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DUSU चुनाव: जातीय समीकरण और धनबल-बाहुबल के साथ जंग जीतने की कवायद में कौन कामयाब होगा?

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव प्रचार मंगलवार को थम गया. डूसू चुनाव के लिए 12 सितंबर को मतदान होगा.

Updated On: Sep 11, 2018 10:14 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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DUSU चुनाव: जातीय समीकरण और धनबल-बाहुबल के साथ जंग जीतने की कवायद में कौन कामयाब होगा?
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दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव प्रचार मंगलवार को थम गया. डूसू चुनाव के लिए 12 सितंबर को मतदान होगा. चुनाव प्रचार के आखिरी दिन सभी उम्मीदवारों ने कैंपेन में पूरी ताकत झोंक दी. उम्मीदवारों ने मंगलवार सुबह से ही दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों का दौरा किया. पिछले कई दिनों से डूसू चुनाव की सरगर्मियां पूरे शबाब पर थीं. कैंपस में नारों की गूंज, उम्मीदवारों के द्वारा डीयू के हर कॉलेज में ज्यादा से ज्यादा पहुंचने की जद्दोजहद के बीच कैंपस के असल मुद्दों पर छात्र संगठनों ने जोर नहीं दिया.

ऐसे में सवाल उठता है कि छात्रसंगठनों के द्वारा हर साल इतनी मेहनत क्यों की जाती है? क्या चुनाव जीत कर ये लोग कैंपस में कुछ बदलाव ला पाते हैं? आखिर में इनके चुनावी मुद्दे क्या हैं? और क्या इन चुनावी मुद्दों पर अगर छात्रसंगठन चुनाव लड़ें तो क्या जीत मिल पाती है?

दिलचस्प बात यह है कि इस साल का डूसू चुनाव 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हो रहा है. आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए इस बार का डूसू चुनाव को काफी अहम माना जा रहा है. इसी का नतीजा है कि सभी पार्टियों के छात्र संगठनों के द्वारा अपने-अपने प्रत्याशियों के चयन में काफी सावधानी और सतर्कता बरती है. इस बार छात्र संगठनों के द्वारा मुख्यतौर पर मेट्रो पास, नए हॉस्टल्स का निर्माण, कैंपस के लिए स्पेशल बस, बसों के पास के लिए काउंटर की संख्या में बढोतरी, कैंपस में सीसीटीवी लगाने और एससी/एसटी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति की मांगों को प्रमुख तौर पर उठाया गया.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

बीते कई दिनों से दिल्ली विश्वविद्यलय के अंदर का नजारा बिल्कुल बदला-बदला सा नजर आ रहा था. चुनावी सरगर्मियों के बीच कुछ ऐसे भी छात्र मिले, जिनका मिजाज और नजरिया बिल्कुल अलग था. इन छात्रों का मानना था कि कैंपस के अंदर बुनियादी मुद्दे गायब हैं. उम्मीदवारों के द्वारा बुनियादी मुद्दों से अधिक धनबल और बाहुबल की राजनीति हावी हो रही है.

इन छात्रों का मानना है कि चुनाव बेशक लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों और दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर हो रहे हैं, पर कैंपस पोस्टर-बैनर से पटा हुआ है. कैंपस के चारों तरफ शोर-गुल हो रहा है. देर रात तक कॉलेजों के हॉस्टल्स में सरगर्मियां बनी रहती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में लग्जरी गाड़ियों के काफिले के साथ दूसरे लोगों का भी जमावड़ा काफी है. बेशक घोषणापत्र में हर संगठन ने कैंपस के मुद्दों को प्राथमिकता के तौर पर रखा, लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान असल मुद्दे इन उम्मीदवारों के मुंह से गायब नजर आए.

बता दें कि एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार सनी छिल्लर और एबीवीपी के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अंकिव बसोया ने मंगलवार को कई कॉलेजों का दौरा किया. सीवाईएसएस और आइसा के अध्यक्ष पद के संयुक्त उम्मीदवार अभिज्ञान भी ज्यादा समय कॉलेजों का दौरा करने में ही लगाया. एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद के लिए सन्नी छिल्लर, उपाध्यक्ष पद के लिए लीना, सचिव पद के लिए लीना और ज्वॉइंट सेक्रेटरी पद के लिए सौरभ यादव को उम्मीदवार बनाया है.

एबीवीपी ने अंकिव बसोया को प्रेसिडेंट, शक्ति सिंह को वाइस प्रेसिडेंट, सुधीर डेढ़ा को सेक्रेटरी और ज्योति चौधरी को ज्वाइंट सेक्रेटरी पद का उम्मीदवार बनाया है. आइसा और सीवाईएसएस के संयुक्त पैनल ने इस बार अध्यक्ष पद के लिए अभिज्ञान और वाइस प्रेसिडेंट के लिए अंशिका सिंह को उम्मीदवार बनाया है. वहीं सीवाईएसएस सेक्रेटरी पद के लिए चंद्रमणि देव और ज्वाइंट सेक्रेटरी पद के लिए सन्नी तंवर को मैदान में उतारा है.

डूसू चुनाव के लिए तीनों प्रमुख छात्र संगठनों ने अपने-अपने पैनल को चुनते वक्त जातिगत समीकरणों का विशेष ख्याल रखा है. सभी छात्र संगठनों ने अपने-अपने पैनल में जाट-गुर्जर और ओबीसी उम्मीदवारों को दूसरे जाति के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी है. कैंपस में छात्राओं से जुड़े मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की बात करने वाले इन छात्र संगठनों ने लड़कियों की भागीदारी को भी विशेष तरजीह नहीं दी. तीनों पैनल्स मिलाकर सिर्फ तीन लड़कियां और दो स्वतंत्र उम्मीदवार ही मैदान में हैं. लिहाजा इस बार भी छात्र संगठनों ने उम्मीदवारों को चुनते वक्त मनी और मसल्स पावर पर ही विशेष ध्यान रखा है.

NSUI, ABVP और AISA-CYSS के गठबंधन ने एक-एक लड़की को मैदान में उतारा है. अध्यक्ष पद पर एक, उपाध्यक्ष पद पर तीन, सचिव पद पर एक भी नहीं और सह सचिव के पद पर एक लड़की चुनाव मैदान में है. ABVP ने अध्यक्ष पद के लिए गुर्जर समुदाय से आने वाले अंकिव बसोया को टिकट दिया है. ABVP का कहना है कि अंकिव बसोया दिल्ली से आते हैं और पिछले 5-6 सालों से संगठन से जुड़े हैं. अंकिव का कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है और विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दे को अंकिव जोर-शोर से उठाते रहे हैं. छात्रों को मेट्रो में पास और डीयू के हर कॉलेज के कैंपस में सैनिटरी नैपकिन, वेंडिंग मशीन लगाना अंकिव की प्राथमिकता में सबसे ऊपर है.

वहीं उपाध्यक्ष पद पर NSUI ने दिल्ली की रहने वाली लीना को मौका दिया है. कहा जा रहा है कि एनसयूआई ने पहले उपाध्यक्ष पद के लिए आकाश चौधरी का नाम रखा था, लेकिन आकाश चौधरी अध्यक्ष पद का टिकट मांग रहे थे. ऐसा कहा जा रहा है कि ABVP के उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी शक्ति सिंह के सामने आकाश चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे. लिहाजा NSUI ने उपाध्यक्ष पद के लिए दलित और वह भी महिला कार्ड खेल दिया.

ABVP के उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी शक्ति सिंह पूर्वांचल से आते हैं और राष्ट्रीय स्तर के बॉक्सर भी रह चुके हैं. कैंपस में पूर्वांचली वोटरों की अच्छी-खासी तादाद को देखते हुए ही आकाश चौधरी ने लड़ने से मना कर दिया. शक्ति सिंह साल 2010 में राज्य और नेशनल स्तर के टूर्नामेंट खेल चुके हैं. शक्ति सिंह यूपी के बलिया जिले के रहने वाले हैं. इससे पहले उनके दादा राजनीति में थे. कुलमिलाकर ABVP ने यूपी-बिहार के वोटों को अपनी और खींचने के लिए शक्ति सिंह को मैदान में उतारा है.

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DUSU चुनाव में सालों से कब्जा जमाए ABVP और NSUI के दबदबे को इस बार AISA और CYSS से कड़ी चुनौती मिल रही है. CYSS-AISA के लगभग सारे कैंडिडेट फ्रेशर्स हैं. दोनों का संयुक्त गठबंधन पूरे कैंपस में बदलाव रैली निकाल कर छात्रों को इस बार बदलाव का नारा दे रही है. CYSS ने जॉइंट सेक्रेटरी पोस्ट के लिए सनी तंवर को मैदान में उतारा है. सन्नी तंवर गुर्जर बताए जा रहे हैं.

कुलमिलाकर दिल्ली विश्वविद्यालय DUSU चुनाव के रंग में पूरी तरह रंग गया है. कैंपस की राजनीति में भी गर्माहट आ गई है. छात्रनेता पूरे जोर-शोर से खुद को बेहतर साबित करने में लगे हुए हैं. ये वही लोग हैं जो चुनाव के ऐन वक्त पहले छात्रिहत की बात ताल ठोंक कर करते हैं. लेकिन चुनाव जीतने के बाद इन छात्र संगठनों की प्राथमिकता में न छात्र होते हैं और न ही छात्रहित.

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