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मूर्ति विसर्जन विवाद : क्या तृणमूल का ये आत्मघाती गोल है?

यह दुविधा और नरम हिंदुत्व की राह दरअसल ममता बनर्जी के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकती है क्योंकि यह सीधे-सीधे बीजेपी के अखाड़े में उतरकर मुकाबला करने जैसा है

Updated On: Sep 24, 2017 05:32 PM IST

Sreemoy Talukdar

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मूर्ति विसर्जन विवाद : क्या तृणमूल का ये आत्मघाती गोल है?

दुर्गा मूर्ति-विसर्जन विवाद को लेकर ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया से जाहिर होता है कि अपनी सियासत को लेकर वे गहरे असमंजस में हैं. एक जुझारू जननेता अपने करियर में पहली दफे अनिश्चय की हालत में पड़ा दिखाई दे रहा है. सामने एक दमदार, चतुर और साधन-संपन्न प्रतिद्वन्द्वी खड़ा है और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो के कदम डगमगा रहे हैं. ममता ने लगातार गलत कदम उठाए हैं और बीजेपी ने निश्चिंत ही इस बात को नोट किया होगा.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने अपनी तरफ से खूब चतुराई बरतने की कोशिश की लेकिन इस चतुराई के चक्कर में गोल अपनी ही तरफ हुआ दिखाई दे रहा है. बीजेपी के हिंदुत्व की काट में ममता बनर्जी ने बंगीय सांस्कृतिक श्रेष्ठता को आगे करने की योजना बनाई और यह योजना उपयोगी साबित हो रही थी. बीजेपी हाल-फिलहाल समझ नहीं पा रही थी कि दुर्गा पूजा में, जो कि बंगाल का सबसे बड़ा सांस्कृतिक (सिर्फ धार्मिक नहीं) त्योहार है, वह किस तरह पहचान की राजनीति शुरू करे.

ममता बनर्जी को मूर्ति-विसर्जन के दिन में फेरबदल करने या फिर विसर्जन के समय पर पाबंदी लगाने की जरूरत ही नहीं थी. ममता ने ऐसा करके बीजेपी को नैतिक जीत दर्ज करने का एक मौका दे दिया. इससे भी ज्यादा बुरी बात ये है कि फरमान जारी करने के बाद के वक्त से ममता का हर कदम असमंजस भरा, डावांडोल और बहुत हद तक अंतर्विरोधी साबित हुआ है जो कि उनके भीतर घर करती घबराहट की सूचना देता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (रायटर)

पश्चिम बंगाल की सरकार ने पहले ऐलान किया कि मर्ति-विसर्जन दशमी (30 सितंबर, शनिवार) को 6 बजे शाम तक किया जा सकेगा इसके बाद विसर्जन पर पाबंदी 2 अक्तूबर के दिन हटेगी. बंगाल में मूर्तिम-विसर्जन के लिए दशमी का दिन ही परंपरागत रूप से तय है. अगर मुख्यमंत्री को कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की चिंता सता रही थी तो उससे निपटने का यह एक बेवकूफी भरा तरीका था. शिया मुसलमानों के मातम का दिन मुहर्रम 1 अक्तूबर(रविवार) को है इसलिए दशमी को मूर्ति-विसर्जन पर रोक लगाने की जरूरत नहीं थी.

अदालत में घसीटे जाने पर सूबे की सरकार झुक गई और उसने 10 बजे रात तक मूर्ति-विसर्जन की अनुमति दे दी. फरमान नए सिरे से जारी हुआ और पुराने फरमान के बारे में कहा गया कि उसको टाइप करते वक्त कुछ भूल हो गई थी.

लेकिन बात यहीं नहीं रुकी. 1 अक्तूबर को विसर्जन पर रोक के विरुद्ध अदालत में आई तीन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश राकेश तिवारी और जस्टिस हरीश टंडन ने सूबे की सरकार को लगातार दो दिन तक अदालत में बुलाया. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार के दिन अदालत ने सूबे की सरकार से कहा, 'मुर्ति विसर्जन पर रोक लगाकर अपनी नाकाबिलियत को मत छिपाइए'. कोर्ट के मुताबिक नागरिक को संविधान ने धर्म के पालन का अधिकार दिया है और कोई सरकार इस अधिकार पर महज इस आशंका को आधार बनाकर रोक नहीं लगा सकती कि कानून-व्यवस्था की हालत बिगड़ सकती है.

गुरुवार के दिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता सरकार के फरमान को रद्द करते हुए हर रोज 12 बजे दिन तक मूर्ति विसर्जन का आदेश जारी किया. साथ ही, अदालत ने सूबे की सरकार को सख्त लफ्जों में याद दिलाया, 'आप हद दर्जे तक ताकत का इस्तेमाल कर रहे हैं और वह भी बिना किसी आधार के. आप सरकार हैं, लेकिन क्या इसका मतलब यह होता है कि आप मनमाने आदेश जारी करें ?'

kolkata high court

अपने 18 पन्ने के आदेश में अदालत ने कहा है, 'सब जानते हैं कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होता, यह धर्मनिरपेक्षता की बुनियादी बात है. धार्मिक कर्मकांड, रीति-रिवाज, त्योहार और मातम के पालन को लेकर विभिन्न धर्म-समुदायों को कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता. ना ही किसी नजीर का हवाला दिया जा सकता है. हर नागरिक के साथ समानता का बरताव होना चाहिए. इसी मुताबिक राज्य को चाहिए कि वह हर नागरिक के अधिकार की सुरक्षा की समान रूप से गारंटी करे.'

ऐसे मौके पर किसी मुख्यमंत्री के लिए समझदारी की बात होती कि वह कोर्ट के आदेश को मान लेता, कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए ताजिया के जुलूस और मूर्ति-विसर्जन के लिए अलग-अलग रास्तों का निर्धारण करता, पुलिस-बल के पर्याप्त बंदोबस्त के साथ मूर्ति विसर्जन और ताजिया के निर्धारित रास्तों के बारे में बहुत पहले से लोगों के बीच ऐलान करना शुरू करता.

लगता है, मुख्यमंत्री ने कोर्ट की फटकार को सीधे अपने दिल पर ले लिया. बेशक, खुले तौर पर उन्होंने अपनी असहमति जाहिर नहीं की है लेकिन इस बात मे शक की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी कि वे कोर्ट के आदेश से असहमत हैं. कोर्ट के आदेश के तुरंत बाद तकरीबन जाहिर सी लगती आलोचना में उन्होंने (ममता बनर्जी) कहा, 'सूबे में शांति बनाए रखने के लिए मुझसे जो कुछ हो सकेगा, मैं करूंगी. कोई चाहे तो मेरा गला काट सकता है लेकिन कोई भी यह नहीं बता सकता कि मुझे क्या करना है?

मीडिया की खबरों से जान पड़ा कि सूबे की सरकार हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. लेकिन बाद में तृणमूल कांग्रेस के सांसद ने कहा कि ऐसी कोई योजना नहीं है और उसने दावा किया कि हाईकोर्ट का आदेश सरकार के पक्ष में है.

कल्याण बनर्जी ने न्यूज18 को कहा, 'ज्यादातर मीडिया रिपोर्टों ने गलत सूचना दी कि हाईकोर्ट ने मुहर्रम के दिन मर्ति विसर्जन ना करने के आदेश को रद्द कर दिया है. दरअसल कोर्ट का आदेश हमारे पक्ष में गया है. हमलोग सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएंगे क्योंकि कोर्ट का आदेश हमारे पक्ष में है. कुछ लोग मुद्दे का राजनीतिकरण करना चाहते हैं, उन्हें ऐसा करने दीजिए..'

इतना कहना शायद काफी नहीं लगा जो तकरीबन अडिग जान पड़तीं ममता बनर्जी ने शुक्रवार के दिन एक और आदेश जारी किया. इंडिया टुडे की खबर के मुताबिक आदेश में कहा गया कि दुर्गा पूजा आयोजित करने वाले हर आयोजक को मुर्ति विसर्जन के लिए सरकार से अनुमति मांगनी होगी.

ममता इस बात पर अडिग हैं कि ये सारे आदेश कानून-व्यवस्था की स्थिति को बनाए रखने के लिहाज से जारी किए गए हैं. और एक हद तक उनकी बात सही भी है क्योंकि राज्य में हाल के दिनों में सांप्रदायिक संघर्ष की छिटपुट घटनाएं हुई हैं. लेकिन ममता बनर्जी के आदेशों में स्पष्टता नहीं है और इसी कारण किसी और के लिए उनके तर्क को गले उतार पाना कठिन लग रहा है.

तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी की एक-दूसरे से होड़ करती पहचान की राजनीति ने सूबे में सियासत का तेजी से ध्रुवीकरण किया है और इस संदर्भ में देखें तो ममता बनर्जी की पहलकदमी को बहुत संभव है हिंदू-विरोधी करार दे दिया जाय. बीजेपी भरसक कोशिश करेगी कि लोगों में यह संदेश जाए.

पिछले साल भी ममता बनर्जी सरकार को कोर्ट की फटकार लगी थी. कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार को अल्पसंख्यों का तुष्टीकरण करने वाला बताया था.

MamtaBanerjee

जाहिर है, सूबे की बीजेपी इकाई ने भी कोई मौका नहीं गंवाया. अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा, 'बड़े अफसोस की बात है कि सूबे के हिंदुओं को कोई धार्मिक अधिकार नहीं है. उन्हें दुर्गापूजा मनाने के लिए न्यायपालिका का सहारा लेना पड़ रहा है.' आरएसएस के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि एक खास समुदाय के तुष्टीकरण के लिए सत्ताधारी पार्टी हिंदुओं को उनके बुनियादी अधिकार से वंचित कर रही है.

अभिजीत घोषाल ने हिन्दुस्तान टाइम्स में ठीक ही ध्यान दिलाया है कि ममता बनर्जी का मूर्ति-विसर्जन पर रोक लगाना गैर-जरूरी थी क्योंकि शायद ही कोई हिंदू 'एकादशी' (मातृपक्ष की 11 वीं तिथि) को मूर्ति-विसर्जन करता है जबकि मुहर्रम एकादशी (1 अक्टूबर) को ही है. अभिजीत घोषाल के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस का पूजा समितियों पर अच्छा-खासा प्रभाव है और ममता बनर्जी समितियों को अपनी बात मानने के लिए राजी कर सकती थीं.

सोचने वाली बात है कि आखिर ममता बनर्जी ने एक जाहिर सा मौका क्यों गंवाया और बीजेपी को एक बार फिर से यह कहने का अवसर क्यों दिया कि तृणमूल कांग्रेस हिंदू-विरोधी है. एक संभावना तो यह है कि मूर्ति-विसर्जन पर रोक के आदेश जारी करके ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम वोटबैंक को संदेश दिया है. इस तर्क से सोचकर देखें तो कोर्ट की फटकार एक तरह से तृणमूल के हित में है.

यहां जुआ इस विश्वास के साथ खेला गया है कि बंगाल में सांस्कृतिक श्रेष्ठता का भाव बहुत ज्यादा है और इसे देखते हुए माना जा सकता है कि बंगाली हिंदुओं का एक तबका बीजेपी को कभी वोट नहीं देगा. जावेद हबीब के सैलून पर देवी दुर्गा और उनके शिशुओं के खास तरीके के चित्रण या सोशल मीडिया पर एग रोल (एक लोकप्रिय बंगाली स्नैक) को लेकर मचे हाल के विवाद से जाहिर होता है कि बीजेपी अब भी बंगाली जनमानस को समझ नहीं पाई है. बंगाल में सांस्कृतिक पहचान बाकी सारी पहचानों पर भारी पड़ती है. सख्त हिन्दुत्व की राजनीति की दाल शायद यहां नहीं गलने वाली.

दूसरी संभावना यह जान पड़ती है कि ममता बनर्जी ने जानते-बूझते ये कदम नहीं उठाए बल्कि उनके कदम आगे की सियासत को लेकर उनके मन में चल रहे ऊहापोह की जानकारी देते हैं. 2011 में ममता बनर्जी ने शानदार जीत दर्ज करते हुए 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था. यह संभव हुआ नंदीग्राम और सिंगूर को लेकर चले सफल विरोध-प्रदर्शन के जरिए. ममता ने किसानों की चिंता को भांप लिया. वो जान गईं कि बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार औद्योगीकरण को गति देना चाहती है और किसानों को लग रहा है कि इससे उनकी जमीन छिन जाएगी.

रजत राय ने इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लिखा है, 'पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 28 प्रतिशत है और अनुसूचित जाति के लोगों की तादाद 23 फीसद है जिसमें ज्यादातर किसान हैं. शासन में आने के बाद इस धार्मिक-सामाजिक समूह के फायदे में ममता बनर्जी की सरकार ने कुछ कदम उठाए. इमाम और मुआज्जिन को भत्ता देने जैसे कुछ कदम प्रतीकात्मक थे लेकिन मुस्लिम आबादी वाले इलाके में कानून-व्यवस्था भंग होने की स्थिति में प्रशासन ने उसकी अनदेखी करने का भी काम किया.'

बंगाल पहचान की राजनीति से ज्यादातर मुक्त रहता आया है लेकिन मुस्लिम वोटबैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए ममता बनर्जी ने पहचान की राजनीति शुरू की जिससे बीजेपी को सूबे में अपने कदम बढ़ाने के लिए राह मिली. दोनों यह खेल जारी रख सकते हैं लेकिन हिंदू और मुस्लिम वोट अपनी-अपनी ओर खींचने की इस होड़ में अब ममता बनर्जी के सामने छवि का संकट आन खड़ा हुआ है. यही वजह है जो ममता बनर्जी ने नरम हिंदुत्व की राह पकड़ते हुए ट्विटर पर दुर्गा पूजा के शुभारंभ की ढेर सारी तस्वीरें पोस्ट कीं और चंडीपाठ करने जैसे कदम उठाए.

यह दुविधा और नरम हिंदुत्व की राह दरअसल ममता बनर्जी के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकती है क्योंकि यह सीधे-सीधे बीजेपी के अखाड़े में उतरकर मुकाबला करने जैसा है. अब देखना यह है कि क्या ममता बनर्जी तनी हुई रस्सी पर बेसहारा चलने जैसा संतुलन साध पाती हैं या नहीं.

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