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DUSU चुनाव नतीजे: NSUI की इस अंगड़ाई के आगे बड़ी लड़ाई

यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जनता ने पूरी तरह से मन बना लिया है लेकिन डूसू आदि के नतीजे जन-जन के मन में व्याप्त असंतोष की सुगबुगाहट का पता देते हैं.

Ragini Nayak Updated On: Sep 14, 2017 05:35 PM IST

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DUSU चुनाव नतीजे: NSUI की इस अंगड़ाई के आगे बड़ी लड़ाई

13 दिसंबर, 1947 के दिन जवाहरलाल नेहरू ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में यूनिवर्सिटीज के महत्व को समझाते हुए कहा था कि, 'एक विश्वविद्यालय मानवता का, सहिष्णुता का, समझ-बूझ का, विकास का, विचारों की स्वतंत्रता और सत्य की खोज का प्रतीक होता है. यह प्रतीक होता है महान लक्ष्यों की ओर मानव जाति के निरंतर प्रगतिशील होने का.'

साथ ही पंडित नेहरू ने एक वाजिब सवाल भी पूछा कि अगर शिक्षा का मंदिर ही संकीर्णता, कट्टरता और तुच्छ लक्ष्यों का घर बन जाए तो एक राष्ट्र प्रगति कैसे करेगा और देशवासियों का कद और सम्मान कैसे बढ़ेगा?

रागिनी नायक डूसू की प्रेसिडेंट रह चुकी हैं

रागिनी नायक डूसू की प्रेसिडेंट रह चुकी हैं

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) के चुनावों का नतीजा 'नेहरूवियन विज़न' की प्रासंगिकता और उस पर छात्र शक्ति के विश्वास का जीता जागता उदाहरण है. इतिहास गवाह है कि बदलाव की लहर को उफान देने का काम, परिवर्तन को गतिशीलता देने का काम छात्रों और नौजवानों के जिम्मे होता है.

सोचने, समझने और असहमत होने की आजादी चाहिए

कहा जाता है कि राष्ट्र के नवनिर्माण की नींव का पत्थर नौजवान ही अपने कंधे पर ढोते हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र सुमदाय ने NSUI को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर जिताकर ये स्पष्ट कर दिया है कि छात्र ऐसा विश्वविद्यालय नहीं चाहते जहां सोचने, समझने, सवाल पूछने की आजादी न हो, जहां असहमति को देशद्रोह का नाम दिया जाता हो और विरोध का जवाब विध्वंस से मिलता हो, जहां स्वायत्तता और सपनों पर संघ का पहरा हो, जहां शैक्षणिक और प्रशासनिक निर्णयों पर सरकार का सीधा दबाव हो और जहां नियुक्ति का मापदंड भी संघभक्ति हो.

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छात्र शक्ति ने न सिर्फ कैंपस से सांप्रदायिक, विभाजनकारी, भय और आतंक का माहौल बनाने वाली शक्तियों को उखाड़ फेंका है बल्कि एक बेहद वाचाल, बड़बोली लेकिन निष्क्रिय सरकार की गत भी बना दी. लाजिम है कि इस अंगड़ाई के आगे की लड़ाई का नतीजा भी हम कुछ ऐसा ही देखेंगे.

एबीवीपी की हार से युवाओं से दूर हो गई बीजेपी

दिल्ली विश्वविद्यालय को 'मिनी इंडिया' के रूप में देखा जाता है. देश के कोने-कोने से, मेधावी छात्र-छात्राएं यहां पढ़ने के लिए आते हैं. संख्याबल के आधार पर डूसू का चुनाव देश का सबसे बड़ा छात्रसंघ का चुनाव है जहां एक लाख से ज्यादा छात्र वोटर हैं. इसलिए डूसू के नतीजे से देश के युवाओं का रुझान पता चलता है.

पिछले डूसू चुनाव में अमित शाह ने एबीवीपी की जीत पर कहा था कि ये साबित हुआ है युवा शक्ति बीजेपी के साथ है. तो ये अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि डूसू के साथ साथ राजस्थान, पंजाब, जेएनयू, और गुवाहाटी छात्र संघ चुनावों में विद्यार्थी परिषद की शिकस्त अब यह ऐलानिया बताती है कि युवाशक्ति का समर्थन बीजेपी ने खो दिया है.

Demonstrators shout slogans during a protest against the rape and murder of a law student in the southern state of Kerala, in Mumbai, India

निश्चित ही यह असंतोष जो शैक्षणिक परिसरों में सामने आया उसका कोई एक कारण नहीं है. तीन वर्षों से संघ, भाजपा और सराकार ने देश में शिक्षा व्यवस्था के ढांचे पर जो चोट की है उसकी गूंज आज इन परिणामों के रूप में चारों ओर सुनाई दे रही है. शिक्षा के बजट में कटौती से लेकर अंतरराष्ट्रीय व्यापार संघ में शिक्षा को बिकाऊ सेवा (ट्रेडेबल सर्विस) के रूप में प्रस्तुत करने तक, अनिल काकोड़कर, प्रवीन सिन्क्लेयर जैसे शिक्षाविदों को पदविमुक्त करने से लेकर बलदेव शर्मा, ज़फ़र सरेशवाला, गजेन्द्र चौहान जैसे संघ और मोदी भक्तों की नियुक्ति तक, नेहरू और टैगोर को पाठ्यक्रम से हटाने के प्रस्ताव से ले कर IIT मद्रास में अम्बेडकर पेरियार स्टडि सर्कल बंद करवाने तक, NIT श्रीनगर में तिरंगा विवाद से ले कर, फ़रग्यूसन कॉलेज पुणे में छात्रों पर लाठी चार्ज तक. रोहित वेमुला और डेल्टा मेघवाल की त्रासदी से ले कर जेएनयू में टैंक लगवाने के प्रस्ताव तक संघ और सरकार की छात्र विरोधी नियत और नीति अब बहते पानी की तरह साफ हो गई है.

एबीवीपी की गलतियों ने डूबा दिया

इसी साल फरवरी के महीने में दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में गुंडागर्दी, बदमाशी और अराजकता का जो वीभत्स परिदृश्य विद्यार्थी परिषद ने रचा था, उसे भी छात्र समुदाय ने याद रखा. भूले ये भी नहीं कि एक तरफ तो प्रधानमंत्री लालकिले के प्राचीर से देश को भ्रष्टाचार मुक्त करने का ऐलान करते हैं और दूसरी तरफ एबीवीपी के डूसू के पदाधिकारी 22 लाख के स्टूडेंट फंड की चाय पी जाते हैं. शायद यही मोदी जी की चाय पर चर्चा का उदाहरण है.

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आज का युवा आधुनिक सोच वाला है, वो ऐसी शिक्षा व्यवस्था चाहता है जो ज्ञान, श्रम और रोजगार से जुड़ी हो. वो जानता है कि पिछले तीन सालों में जैसा अशांत माहौल विश्वविद्यलयों में रचा गया है उसमें शांतचित्त से पढ़ाई संभव नहीं है. मंहगाई, असुरक्षा, परिवहन, होस्टल आदि से जुड़ी समस्याऐं उसे मथती हैं. छात्र जीवन की असुरक्षा और बेरोजगारी की चपेट से उसका जीवन बेहाल है.

लार्जर दैन लाइफ इमेज से कुछ नहीं होगा

जब वो अपने चारों ओर देखता है तो पाता है कि गवर्नेंस का अपना बुनियादी काम छोड़, एनडीए की केद्र और बीजेपी की राज्य सरकारें देश-समाज-लोकतंत्र के लिए घातक कार्यक्रमों में लगी हैं. सांइटिफिक टेम्पर पर धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद को हावी करने की कवायद चल रही है. इसीलिए खोखले नारों-वादों के फेर में पड़े युवजनों की आंखों से अब पर्दा हटता जा रहा है और उनके सामने सरकार, पार्टी और संघ का असली चेहरा बेनकाब हो रहा है.

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आजकल एक मजाक चल रहा है कि देश के एक प्रधानमंत्री ने टीवी दिया, एक ने कंप्यूटर दिया और एक ने इंटरनेट दिया. और फिर, इन तीनों साधनों ने मिलकर एक ऐसा प्रधानमंत्री दिया जो निरंतर कहता है कि सत्तर साल में देश में कुछ नहीं हुआ.

मोदी की 'लार्जर देन लाइफ' की आभासी छवि मीडिया और सोशल मीडिया की देन है. उनकी ताकत अमूल है. यही नहीं, लगभग सारे उद्योगी घराने भी उनके साथ हैं. मोदी जी की आभासी छवि के तड़कने का सबसे बड़ा प्रमाण छात्रों-युवाओं को ध्यान में रखते हुए विवेकानंद जयंती पर उनके विशेष उद्बोधन के ऐन पहले जेएनयू के नतीजों ने दे दिया और भाषण के अगले दिन ही बड़ी संख्या में वोट देने निकले दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने भी. छात्र समुदाय ने विवेकानंद की सामाजिक समंवय और धार्मिक सहिष्णुता वाली बात याद रखी और इस महान भारतीय की सीखों के उलट काम करने वालों को सबक सिखा दिया.

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यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि जनता ने पूरी तरह से मन बना लिया है लेकिन डूसू आदि के नतीजे जन-जन के मन में व्याप्त असंतोष की सुगबुगाहट का पता देते हैं. भादो भर सरकार के सिर पर बिजलियां कड़कती रहीं. विश्वविद्यालयों के चुनावों के नतीजे क्वार की धूप में उसे झुलसा रहे हैं.

राजनीति के घाघ, सत्ताप्रेमी, निर्मम संघ परिवार की टेक आपसी शत्रुता पर टिकी है. हिंसा, आतंक, नफरत, आतंक, झूठ, फ़रेब, अफवाह उनकी राजनीति के मुख्य कार्यवाहक हैं. इन पर एक चुनावी विजय हो भी जाए तब भी निरंतर, अहर्निश चौकस रहने की जरूरत है, तभी हम लंबे संघर्षों के बाद अर्जित अपनी स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सामाजिक विविधता को कायम रख पाएेंगे.

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