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छोटे शहरों से डीयू पढ़ने आई लड़कियों के मन के सबसे बड़े डर!!

लड़कों को तो जैसे-तैसे थोड़ी राहत मिल जाती हैं लेकिन लड़कियों की चुनौती ज्यादा हैं

Priyanka Singh Updated On: Oct 10, 2017 04:35 PM IST

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छोटे शहरों से डीयू पढ़ने आई लड़कियों के मन के सबसे बड़े डर!!

स्कूल खत्म होते ही कॉलेज की सतरंगी दुनिया के सपनों को पंख लग जाते हैं जब एडमिशन दिल्ली यूनिवर्सिटी में हो जाता हैं. भारत के टॉप यूनिवर्सिटीज में से एक डीयू में दाखिला मिलना उन बच्चो के लिए किसी सपने से कम नही होता जो सिर्फ डीयू में दाखिले के लिए दिन रात एक करके पढ़ाई करते हैं.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में देश के हर राज्य हर शहर से बच्चे पढ़ने आते हैं. कहा जाता हैं  इस यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए दिल्ली शहर की भी समझ बहुत जरूरी हैं. शायद इसी समझ को समझने का डर उन छात्रों के मन मे बैठा रहता हैं जो पढ़ने के लिए छोटे शहरों से राजधानी आते हैं.

लड़कों को तो जैसे-तैसे थोड़ी राहत मिल जाती हैं लेकिन छोटे शहर की लड़कियों के मन मे बड़े शहरों का डर कुछ खुद होता हैं और कुछ परिवार और समाज डाल देता हैं. डीयू एडमिशन का मौसम है यानी कुछ नए सपने पूरे होने वाले हैं. लेकिन ये सपने किन-किन डरों से घिरे होते हैं. जानते हैं डीयू की उन छात्रओं से जो छोटे शहरों से दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने आई हैं.

1. बड़े शहर की स्पीड को पकड़ना

हिंदू कॉलेज की फर्स्ट ईयर पास आउट छात्रा निधि देशमुख कानपुर से दिल्ली आई हैं. निधि साइंस की पढ़ाई पढ़ रही हैं. निधि हमेशा से एक होनहार छात्रा रही हैं और इसीलिए निधि को मेरिट बेसिस पर आसानी से दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने का मौका मिल गया.

निधि ने बताया कि शुरुआती दिन वाकई बड़े मुश्किल गुजरे और इन मुश्किलों में सबसे बड़ी मुश्किल रही इस शहर की स्पीड को पकड़ना, निधि ने बताया कि अगर बड़े शहर की स्पीड को न पकड़ा जाए तो बड़ी सारी चीजें छूट जाती हैं और नुकसान हमारा होता हैं.

बाथरूम, नाश्ता, बस, क्लास, कैंटीन हर चीज के पीछे-पीछे सबकी स्पीड से भागने के एक साल बाद निधि बताती हैं कि अब सब कुछ नार्मल लगता हैं और ऐसा लगता हैं जैसे शहर ने मुझे और मैंने शहर को अपनाना शुरू कर दिया हैं.

2. फर्राटेदार अंग्रेजी से डर लगता हैं

किरोड़ीमल कॉलेज की छात्रा, बिंदु सिंह बिहार के मुजफरपुर से दिल्ली पढ़ने आई हैं. आर्ट्स की छात्रा बिंदु की मानें तो दिल्ली में पैर रखते ही उनको अंग्रेजी के डर ने पकड़ लिया, मुजफरपुर में सुना था कि दिल्ली में सब बड़ी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं.

दिल्ली आते ही पता चल गया कि अंग्रेजी वाकई जरूरी हैं. बिंदु बताती हैं कि अंग्रेजी बोलने से पहले समझ मे आनी चाहिए. इसीलिए बिंदु ने इस अंग्रेजी के जाल में फंसने से बचन के लिए खुद को अंग्रेजी की दुनिया मे ढाल लिया.

Delhi University

बिंदु बताती हैं, कि बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ने से अपने सब्जेक्ट के अलावा बहुत सारी चीजों को सीखने समझने का मौका मिलता है. अंग्रेजी से डरी सहमी बिंदु एक साल बिताने के बाद कहती हैं कि आखिरकार अपने डर की वजह से अंग्रेजी को इतना अपना चुकी हूं कि अब अंग्रेजी से डर नहीं लगता.

3. अच्छे कपड़े पहनना भी बहुत जरूरी हैं

अनन्या सोनी इंदौर से दिल्ली आई. मिरांडा हाउस की अनन्या बी.ए ऑनर्स की छात्रा हैं. अनन्या अपने शुरुआती दिनों के बारे में बताते हुए कहती हैं कि गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने के लिए लड़कियों के कपड़े देखकर कॉम्प्लेक्स आता था,

कपड़ों से आंके जाने का भी बहुत डर लगता हैं इसीलिए हर वक्त अपने कपड़ों को दूसरी लड़कियों के मुकाबले कम मानती थी. टाइम बीतते-बीतते दोस्ती बढ़ी और कपड़ों की समझ भी बेहतर हो गई. नॉर्थ कैंपस में पढ़ते हुए लड़कियों के कपड़ों के अड्डों से सस्ती और अच्छी शॉपिंग करने के साथ-साथ पूरी पर्सनालिटी में काफी बदलाव आया हैं जो अब अच्छा लगता है.

4. शुद्ध हिंदी बोलने पर सब हंसते हैं

आजमगढ़ से दिल्ली आई जया जायसवाल किरोड़ीमल कॉलेज से हिंदी ओनर्स की पढ़ाई कर रही हैं. हिंदी की छात्रा होने के नाते जया अपनी बातों में ज्यादातर हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल करती हैं लेकिन शुरुआत में दिल्ली के कल्चर को देखते हुए हिंदी बोलने से डर लगता था, हिंदी सुनकर सब हंसने लगते हैं.

लेकिन धीरे-धीरे हिंदी को लेकर अपने मन के डर को निकाल कर जया आगे बढ़ती गई. जया बताती हैं कि देश की राजधानी और आसपास अंग्रेजी का माहौल थोड़ी देर के लिए डरा ज़रूर देता हैं लेकिन इस डर के आगे निकल कर ही हम नए माहौल ओर शहर को अपना सकते हैं.

5. सेफ्टी को लेकर बहुत चिंता रहती हैं

सेंट स्टीफेंस कॉलेज की छात्रा पारुल जयपुर की हैं. पारुल बताती हैं जयपुर दिल्ली के काफी पास हैं इसीलिए दिल्ली की हर बुराई जयपुर तक बहुत जल्दी पहुंच जाती हैं. रेप कैपिटल के नाम से बदनाम दिल्ली में आने के फैसले ने ही परिवार में तनाव पैदा कर दिया.

घरवालों से लड़कर, समझकर दिल्ली आ तो गई लेकिन मन मे सेफ्टी का डर बुरी तरह बैठा रहा. कॉलेज के होस्टल में भी जगह नही मिली जिसकी वजह से दुगुना डर बैठ गया. जैसे-तैसे पीजी लेने की हिम्मत जुटाई. कुछ दिन तक तो शाम 7 बजे के बाद से ही पीजी से निकलने में डरती रही, फिर रहते-रहते समझ आया कि सुरक्षा डरने से नही समझदारी से होती हैं.

उसके बाद अब लगता हैं सब सुरक्षित हैं सब ठीक हैं. क्योंकि कैंपस के आसपास के पीजी वाले इलाके बहुत रौनक और भीड़भाड़ वाले हैं ऐसे में स्टूडेंट्स यहां आराम से सुरक्षित रह सकते हैं.

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