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एबीवीपी को अगर डूसू अध्यक्ष को हटाना ही था तो दो महीने के बाद क्यों हटाया?

अंकिव बसोया के इस्तीफे के बाद एक बार फिर से दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) छात्रसंघ की राजनीति गर्मा सकती है. कई छात्र संगठनों ने अंकिव बसोया के फर्जी डिग्री मामले में डीयू प्रशासन और एबीवीपी पर मिलीभगत का आरोप लगाया है.

Updated On: Nov 15, 2018 09:13 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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एबीवीपी को अगर डूसू अध्यक्ष को हटाना ही था तो दो महीने के बाद क्यों हटाया?

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद(एबीवीपी) ने डूसू अध्यक्ष पद पर निर्वाचित अंकिव बसोया से डूसू अध्यक्ष पद छीन लिया है. एबीवीपी का कहना है कि फर्जी डिग्री मामले की जांच खत्म होने तक संगठन की सभी जिम्मेदारियों से अंकिव बसोया को मुक्त रखा गया है. बृहस्पतिवार को अंकिव बसोया ने भी डूसू अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. अंकिव बसोया के इस्तीफे के बाद एक बार फिर से दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) छात्रसंघ की राजनीति गर्मा सकती है. कई छात्र संगठनों ने अंकिव बसोया के फर्जी डिग्री मामले में डीयू प्रशासन और एबीवीपी पर मिलीभगत का आरोप लगाया है. एनएसयूआई और सीवाईएसएस ने तो दोबारा से डूसू चुनाव कराने की मांग कर डाली है.

बता दें कि पिछले दो महीनों की लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार एबीवीपी ने डूसू अध्यक्ष अंकिव बसोया पर अपना रुख साफ कर दिया. काफी खींचतान के बाद गुरुवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कहा कि जब तक अंकिव बसोया के खिलाफ जांच पूरी नहीं हो जाती तब बसोया को एबीवीपी के सभी पदों से हटा दिया गया है. एबीवीपी के मुताबिक, ‘हम इस प्रक्रिया में डीयू की तरफ से की गई देरी की निंदा करते हैं. पिछले कुछ दिनों से कैंपस में अध्यक्ष पद की गरिमा पर उठ रहे सवाल के बाद यह निर्णय जरूरी हो गया था. एबीवीपी किसी भी तरह के गैरकानूनी काम को सपोर्ट नहीं करती. एबीवीपी हमेशा छात्रों के हित में काम करती है.’

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बता दें कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद पर जीते अंकिव बसोया की फर्जी डिग्री को लेकर आम आदमी पार्टी की छात्र विंग सीवाईएसएस और एनएसयूआई लगातार कार्रवाई की मांग करती रही है.

सीवाईएसएस के प्रदेश महासचिव हरीओम प्रभाकर फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘अंकिव बसोया को अध्यक्ष पद से दो महीने पहले ही बर्खास्त कर दोबारा से चुनाव कराए जाने चाहिए थे, लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और डीयू प्रशासन दोनों अंकिव बसोया को बचाने के लिए अंत तक प्रयास करते रहे. देखिए छात्र संघ चुनाव को अब 2 महीने हो गए हैं. लिंगदोह कमिटी के अनुसार कानूनी कार्रवाई दो महीने के अंदर पूरी करनी होती है. केंद्र सरकार के दबाव डीयू प्रशासन ने जानबूझकर जांच प्रक्रिया में ढिलाई बरती, लिंगदोह की अनुसार अगर दो महीने के अंदर दोबारा चुनाव नहीं कराए गए तो फिर चुनाव नहीं हो सकेंगे.’

सीवाईएसएस अंकिव बसोया को इस समय अध्यक्ष पद से हटाने के फैसले को एक सोची समझी साजिश का हिस्सा करार दे रही है. सीवाईएसएस का कहना है कि एबीवीपी को पहले ही पता था कि अंकिव बसोया की डिग्री फर्जी है, बावजूद इसके केंद्र सरकार ओर इलेक्शन कमीशन ने मिल कर इस साजिश को अंजाम दिया, अब लिंगदोह कमेटी के अनुसार दो महीने पूरे हो चुके हैं और अब दोबारा चुनाव प्रक्रिया होना नामुमकिन है.

सीवाईएसएस के अध्यक्ष सुमित यादव का भी यह भी कहना है कि सीवाईएसएस ने 18 सितंबर 2018 को ही एक मेमोरेंडम जारी कर अंकिव बसोया के इस्तीफे की मांग की थी और डिग्री की जांच करने की अपील की थी, लेकिन इसे अब तक लटका कर रखा गया.

सीवाईएसएस का कहना है कि एबीवीपी का यह फैसला केवल दिखावा है ताकि डीयू उपाध्यक्ष को अध्यक्ष पद की जगह मिल जाए. डीयू उपाध्यक्ष पद पर शक्ति सिंह निर्वाचित हए थे.

सीवाईएसएस का आरोप है कि ये वही शक्ति सिंह हैं, जिन्होंने जाकिर हुसैन कॉलेज में गुंडागर्दी को बढ़ावा दिया,उसे अध्यक्ष पद की जगह तक पहुंचाने के लिए ये सारी मिलीजुली साजिश रची गई. ऐसा रवैया भविष्य में छात्रों के बीच चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठाएगा और बाहुबल को बढ़ावा देगा.

दरअसल, अंकिव बसोया के जीतने के कुछ दिन बाद ही एनएसयूआई ने बसोया की स्नातक की डिग्री को फर्जी बताया था. बाद में तिरुवल्लुवर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने तमिलनाडु के शिक्षा प्रधान सचिव को लिखित में कहा था कि अंकिव बसोया ने उनकी यूनिवर्सिटी में कभी दाखिला लिया ही नहीं.

चिट्ठी में रजिस्ट्रार ने लिखा था कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट यूनियन अध्यक्ष अंकिव बसोया ने उनकी यूनिवर्सिटी में कभी दाखिला लिया ही नहीं और न ही उनकी यूनिवर्सिटी के किसी कॉलेज के वो छात्र रहे हैं.

DUSU

प्रतीकात्मक

तिरुवल्लुवर यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने साफ लिखा है कि बसोया ने डीयू में जो सर्टिफिकेट जमा किया है वह फर्जी है. उनकी यूनिवर्सिटी ने ऐसा कोई सर्टिफिकेट उन्हें जारी ही नहीं किया. इस तरह का कोई छात्र उनके किसी भी कॉलेज में नहीं था. उन्होंने बताया कि परीक्षा नियंत्रक ने अपने कार्यालय से पूरी जांच करने के बाद एक पत्र भेजा है, जिसमें साफ लिखा है कि अंकिव बसोया द्वारा दिखाया गया सर्टिफिकेट फर्जी है.

अंकिव ने तिरुवल्लुवर यूनिवर्सिटी की यह अंडर ग्रेजुएट की डिग्री दिल्ली यूनिवर्सिटी के एमए प्रोग्राम में एडमिशन लेने के लिए दी थी. फर्जी डिग्री को लेकर विवाद बढ़ने के बाद डीयू ने जांच के आदेश दिए थे.

बता दें कि इस साल सितंबर महीने में ही डीयू छात्र संघ चुनाव में 44.66 फीसदी मतदान हुआ था. जिसमें एबीवीपी ने शानदार जीत दर्ज की थी. एबीवीपी ने इस चुनाव में चार पदों में से तीन पर कब्जा जमा लिया था. एनएसयूआई के खाते में सचिव पद आया था. बसोया ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की तरफ से डूसू चुनाव में अध्यक्ष पद लड़ा था और उसमें जीत हासिल की थी.

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