिया ब्रांच ऑफ द पॉपुलेशन काउंसिल में सहयोगी, राजिब आचार्य कहते हैं, 'आप दूसरे और प्रथम जन्म या तीसरे और दूसरे जन्म के बीच अंतराल के बारे में बात कर रहे हैं. शादी में बढ़ती उम्र के साथ, 15-19 वर्ष की आयु के लड़कियों के समूह में 2006 की तुलना में वर्ष 2016 में अधिक वंचित लड़कियों की संख्या शामिल है. तो, यह असामान्य नहीं है, यदि आप वर्षों में जन्म के अंतराल में गिरावट देखते हैं.'

आचार्य ने कहा, 'अधिक शिक्षित महिलाओं के बीच में बेटियों की तुलना में अधिक बेटों की इच्छा रखने वालों के बारे में जान कर मुझे आश्चर्य नहीं हो रहा है.' उन्होंने समझाया कि, इस समूह में प्रजनन क्षमता में काफी कमी आई है, और अब प्रतिस्थापन के स्तर से कम है ( प्रति महिला 2.2 बच्चे )

आचार्य ने तर्क दिया,भारतीय अभी भी मानते हैं कि एक बेटा एक बेटी से बेहतर है. परिवार के आकार गिर रहे हैं, लेकिन यह अधिक संभावना है कि परिवार कम से कम एक बेटा चाहता है. वह कहते हैं, 'इसलिए आप शहरी इलाकों में रहने वाले या जो निश्चित स्तर से अधिक शिक्षित हैं, उनके बीच बेटे की वरीयता में मामूली वृद्धि देखते है.'

(विवेक विपुल की इंडिया स्पेंड के लिए रिपोर्ट)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi